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उपन्यास

नीलकंठी ब्रज
इंदिरा गोस्वामी

अनुवाद - दिनेश द्विवेदी


अपनी श्रीमती सेरफी सेठ की निराशाभरी खोज में शशि ने पागल महिला-सा व्यवहार करना शुरू कर दिया। राधेश्यामियों ने तो उसके विरुद्ध कटु वचन कहना शुरू कर दिया था। उन्होंने उसे मानवों के रूप में गिद्धों की बेकाबू उत्तेजना को आकर्षित करने वाली माँस का लोथड़ा तक कह दिया। उन्होंने उसे चेतावनी दी कि वे बहुत अधिक समय तक उसकी रक्षा करने में वे असमर्थ हैं। उसने जो कपड़े पहन रखे थे, वे भी अपर्याप्त आकार के थे। बल्कि वे तो चिन्दियों से अधिक नहीं थे। उस दिन एकादशी थी यानी पक्षिका का ग्यारहवाँ दिन। इसके अलावा रविवार भी था। स्वभावत: लोगों की भारी भीड़ गलियों में भरी थी। अत्यधिक कठिन कार्य था बाजार के मन्दिर के खास स्थान तक ताँगा ले जाना। भक्तगण बड़े प्यार से ब्रज की रानी राधा की प्रशंसा के गीत गा रहे थे। पूरा वातावरण उमंग से भर उठा था। शशि को मोड़ी से हाड़ाबाड़ी पहुँचने में आधा घंटा लगा। चारों ओर साफ और सफाई थी। आज यह एक अपवाद था, क्योंकि जो नालियाँ हमेशा ठुँसी बन्द पड़ी रहती थीं आज साफ कर दी गयीं और वे अब बदबू नहीं दे रही थीं, उल्टे चमेली और गुलाब की खुशबू हवाओं में तिर रही थी, जिन्हें आप सूँघ सकते थे।

पंडों के झुंड इधर-उधर चहल कदमी कर रहे थे। वे भी अपने कन्धों पर साफ गमछे और गले में चमेली की मालाएँ लटकाये हुए थे। शशि समाधि, जो अट्टालिका कहलाता था, के निकट पहुँच चुकी थी। उसने देखा कि वहाँ इकट्ठे हुए लोग फटी हुई धोतियाँ और पुरानी बंडियाँ पहने हुए थे। और तो और, उनके गमछे भी पुराने और गन्दे हैं। ये पंडे आने वालों को न कभी अतिशय शब्दों और न पवित्रता के दिखावे से जीतना चाहते थे। सामान्यत: उनकी उत्सुकता दो जून की रोटी कमाने में लगातार रहती थी। इन गरीब और धर्मपरायण पंडों के मध्य गोपा जी उपाध्याय एवं सेठ विसनसिंह सिन्धु जैसे शिक्षार्थी भी थे। ये वे लोग थे, जिन्होंने पूजा की एक विद्या के रूप में अपनी खोज चालू रखी थी, ये वे लोग थे, जो उसी व्यवसाय के अपने अनेक मित्रों से अलग समझे जाते थे। कि किसी यात्री के पैसे को अनुचित रूप से खींचना पाप है। किन्तु उनके समान व्यक्ति आज ज्यादा नहीं हैं और न ही अट्टालिका के आस-पास उन जैसे व्यक्ति देखे जा सकते हैं, बल्कि आप उन्हें झूलनवार, गव्हरवन के छोटे बाजारों के कोनों में या मौनी बाबा के छायादार पथ के निकट देख सकते हैं। आश्चर्य कि आज शशि ने अट्टालिका में उन्हें देखा, वे नंगे पाँव चल रहे थे। ईस्ट इंडिया कम्पनी के दीवान लाला जी के दिनों में वे सैंडिल या जूते पहना करते थे। उन दिनों वे अपने पवित्र धागों में पुखराज से जड़े कीमती सोने के छल्ले डाल फिरते थे। किन्तु आज वे भूखे लोग हैं। अपने प्रति समाज के क्रूर अन्याय को लेकर उनके युवकों और युवतियों में सुलगना असन्तोष मौजूद था। कौन इसकी गारंटी दे सकता है कि यह असन्तोष एक दिन भीषण लपटों में नहीं भड़केगा। वह दिन शायद ज्यादा दूर नहीं। शशि ने श्रीमती सेठ को ब्रज में कहीं नहीं पाया। उनको उनकी दानशीलता के लिए जानने वालों ने यह अफवाह फैलाना शुरू कर दिया कि अपनी मनोकामना पूर्ति के लिए उस बिना बच्चों वाली औरत ने पूजा शुरू की थी। फलवती होने के लिए उसने कपूरथला में संन्यासियों के साथ एक माह तक के लिए रहना शुरू कर दिया है।

ये बातें वाकई बड़ी अजीब थीं। उस संन्यासी ने अनेक बिना बच्चे वाली माओं को बच्चा दिया, ऐसा सबको विदित है।

शशि असुविधा महसूस कर रही थी। क्योंकि उसका सिर चक्कर खा रहा था। फिर भी वह काँटों भरी झाड़ियों एवं अंजीर वृक्षों से घिरी रामनरेती की सड़क पर चलने लगी। वहाँ की धर्मशाला में आज लोगों की भारी भीड़ थी। उनमें विभिन्न शाखा से सम्बन्धित साधु थे और सभी गेरुवे वस्त्र, जो आत्मसमर्पण एवं अहिंसा के संकेत हैं, पहने हुए थे। विविध शाखाओं में लाला दासियाँ, जो प्रभु रामचन्द्र की पूजा करती हैं; सतनामी, जो अमूर्त ईश्वर की पूजा करते हैं; शिव नारायणी, जो निराकार ब्रह्म की पूजा करते हैं, और गीरबदासी, जो कृष्ण भगवान की पूजा करते हैं। सब शाखाओं से सम्बन्धित साधुओं ने इस बात पर एकाता दर्शायी कि उनके जीवन का सबसे आनन्दपूर्ण भाग वही है, जो उसने ब्रज में बिताया था। सावधानी एवं हृदय की पीड़ा के अतिरेक के बावजूद उसका दिमाग एवं आत्मा मानो इस जगह से पतली रेशमी डोर से बँधी पड़ी है। जैसे वह एक मुलायम-सा एवं जिद्दी आकर्षण है। अचानक शशि ने महसूस किया कि उसने काफी दूरी तय कर ली है। शायद उसे आगे नहीं बढऩा चाहिए। उसे वृन्दावन-नाथ के मन्दिर के खास क्षेत्र को लौट जाना चाहिए। सुबह के सूर्य की किरणें दूर-दूर तक फैल गयीं थीं। वे स्निग्ध सूर्य किरणें, जो सुनहरी दिखाई दे रही थीं, उस मोरनी के परों को स्पर्श कर रही थीं, जो अपने छोटे बच्चों के साथ कदम्ब की डालियों पर थी। उस युवा ब्रह्मचारी स्वामी के प्रति उसके उदीयमान प्यार ने उसे एक भिन्न व्यक्ति में बदल दिया था। वह काफी साहसी बन गयी थी और जीवन को जानने की उसकी प्रवृत्ति और गहरी हो गयी थी। हमेशा की तरह उसने मन्दिर के प्रवेश द्वार के पास लोगों के झुंड को देखा। दरवाजे पर चश्मेवाली राधेश्यामी खड़ी थी। वह शशि की ओर बढ़ी और कहा-'संस्कृत टोलों के शिक्षक महादेव पंडित की आज सुनवाई है।' 'महादेव पंडित की सुनवाई! वे कहते हैं कि पूर्णत: सही हैं और फिर किस पाप के लिए वे उनका न्याय करेंगे?'

'कोई ऐसा पाप नहीं है। कुछ दिनों से वे एक प्रकार के मानसिक असन्तुलन से पीड़ित हैं। शास्त्री का बेटा, क्या शास्त्रीजी को तुम नहीं जानती हो? वह भी वहाँ शिक्षक हैं। गुरुकुल से उन्हें डिग्री मिली है। किन्तु वर्तमान में बेकार हैं। शास्त्रीजी होशियार जो ठहरे, महादेव पंडित के असन्तुलन का लाभ उठाना चाहते हैं। तुम्हें मालूम है, शास्त्रीजी कौवे के समान चालाक-चुस्त एवं सारस के समान धैर्यवान हैं। ये वे ही हैं, जो यह अफवाह फैला रहे हैं कि महादेव पागल हो गया है। वे प्रतिकूल हैं कि आज उन्होंने देखा कि वह आदमी घोड़े की लीद को अनाज के लिए छानबीन कर रहा है और अनाज को निगल रहा है जैसा कि लालाजी ने किया। लालाजी, जो अपने जीवन के अधिकांश भाग में जमींदार रहे, बाद में संसार को त्याग कर फकीर बन गये। महादेव के लिए आजकल और भी अफवाहें हैं। वह लीला बाबा के मन्दिर के समूह गान में जाकर खड़ा होता है। पखावज बजाने वाले बूढ़े आदमी से पूछता है, 'क्या आज तुम्हें पेट भर भोजन मिला? यह साधन तुम्हें जीवन भर धोखा देता रहा। जाओ और मुरलीधर के सिर पर मारकर इसे तोड़ दो। वह उस बूढ़े आदमी से भी मिलता है और उन्हें चेतावनी देता है, जो सारा दिन केवल एक कौर भोजन के लिए झाँझ बजाता है, तुम सब, तुम सारे के सारे, मुझे निश्चित रूप से मालूम है, जल्दी ही किसी अँधेरी गली में खून की उल्टियाँ करोगे और अपने प्राण त्याग दोगे। क्या तुमने जाना कि तुम्हारे पैरों की कमजोर पिंडलियों पर ये ट्यूमर कैसे बढ़ रहे हैं? यह सब लम्बे समय तक खड़े रहने से खून के जमने की मेहरबानी है। तुम सब इतने हिचकते क्यों हो? जाओ और मारो। अपने अधिकारों को पक्का करो। तुम शाश्वत के वंशज हो-यह क्यों भूल जाते हो? फाटक खोलो, मुरलीधर के चढ़ावे से अपने पेट भरो। तुम सब बेवकूफ हो। तुम क्यों नहीं महसूस करते कि तुम्हारे मुरलीधर ने इन सारे सालों में तुम्हारा खून चूसा है और अब तुम्हें हँसना चाहिए।'

उसने यह सब जब बताया, वह राधेश्यामी (वह एक शिक्षित महिला थी) अश्रुपूरित हो गयी। उसके द्वारा निर्देशित हो, शशि गजेन्द्र मोक्षकुंड की ओर अग्रसर हो गयी, जो कचहरी के कमरे के सामने है। असमिया धर्मशाला के प्रवेशद्वारों के समान आकार वाले यह कचहरी का कमरा काफी जगह एवं प्रभावित करने वाला था। मन्दिर के श्रद्धेय स्वामीजी यहीं बैठते हैं, और रामायण, पुराण, रामानुज एवं रामानन्द पर अक्सर धार्मिक प्रवचन देते हैं। एक दीवार चन्द्रभानु राकेश द्वारा चित्रित एक विशाल तैल चित्र के द्वारा सजायी गयी थी। यह रामायण के उस मार्मिक दृश्य को व्यक्त करता था, जिसमें भरत अयोध्या के सारे नागरिकों के साथ राम से अयोध्या लौटने की प्रार्थना कर रहे हैं। यह चित्र विभिन्न व्यापारों से सम्बन्धित विविध लोगों के जमघट, जैसे कुशल कुम्हार; मोर के पंखों के बने विविध वाद्ययंत्रों के व्यापारी; बुनकर, जो बहुत मुलायम वस्त्र बुन सकते हैं; दलाल; सुगन्धित धूप के व्यापारी; नौकर जो अपने मालिकों का पद प्रक्षालन कर रहे हैं; तैयार करने वाले और सुसज्जित दरबारी और अन्य का प्रदर्शन कर रहा था। इन सबके मध्य में भरत खड़े हैं, पर भव्यता के बिना। उनके सिर पर मुकुट नहीं है और सारे अंग आभूषणों से रहित हैं। नंगे चलते हुए घिसे कदमों पर बने कुछ फोड़े कमल की कलियों पर के ओस बूँदों की याद दिलाते हैं। समर्पित प्रेम एवं वफादारी की घटना को दर्शाने वाला ऐसा चित्र केवल चन्द्रभानु राकेश ही बना सकता था। कोई और ऐसा कर ही नहीं सकता था, यह तो पक्का है।

शशि ने राधेश्यामी का अनुसरण किया और कचहरी के कमरे में प्रवेश किया। सुनवाई अभी शुरू नहीं हुई थी। तख्त पर बड़े-बड़े अक्षर भोग के प्रारम्भ की घोषणा कर रहे थे और मन्दिर के भीतर प्रवेश की मनाही की भी। पहले से ही काफी लोग जमा हो चुके थे। महादेव की सुनवाई शुरू हो चुकी थी। रघुनाथजी के मन्दिर के स्वामी न्यायधीश का कार्य कर रहे थे।

राधेश्यामी ने शशि से कहा, 'क्या उस ओर की सीढ़ी पर बैठी उस औरत को तुम देख रही हो? वह महादेव की पत्नी है। उस दम्पति के पाँच बच्चे हैं। यदि उनके पिता नौकरी खोते हैं तो उनके लिए क्या होगा?' उस परिवार के लिए दया से परिपूर्ण उस महिला ने कहा।

शशि के पास जवाब देने के लिए कुछ नहीं था। अत: राधेश्यामी ने उसकी ओर पलटकर आमने-सामने होकर कहा, 'ऐसा लगता है कि तुम अवचनबद्ध हो।'

'यह मुझे बहुत पीड़ा पहुँचा रही है कि कैसे पाँच बच्चों का पिता अपनी नौकरी खोने जा रहा है।'

'केवल न्याय देना बाकी है, स्वीकृति एवं विचार-विमर्श पहले से पूरे हो चुके थे।'

शशि ने अपनी धड़कन को तेज होते महसूस किया। उसका प्रिय अब इस क्षण एक दुर्भाग्यपूर्ण आत्मा के भाग्य का निर्णय करने को है।

वह स्वामी यानी न्यायाधीश, उस जगह से जहाँ शशि खड़ी है, अच्छी तरह देखा जा सकता है। वह एक दृढ़ व्यक्तित्व का आदमी है। उसका दर्शन ही स्वयं काफी गहराई एवं आकर्षण को दिखलाने वाला था। पर वह क्या कहने जा रहा है? निर्णय क्या होगा?

मन्दिर के पट खुलने एवं जुलूस निकलने, जो रघुनाथजी के सम्मान में गरुड़ की मूर्ति के चारों ओर घूमता है, के पहले ही सुनवाई पूरी हो जाएगी। समय गुजरता जा रहा था। हर व्यक्ति उस युवा स्वामी की ओर उत्सुकता से देख रहा था।

जज ने अपनी निर्भीक भौंहों को उठाया और दूर तक देखा। माथे पर चन्दन का तिलक बहुत भव्य दिखाई दे रहा था। चिन्ता भरी अपेक्षा से लोगों की भीड़, युवा एवं बूढ़े एक समान उसकी ओर देखने लगे।

जज ने गूँजने वाली आवाज में कहना शुरू किया 'पिछले बीस सालों से महादेव पंडित ने जिस दुर्लभ ईमानदारी और समर्पण से शाला की सेवा की, वह अन्य के लिए अनुकरणीय है। किन्तु वर्तमान में उनके लिए यह सम्भव नहीं है कि वे ऐसा कर सकें। उनकी समर्पित सेवाओं को देखते हुए मन्दिर के अधिकारी उनके इलाज की पूरी जिम्मेदारी लेते हैं और वे उनके पाँचों बच्चों की परवरिश का भार भी। गरुड़ की मूर्ति के आस-पास की जगह की सफाई का सम्मानीय कार्य महादेव की पत्नी को दे दिया जाता है, जिसके लिए उन्हें दो वक्त के भोजन की सामग्री दी जाएगी। नये शिक्षक को नौकरी देने की बात अभी स्थगन में रखी गयी, क्योंकि बहु- से शिक्षित एवं बेकार युवकों ने, जिन्होंने मथुरा की शालाओं में प्रशिक्षण पाया है, वृन्दावननाथ के मन्दिर की शाला में शामिल होने की लालसा व्यक्त की है। सही निर्णय के लिए समय लगेगा। अत: वर्तमान में उसे स्थगित किया गया है।'

जब तक स्वामी निर्णय सुना रहे थे, चारों ओर नितान्त शान्ति थी। पर उन्होंने जब बोलना खत्म किया पहले समर्थन की फुसफुसाहट शुरू हुई, जो तेज हो गयी। लोगों ने जज की उनकी विद्वत्ता के लिए प्रशंसा की। गजेन्द्र कुंड के टपरे के नीचे खड़े वन महाराज के विद्यार्थी उनकी प्रशंसा में नारे लगाने लगे। अन्य ने भी उनका साथ दिया। सब युवा स्वामी के निर्णय की पवित्रता से प्रसन्न थे।

इसी बीच मन्दिर के पट खुल गये। शहनाई की धुन ने घोषणा कर दी कि रंगनाथ प्रभु का वस्त्रालंकरण का विधान पूर्ण हो चुका है। स्वामी भीड़ में से मन्दिर में प्रवेश के लिए अपना रास्ता बनाने लगे।

शशि कचहरी के कमरे में एक खम्भे की बाजू में सुनवाई होने तक खड़ी रही। कार्य कार्यवाही में खासकर अपने प्रिय स्वामी में खोये हुए। उसे इस बात की भी जानकारी नहीं रही कि पूर्ण जानकारी देने वाली वह राधेश्यामी उस स्थान को छोड़कर चली गयी। वह युवा स्वामी उसके हृदय का प्रिय है। वह चुपचाप ही उसके बुद्धिमत्तापूर्ण न्याय पर खुशी से भर गयी। वह उसे सही सिद्ध करने की तीव्र चाह रखती थी। उसकी आँखें नम हो गयीं। वह अपने आपसे फुसफुसायी-तुम्हें यही सहानुभूति की शक्ति हो ताकि करोड़ों लोगों के हृदय में प्रवेश कर सको जो भोगते हैं।

जल्दी ही स्वामी वृन्दावननाथ के भक्त एवं साईस मन्दिर के बाहर उमड़ने लगे थे। अब वे बगीचे के चारों ओर घूमने निकलेंगे। अब देखने वालों की भारी भीड़ जमा होने वाली थी। वह वहाँ सुरक्षित खड़ी नहीं हो सकती थी। शान्ति से वह स्थान छोड़ने में ही भलाई थी। फाटक पर खड़ा होने वाला सिपाही इस ओर आता देखा जा सकता था।

अत: वह गरुड़ कुंड की सीढ़ियों की ओर आगे बढ़ी। फिर वहाँ काफी देर तक अकेली खड़ी रही, पर नहीं मालूम, क्यों उसे अपना बर्ताव अजीब लगा। उसे वहाँ करने को कुछ नहीं था। क्या यह मोर को पंख फैलाते देखने के लिए था, पर ऐसा कहना मुश्किल ही है। क्योंकि ब्रज के दृश्यों और ध्वनियों के प्रति उसका आकर्षण कम ही था। वे उसके अब जाने-पहचाने थे। केवल एक झलक उस युवा स्वामी की पाने के लिए वह वहाँ प्रतीक्षा कर रही थी। वहाँ होने में आत्मप्रशंसा की भावना व्याप्त थी। वह गर्व और खुशी का अनुभव करने लगी। और फिर असहाय भावना कि उससे हट नहीं सकी।

रात को उसके भविष्य के बारे में एक बार और वह राधेश्यामी सचेत कर गया। वे बुरे दिन थे। कैसा शशि को बताया गया। शशि को सुरक्षित बनाने के लिए कुछ करना चाहिए।

उस रात को वह उनींदी-सी सो रही थी। उसने कुछ अजीब-से सपने देखे। अक्रूर घाट, जहाँ पंचमुखी हनुमानजी की प्राचीन मूर्ति के पास किसी जगह पर उसने कोई भयंकर आकृति देखी। और चैन्नरथ, जो कृष्ण और बलदेव के जमाने में उन्हें प्रिय था, के अनेक टुकड़े बिखरे देखे। ये अपशकुन का भूत श्यामजी दिगम्बरी के छायादार पथ और माधवाचारियों के प्रिय बलदेव मठ के आसपास घूम रहे थे। फिर उनका स्थान अन्त में बुद्ध के टूटे-फूटे देवालय के निकट स्थिर हो गया।

शशि भूत को उसके चेहरे से देखकर चौंक गयी। वह श्रीमती सराफी सेठ स्वयं थी। वह उसे दुत्कारती हुई चिल्ला उठी। जैसी वह थी, उसने घोषणा की, 'बीस दिन तक स्वामी के साथ सोने के बाद बच्चे के साथ मैं बड़ी हो गयी। किन्तु मैं ऐसा भटक क्यों रही हूँ? ऐसा क्या है कि मुझे शान्ति नहीं मिलती?' फिर उस आकृति ने शशि की ओर उँगली उठायी, जो एक डरी हुई लड़की थी और चिल्लायी, 'अब समय है, अपने को यहाँ से हटाओ और अपने हृदय की गहराई में एक मन्दिर बनाओ। आह, यह बहुत भयंकर है, पर कौन इसे महसूस कर सकता है।' ऐसा कहते हुए वह आत्मा कँटीली झाड़ी के पीछे गायब हो गयी।

शशि एक चीख के साथ जाग गयी। उसे भ्रम हुआ कि उसने किसी को अपने दरवाजे पर दस्तक देते सुना। इसने उसे चौकन्ना कर दिया। पर नहीं, कोई नहीं था वहाँ। वह केवल उसकी कल्पना का ही केवल अंश था।

शशि ने उत्तर काशी के एक विद्यार्थी से जो कुछ सुना था, उसे याद करने लगी। अर्जुन वृक्ष, जो ब्रज के चौंसठ सावन्तों की सम्पत्ति थी, की छाया में बैठकर उसने ऋग्वेद का उदाहरण दिया, जिसमें कहा गया है, एक स्त्री के लिए बच्चा पाने के लिए अपने पति के अतिरिक्त अन्य किसी पुरुष के साथ सहवास करना पापपूर्ण कार्य नहीं है। यह केवल आर्यन मात्र नहीं हैं। झूठ भर पाप है। इस सन्दर्भ में उसने महान ऋषि व्यास, पाराशर एवं शंकराचार्य, जो प्रख्यात दर्शनशास्त्र के खोजी हैं, की जीवनियों का उल्लेख किया। उनके जन्म से सम्बन्धित ये आलेख बड़े अजीब भी हैं।

मनु, पाराशर और याज्ञवल्क्य जैसे धार्मिक न्यायनिर्माता के द्वारा स्त्री की वेदनाओं को दूर करने के लिए गहरी सहानुभूतिपूर्वक व्यवहार से बनाये गये सारे नियमों का उपयोग किया।

किन्तु सत्य वैसा ही रहा जैसा वह हमेशा हुआ करता है। इसे न तो ऋग्वेद, न ही मनु और न ही पाराशर विकृत कर सके। इसलिए शशि ने श्रीमती सराफी सेठ की छाया को बुद्ध के टूटे-फूटे खँडहरों में भटकते हुए खोजा।

मध्य रात्रि का समय था। नीरवता छायी हुई थी। एक ध्वनि भी सुनी नहीं जा सकती थी। और, तो और आज राधेश्यामी के खर्राटे भी शान्त थे। पर शशि को अब नींद नहीं आयी। उसके अनेक अनुभव उसके दिमाग में स्थान पा गये। उसने मृणालिनी को याद किया, जो एक रोटी के टुकड़े के लिए एक भिक्षाघर से दूसरे भिक्षाघर भटकने के लिए मजबूर कर दी गयी। वह एक मिट्टी के पात्र को हाथ में लिये रंगनाथजी के मन्दिर के तिरुम-नियम विधान के बाद थोड़ा-सा दूध पाने के लिए अन्य भिखारियों-सा ही जीवन जीती है।

ब्रज में जो परिवर्तन उसकी आँखों के सामने हुए थे, उसके दिमाग में याद आ गये। अन्य बहुत से विचार उसे मग्न कर गये। उन सबको दबाते हुए वह आगे आयी। वह गम्भीर घोषणा, जो उसने एक बार सुनी, रघुनाथ मन्दिर के स्वामी के द्वारा की गयी। कचहरी वाले घर की सीढ़ियोंपर बैठकर उन्होंने कहा-वह कौन है, जो ब्रज की मधुर छेड़-छाड़ में प्रवृत्त है। ब्रह्म-पुराण ने उसे मानव शरीरधारी ब्रह्मा बताया है। किन्तु वसुदेव ने स्वयं कहा कि कृष्ण सर्वोच्च हैं। आदिकालीन सभी शक्तियाँ संसार को बनाती हैं और चलाती हैं। गीता, जो कुरुक्षेत्र के रण क्षेत्र में निर्मित की गयी है, वह सर्वशक्तिमान एवं अनन्त की घोषणा करती है जो विश्व में सर्वव्यापक है।

ये पूर्ण बुद्धिमत्ता के शब्द हैं। पर क्या ये भी व्यक्त नहीं करते? सारा कुछ मानव के जीवन के प्रति धारणा पर निर्भर करता है। उसका भी। बस उसे यही चुनना है। सब कुछ सही निर्णय पर निर्भर करता है। पर वह बनाना इतना आसान नहीं है।

जागृत एवं विचारों में खोयी शशि ने किसी को दरवाजे पर दस्तक देते सुना। वह आपे में आ गयी। वह इस बीच कहाँ थी। इस समय की दस्तक उसके भ्रम का अंश नहीं थी। उसने सुना और यह सच था। क्या वह भयभीत नहीं है? उसने अपने से थोड़ी दूरी पर गहरी निद्रा में सोयी राधेश्यामी की ओर देखा।

दरवाजे पर फिर से दस्तक हुई। शशि ने झाँका और अपने दरवाजे पर दो राधेश्यामियों को खड़ी देखा। प्रत्येक ने अपना सिर एवं चेहरा ओढ़नी से ढँक रखा था। जैसे ही उसने दरवाजा खोला दोनों भीतर तेजी से घुस आयीं।

'शशि, हमें माफ करो। हम तुम्हारे लिए एक बुरी खबर लाये हैं। आलमगढ़ी मर गया है।'

'आलमगढ़ी मर गया, कैसे? कब?' शशि दु:ख और असहायता से चीख उठी।

'वह हैजे से मर गया। उसने सोचा था कि वह बच जाएगा। अत: उसने नहीं चाहा कि तुम्हें बताया जाए। अब हमारे साथ आओ, हम उसी जगह पर चलें।'

आलमगढ़ी ब्रज में लम्बे समय से रहता था। अत: उसके काफी दोस्त एवं पहचान वाले थे। उनमें से बहुत सारे घाट पर उसके निवासस्थान के पास जमा हो गये। जैसे ही शशि ने उस बरसाती में, जहाँ वह पड़ा था, प्रवेश किया, प्रत्येक की नजर उसकी ओर ही उठ गयी। यह जताते हुए, मानो सब उसी की प्रतीक्षा कर रहे हैं। उसकी शैया के निकट एक बूढ़ी महिला रो रही थी। शशि ने सोचा कि वह शायद उसकी बहन थी, जो राधाकुंड में रहती थी।

अन्य एक राधेश्यामी मृतक के कपड़े बदलने में लगा हुआ था। लम्बे समय से आलमगढ़ी तार-तार धोती पहना करता था। आज उसे एक नयी धोती मिली। अब उसे एक माला भी पहना दी गयी। अतर एवं गोपी चन्दन (सफेद मिट्टी) भी लगाई गयी।

आलमगढ़ी की बहन ने, जो राधाकुंड से थी, अचानक सिर उठाया और शशि पर तीखी नजर डाली। दूसरे ही क्षण वह भड़क उठी। अपने चारों ओर के लोगों को सम्बोधित करते हुए उसने कहा, 'मेरी लड़कियो, तुम काफी समय से यहाँ रह रही हो। तुम जानती हो कि मेरे भाई ने अपनी देखभाल के लिए एक लड़की रखी थी। लगता है, वह उसकी जमीन-जायदाद पाने का हक जताने आयी है।'

और वह आलमगढ़ी के शव पर कफन ओढ़ाते हुए कहने लगी, 'मैं ब्रज में दस और बीस सालों से ज्यादा समय से रह रही हूँ। मैं अन्याय का मूक दर्शक मात्र नहीं रह सकती। वह अपनी अन्तिम साँस ले रहा था और मैंने स्वयं उसे कहते हुए सुना कि वह उस दूर बसी लड़की को पुराने सिक्कों से भरी थैली वसीयत में दे रहा है।'

इस उद्घोषणा के साथ ही राधाकुंड से आयी आलमगढ़ी की बहन की जोर-जोर से रोने की आवाज धीमी हो गयी। मैं जानती हूँ, उसने कहा कि मुझे ऐसा धोखा दिया गया है, वह अयोग्य था। कोई नपुंसक अपना वारिस कैसे निर्धारित कर सकता है?

वहाँ जमा हुए राधेश्यामी इसी बात को लेकर दो भागों में बँट गये। कुछ समय तक वे आपस में ही जोर-जोर से वाद-विवाद करने लगे, फिर धक्का-मुक्की पर आ गये। मार-धाड़ में सारी चीजें, जैसे धूप और चन्दन एवं सफेद मिट्टी और चमेली की मालाएँ जो मृतक को पहिनाने के लिए लायी गयी थीं, तितर-बितर हो गयी थीं। उस अव्यवस्था के मध्य एक राधेश्यामी बाहर आया और उसने केसीघाट के पंडे को बीच-बचाव करने को कहा। दूसरा, जो शवयात्रा के लिए फूलों की रस्सियाँ बनाने में व्यस्त था, अपने काम को रोक कर वहाँ आया, जहाँ शव रखा हुआ था।

दृढ़ एवं गम्भीर व्यक्तित्व वाले पुजारी के अचानक आगमन ने राधेश्यामियों की चकचक को रोक दिया। वे सब मौन और शान्त हो गये। वे अपनी पगड़ियों को बाँधकर व्यवस्थित होने की कोशिश करने लगे थे, जो उनके घुटे सिरों से सरक रही थीं।

केसीघाट के पुजारी ने चारों ओर देखा। उसकी गहरी निगाह राधेश्यामियों के भिखारियों जैसे चेहरों पर, कुछ समय के लिए झोपड़ियों की टूटी-फूटी दीवारों पर, नम धरती पर, चमेली की मालाओं पर टिकी रही और अन्त में आलमगढ़ी की लाश पर टिक गयी। कुछ देर की चुप्पी के बाद उसने गर्दन उठायी और कहा, 'मेरी बच्चियो! यह समय है तुम अपने-अपने काँच की ओर देखो, तुमने उन डालियों को खींचना शुरू कर दिया, जिससे वृक्ष ही जड़ से उखड़ जाएगा। यह समय है, तुम दर्पण की ओर देखो। तुम यह बात महसूस नहीं करतीं कि जीवन उतना ही नश्वर है, जितना कमल के पत्तों पर पानी की बूँद। मुझे तुम पर हँसी आ रही है। अच्छी तरह देखो। अपने भीतर झाँको। तुममें से प्रत्येक अपने उस नाश को देख सकती हो और भय से पूर्ण भीषण हाहाकार को सुन सकती हो। मेरी बच्चियो, क्या तुम नहीं देख सकतीं कि आलमगढ़ी के शरीर के लिए ये कपड़े एवं गहने, फूलों की मालाएँ एवं चन्दन का लेप; तुलसी की मालाएँ और विभूति अब केवल भार बन गये हैं। और तुम शापित आत्माओ, कुछ सिक्कों के लिए तुम आपस में निर्दय की तरह लड़ रही हो! मैं कहता हूँ, अपने को इन सबसे मुक्त करो। मुक्त करो, क्योंकि यदि गाँव की कचहरी जमा होगी, तो निश्चय है कि तुममें से कोई एक दमड़ी भी नहीं पा सकोगी।'

पुजारी की इस घोषणा पर आलमगढ़ी की बूढ़ी बहन ने शोर-शराबा शुरू कर दिया। वह जमा हुई औरतों को सम्बोधित कर कहने लगी, 'कृपया मेरी बातों पर कान दो, क्योंकि मैं अपने दुखों के बारे में तुम्हें बताऊँगी। काफी लम्बे समय तक मैंने गाड़ी खींचने वाले घोड़े के लिए काम आने वाले आलू खरीदे और उनको खाकर मैं जिन्दा रही। इस प्रकार मैंने अपने अन्तिम संस्कारों के लिए पैसे बचाये। यह कोई नीचतापूर्ण बचाव नहीं था। पर मुझ पर तरस खाओ। दूसरे ही दिन वह सब चोरी चला गया। जाओ, मेरी वस्तुओं में तलाश करो। तुम उसे वहाँ नहीं पाओगे। एक दिन मेरी झोपड़ी की छत मेरे सिर पर गिर गयी। श्रीमती सेठ ने अपने कुत्तों को मेरे पीछे लगा दिया, जब उसे मालूम हुआ कि मेरे अन्तिम संस्कार के लिए मेरे पास पैसा नहीं है। हाय, मेरे गरीब भाई ने मुझे बताया, तुम उम्र में मुझसे काफी बड़ी हो। तुम मुझसे पहले मरोगी। मैं तुम्हें फूल की अरथी में ले जाने की व्यवस्था करूँगा।'

ऐसा कहते हुए उस बूढ़ी औरत ने अपना सिर आलमगढ़ी की शैया के सिरहाने पटकना शुरू किया और रोना-पीटना शुरू कर दिया।

शशि ने, जो थोड़ी दूरी पर खड़ी थी, सब कुछ सुना, जो उस औरत ने कहा। वह सन्तुष्ट थी कि जो उस औरत ने कहा वह सब वास्तविक है। समय नष्ट किये बिना वह उस औरत की ओर बढ़ी-उसकी आँखें अब सूखी थीं। उसके बाल बिखरे थे। वह दुख और निर्णय की मूर्ति बनी हुई थी। उसने उस औरत से कहा, 'मुझसे ले लो। मैं आलमगढ़ी का पैसा नहीं चाहती। न ही उसकी बचत को हथियाने के लिए मैं यहाँ आयी हूँ। मैं उसके अन्तिम दर्शन के लिए यहाँ आयी हूँ।'

ऐसा कहते हुए वह बाहर भागी। निरुद्देश्य वह कुछ देर रेत पर बैठ गयी। यह तो अजीब बात है। सचमुच बहुत अजीब, एक दिन में सबकुछ समाप्त हो गया। आज इस क्षण उसके सामने यह ज्ञान उसके अचेतन मन में प्रकट हुआ कि आलमगढ़ी एक शक्ति था। केवल अब इस क्षण उसने महसूस किया कि वह कितना शक्तिशाली था।

समय धीरे-धीरे सरक रहा था। किन्तु शशि को मुश्किल से ही इसका भान हुआ कि वह रेत पर बैठे-बैठे अपनी स्वयं की स्थिति पर कितनी देर से गहराई से सोच रही थी। कुछ देर पहले ही उसने पीली गर्दन वाले गरुड़ पक्षी को अपने पास थिरकता याद किया था। किन्तु अब उस स्थान पर उसने अपनी ही छाया देखी। कुछ राधेश्यामी उसके पास दुख व्यक्त करने आ पहुँचीं। उन्होंने उसे सलाह दी कि जोर से दहाड़ मार कर रोओ। उनमें से एक ने उसके गले की चेन खींचने की कोशिश की, क्योंकि उसकी अब आवश्यकता नहीं थी, किन्तु शशि ने प्रतिरोध किया।

उसने कुछ दूरी पर अपनी ओर किसी को आते हुए देखा। कौन हो सकता है? वह डॉक्टर रायचौधुरी थे, जो उसकी ओर आ रहे थे। सर्किट रोड पर अपने कुछ मरीजों को देखने वह निकले थे। उसके पास पहुँचकर उन्होंने कहा, 'तुम अभी भी बैठी हो। मैंने कुछ घंटों से तुम्हें यहाँ बैठे देखा, जब मैं यहाँ से जा रहा था। उठो, मैं कहता हूँ और साहस बटोरो। मैं जानता हूँ तुम एक बहादुर लड़की हो। एक छोटे-मोटे गहने के लिए पूरे खजाने को गवाँ देने वाली केवल तुम अकेली नहीं हो।'

शशि ने उन पर एक जड़वत्-सी नजर डाली। दुख एवं पीड़ा की एक जोर की चीख निकली, वह उनके कदमों पर झुक गयी और उनके कदमों को जोर से पकड़ लिया।

उसने कहा, 'मुझे पक्का मालूम था कि आप ही एक मात्र हो, जो मुझे सही रास्ता दिखाओगे।

'आजकल मैं बहुत परेशान हूँ। मैं ऐसे रास्ते पर चलना चाहती हूँ, जो सुरक्षित एवं निश्चित हो।' उसकी आवाज भावना से दब-सी गयी। उसने अपना सिर उनके दोनों घुटनों के बीच रख दिया और रोने लगी। उसके रोने के बीच भी रायचौधुरी जी ने सुना, 'नहीं, मैं उनमें से नहीं हूँ, जो खजाने के बदले नगण्य-सी चीज चुनती हैं।'

इसी बीच यमुना की रेत पर आलमगढ़ी के अन्तिम संस्कार की व्यवस्था की गयी। केसीघाट के पुजारी ने शव पर पवित्र जल छिडक़ना एवं मन्त्रोच्चारण शुरू कर दिया।

शशि को कुछ ज्यादा करने को नहीं था। चिता के पूरी तरह जल चुकने के बाद जली हड्डियों के टुकड़े, जो पालमिरा के पत्तों के रंग के थे, आलमगढ़ी की बहन के द्वारा चुन लिये गये और शवयात्रा में शामिल राधेश्यामी नदी में डुबकी लगाकर चली गयीं। शशि अकेली रेत पर बैठी हुई थी। केसीघाट के पुजारी उसके पास पहुँचे और उससे कहने लगे, 'अब घर लौट जाओ और अपनी देखभाल करो।' और उन्होंने कहा, 'ध्यान रखो, तुम्हारे जैसी लड़की को एक रोटी के टुकड़े के लिए एक भिक्षाघर से दूसरे भिक्षाघर जाना और उन बूढ़ी-बदसूरत औरतों से, मेरा मतलब राधेश्यामियों के साथ अपने दिन बिताना शर्मनाक और अपमानजनक है। साफ नजर रखने का प्रयत्न करो, क्योंकि सामने लम्बा भविष्य पड़ा है। रायचौधुरी तुम्हें धायी बनाना चाहते हैं और मैं कहता हूँ सचमुच यह विचार बहुत नेक है।'

शशि ने तीखी प्रतिक्रिया की, 'मैं एक धायी? यह बिल्कुल नहीं होने का।' उसने अपने आप से कहा। किन्तु पुजारीजी के सामने अपने विचार व्यक्त नहीं कर सकी। वह मूक बनी रही।

'राधा की जय हो!' कुछ लोगों ने उद्ïघोष किया और यमुनातट गुंजित हो उठा। पुजारी जी जली चिता के निकट गये और उस स्थान को अन्त में छोड़ते हुए उन्होंने शशि को बताया, 'आज तुम जीवन के नग्न सत्य से आमने-सामने हो रही हो। यह क्षण निर्णय लेने का है और इसी तरह तीनों तरह के पापों (घातक पाप, सजा पाने योग्य पाप एवं क्षम्य पाप) के विरुद्ध चेतावनी देने का। अत: अब...'

आलमगढ़ी की जली राख यमुना में बहने लगी। पहले वह एक ढेले की तरह जमी और फिर बहना शुरू कर दी।

'अजीब, सचमुच कितना अजीब, क्षण में वह मजबूत शरीर गायब हो गया।' शशि ने सोचा, 'और हवा के एक झोंके से उस आदमी की शवयात्रा के चिह्न विस्तार के पक्ष में खो जाएँगे।

शव-दाह के बाद नदी में रीति के अनुसार उसने डुबकी लगायी। उसके कपड़े गीले थे, जिनसे पानी चू रहा था। फिर भी वह धीर समीर की ओर रवाना हो गयी। उसकी पहचान की झुंड में से एक बूढ़ी महिला ने उसे सचेत किया, 'राधेश्यामी अब तुम्हें अपने साथ शायद न रहने दें। आलमगढ़ी की मृत्यु की खबर दूर-दूर तक फैल गयी है। पहलवान शारीरिक प्रदर्शन के लिए जमा हो गये हैं। उन्होंने दिन में ही भाँग की अपनी खुराक ले ली है। मैंने गोपीनाथ बाजार को केले के पत्तों एवं एक विशाल छत्र से सजा देखा है। आज वे अपनी संगीतमय सन्ध्या गोष्ठी मना रहे हैं। तुम्हारे लिए बुरे दिन आये हैं। मथुरा के गुंडे यहाँ आस-पास मँडरा रहे हैं।'

वह बूढ़ी औरत सही थी। शशि अपनी झोपड़ी के दरवाजे पर मुश्किल से पहुँची कि राधेश्यामी झुंड में चिल्लाने लगीं, 'तुम यहाँ फिर क्यों, तुम निर्लज्ज वेश्या, क्या तुम्हारा इरादा हमारा खून चूसने का है! हम तुम जैसी युवती की जिम्मेदारी नहीं ले सकते। अपने अन्तिम संस्कार के लिए अपना पैसा कमर में बाँध रखा है? जाओ, आठ-खम्भा में शरण लो। वे उसे मानव सेवाश्रम कहते हैं। या तुम रायचौधुरी के अस्पताल के बरामदे में जाकर सो सकती हो, पर किसी हालत में यहाँ नहीं। वे गुंडे अपने होश में नहीं थे। शराब की भारी मात्रा के सेवन के बाद वे नशे में धुत थे। वे तुम्हारे पीछे पड़े हैं और काफी पूछ-ताछ भी कर चुके हैं। अत: यहाँ से चली जाओ और जल्दी जाओ। हम कोई खतरा लेने को नहीं हैं। उन्हें मालूम है कि हमारी कमर में पैसा बँधा पड़ा है। जिस तरह से उन्होंने हम पर त्योरी चढ़ायी एवं हमारी कमर पर नजर डाली...लम्पट हैं।'

फिर उन्होंने उसे बाहर कर दरवाजा बन्द कर लिया। शशि थोड़ी देर वहाँ किंकर्तव्यविमूढ़ हो रुकी रही। शेड के भीतर वह रोटी के टुकड़ों को तोड़ती हुई औरतों की विशिष्ट गन्ध सूँघ सकती थी। पूरा प्रसंग विश्वास के परे और भ्रामक था। बचाकर रखे गये धन को बूढ़ी-बदसूरत औरतें दिन के प्रत्येक घंटे में अत्यधिक सावधानी से सहेज कर रखती थीं। यह एक मात्र सावधानी, साथ की भावना एवं प्यार की मानवीय सोच को कुचलना था।

कितना अजीब है, शशि ने सोचा और फिर धीरे से उस स्थान को छोड़ दिया। गीले कपड़ों एवं कन्धों पर लटकते अव्यवस्थित बालों के साथ वह औरत से ज्यादा प्रेत लग रही थी। गोपीचन्द बाजार से थकी हुई शशि पैर घसीट कर, जोर लगाकर धीरे-धीरे चल रही थी।

क्या किसी अन्य ने इस प्रकार परिस्थिति का सामना किया होगा? क्या कोई अन्य अपने सहारे के शवदाह के तुरन्त बाद उसके समान नितान्त बेसहारा हुई होगी? क्या उसके समान अन्य किसी को सड़क पर ढकेल दिया गया होगा?

उसने सोचा, उसे आगे जाना नहीं है, क्योंकि वह पूरी थकी अनुभव कर रही थी। उसने किसी चीज पर कदम रखा, जो सीढ़ियों-सी दिख रही थी, पर वह सीढ़ी नहीं थी। वह जानवरों के लिए बनाया गया जलाशय था। थोड़ी देर उसने उसकी जगत पर बैठना चाहा। पर नहीं, उसे नहीं बैठना चाहिए। उसके लिए समय गुजरता जा रहा था। गीले कपड़ों में वह काँप रही थी, क्योंकि हवा, जो पानी के ऊपर से बह रही थी, उस पर चोट कर रही थी। वे गीले कपड़े उसके बदन पर चिपक गये थे। उसने सिर को चकराता महसूस किया। किसी भी क्षण, उसने सोचा सड़क पर लम्बी पड़ जाएगी, पर पूरी ताकत के साथ उसने आगे देखा और भजनाश्रम की संगमरमरी सीढ़ियों पर आ पहुँची, जो अँधेरे में भी चमक रही थीं। वहाँ से पास स्थित एक दुकान की टोह ली। दुकान शान्त पड़ी थी। वह जैसे-तैसे उसके फर्श पर रेंगने में सफल हो गयी। वहाँ आस-पास कोई नहीं था। बुरे मौसम ने दुकानदारों को समय से पूर्व दुकानें बन्द कर अपनी झोपड़ियों में भागने के लिए मजबूर कर दिया था। क्या उसे निर्जन गलियों का फायदा उठाकर आगे चल देना चाहिए, उसने सोचा किन्तु तुरन्त कुछ भी निर्णय न ले सकी।

क्या उसे हाड़ाबारी में शरण पाने की कोशिश करना चाहिए? नहीं, क्योंकि उसे मालूम था कि कोई कमरा खाली नहीं मिल सकता। इसके अलावा वहाँ की राधेश्यामी जानती थीं कि आलमगढ़ी मर गया है। अत: वे एक रात के लिए भी उसे स्वीकार करना नहीं चाहतीं। पूरा बाजार आज बन्द था, क्योंकि दुकानदारों के साथ-साथ प्रत्येक, और तो और राहगीर भी संगीत मनोरंजन में शामिल हो गये थे। उस स्थान पर जमा हुई चुप्पी ब्रज के लिए अनहोनी बात है। उसने सोचा, वह पुराने खजूर के पत्ते और फूलों की मालाएँ बेचते हुए रात आसानी से बिता सकती है। किन्तु जमघट जब टूटेगा, लोग अपने हाथों में मशाल लिये रास्ते पर गुजरेंगे और उनका सामना करना काफी खतरनाक हो सकता है।

शशि ने देखा कि मोहल्ले की बन्द पड़ी स्ट्रीट लाइट रास्ते की शुरुआत पर अचानक जल उठी, जो ज्ञानगुदरी ओर जाता है। उसी के नीचे अपनी कुछ वस्तुओं के साथ एक आदमी बैठा हुआ था। जैसे ही लाइट जली, वह आदमी उठा, अपनी वस्तुओं को बाँधा और उस ओर रवाना हुआ, जहाँ शशि खड़ी थी। हाँ, निश्चित है कि वह उसी की ओर बढ़ रहा था। उसके कदम ठीक नहीं पड़ रहे थे। उसकी काँख में बिस्तर दबा था। उसने हाथ में शराब की बोतल ले रखी थी। शशि ने उस चेतावनी को, याद नहीं पड़ रहा था किसने कहा था, स्मरण किया कि उस आदमी से, जो अकेला पीता है, दूर रहो। शशि जानती थी कि वह एक कमरा जरूर रखे हुए है। अत: वह जल्दी उस जगह से आगे बढ़ने लगी। पर वह यह कर भी नहीं पायी, तभी वह आदमी बोतल और बिस्तर के साथ वहाँ आ पहुँचा और एक दुकान की सीढ़ी पर बैठ गया। फिर वह चिल्लाया, 'वहाँ कौन खड़ा है, क्या तुम्हें नहीं मालूम यह मेरा फर्श है। ओह मैं देख रहा हूँ, तुम वही राधेश्यामी हो। बैठ जाओ, तुम्हें खड़े नहीं रहना चाहिए। बूढ़ी, मैं तुम्हारा पुराना बूढ़ा बेटा हूँ। यदि फर्श पर तुमने अधिकार किया, तो मैं खुशी-खुशी आज कोने में पड़ा रहूँगा, जहाँ घोड़े पानी पीते हैं। जाओ और सोओ और आराम से सोओ। मैं तुम्हारा रखवाला हूँ। मैं जासूस हूँ। जाओ और सोओ, चिन्ता मत करो।'

फिर उस आदमी ने अपना बंडल खोला और तुरन्त ही बदबूदार गन्ध, जैसे किसी बच्चे की पत्थर पर सूख आयी उल्टी की गन्ध हो, फैल गयी। शशि ने उस आदमी पर एक नजर डाली-वह कौन है, यह पता लगाने की कोशिश की। पर यह असम्भव था। उसे याद नहीं आ रहा था कि उसने अजीब से दाढ़ी वाले चेहरे को कहाँ देखा है। उस आदमी ने स्वयं गिलास भरा और गटका। फिर बोतल को आकाश की ओर उठाकर कहने लगा, 'दादी, यह केवल रात को ही मैं ब्रज में जाने का मौका पाता हूँ। तुम मुझसे पूछती हो, क्यों, फिर सुनो। तुम्हारे और मेरे बीच में मैं जासूस हूँ। अन्य जासूसों की जासूसी करते हुए क्या तुम यह देखती हो! मैं जासूसों पर जासूस। इस समय मैं फूल टोली बाबा के पीछे हूँ। फसल वाली बाबा का जुलूस जरूर देखा होगा। होली के दरम्यान जब उन्होंने वृन्दावन एवं मथुरा में जुलूस का आयोजन किया, उन्होंने बीस लॉरी और आठ गधों को अबीर और रंग ढोने के लिए लगाया।

'चारों ओर रंग ही भरा था। स्त्री और पुरुषों के पैरों के नीचे, दीवारों पर, मन्दिरों की मूर्तियों के ऊपर, हौरेंगा की पहलवान स्त्रियों के कपड़ों पर भी। यह हर जगह पर था। रंगीली धूल और कहा जाये तो यमुना की गहरी रेत इसे ढक सके। और दस हजार लोगों का मिठाइयों द्वारा उदार मनोरंजन और व्यापारियों का जमघट और उनकी कारों की आवाज। और उनकी सम्पत्ति की जगमगाहट। और मैं-मैं केवल जासूस, जासूसों पर जासूस। व्यापारी और आयकर से उनका बचाव। आयकर की रहस्यपूर्ण गुफा। और मैं मन्दिर में मुख्य द्वार से प्रवेश नहीं कर सकता था। कितनी शर्म की बात। फाटक पर के उस बन्दूकधारी सन्तरी ने घोषणा की कि इस बार रथोत्सव के समय सारे लोग, अमीर हो या गरीब, एक-एक कम्बल पाएँगे। मुझे सन्तरी, मैं कहता हूँ, वह कभी फौज में काम करता था।'

फिर उस आदमी ने जोरदार ठहाका लगाया, 'आराम से सो जाओ दादी, जलाशय के बाजू में मैं सोया हूँ। तुम फिकर नहीं करना।' फिर उस पियक्कड़ जासूस ने पूछा और फुसफुसाकर कहा, 'दादी, शायद तुमने प्रेमचन्द की कहानी नमक का दरोगा पढ़ी है। बहुत मजेदार है। उस दरोगा ने अपनी नली व्यापारी रूपी गन्दे कुत्ते की ओर तानी और वह आदमी दरोगा को गालियाँ देता है, जो उसकी स्थिति के लिए शायद ही उपयुक्त हो। तुम्हें वह कहानी जरूर पढऩी चाहिए। तुमने नहीं पढ़ी। नहीं। बड़े दुख की बात है।'

जैसे ही उसने बोतल की आखिरी तलछट पी, वह और भी उत्साहित हो गया। उसने स्वयं नियन्त्रण पूरी तरह खो दिया और रोगी के समान अचानक गड्ढे में गिर पड़ा। फिर वह बुरी तरह उल्टी करने लगा, मानो वह अपनी आँतों को भी उल्टी कर बाहर फेंकेगा।

शशि ने स्थिति का फायदा उठाया और उस जगह से दौड़ना शुरू कर दिया। दौड़ते हुए वह हाड़ाबारी की ओर जाने वाली सड़क के सिरे पर स्थित चाय की दुकान पर पहुँची। वह दुकान गुप्त लेनदेन के केन्द्र के रूप में जानी जाती थी। शशि भी यह जानती थी। पर इस समय वहाँ कोई मिलेगा इसकी उम्मीद वह नहीं कर सकती थी। किन्तु यह उसकी गलती थी। उसने देखा कि कुछ लोग अँधेरे में नीचे बरामदे में बैठे हुए हैं।

अत: वह कुछ दूर और आगे स्थित बिहारीमोहन कुंज पहुँची। सौभाग्य से दरवाजा खुला था। अपने खोये बच्चे की खोज में खूँखार निराश शेरनी-सी शशि भागी और पिछवाड़े नीम के वृक्ष एवं सीमेंट से बनाये गये कुएँ के परे पहुँचकर वह मृणालिनी के दरवाजे पर दस्तक देने लगी। इसका रुखे स्वर में किसी ने उत्तर दिया, 'दरवाजा पुराना और टूटा है, ठोंकना बन्द करो।'

शशि इतनी थकी थी कि सीधी खड़ी नहीं हो पा रही थी। अत: दरवाजे पर वह पसर गयी। उसके कपड़े अभी भी गीले थे। ठंडी रात की हवा उसके दुबले-पतले शरीर पर पड़ी, तो वह काँपने लगी।

बस उसी समय दरवाजे की कमजोर तख्तियाँ चरमरा कर खुल गयीं। मृणालिनी बाहर निकल आयी और अँधेरे में झाँकने लगी कि उसके दरवाजे पर कौन पड़ा है। यह देख कर कि दरवाजे पर कोई और नहीं स्वयं शशि है, वह चौंक पड़ी।

'शशि, तुम यहाँ हो। वह भी ऐसी प्रतिकूल घड़ी में शरण खोजते हुए। क्या मैंने तुम्हें पहले ही नहीं बता दिया था कि तुम्हारा यहाँ रहना सम्भव नहीं है। ऊपर के दोनों कमरों में, भले उन्हें कबूतरखाने कहो, पहले से ही दो राधेश्यामी कुछ समय से रह रही हैं। वे दोनों उन्हें दो रुपये प्रतिमाह किराये पर दिये गये हैं। किन्तु उन्होंने मुझे एक दमड़ी भी नहीं दी है। किन्तु मैं देख रही हूँ कि तुम प्रेतग्रस्त की तरह काँप रही हो, क्या तुम बीमार हो?'

'मैंने आलमगढ़ी के शवदाह के बाद कपड़े भी नहीं बदले। अब मेरे पास कोई जगह जाने की नहीं है। मुझ पर दया करो, मुझे रात भर के लिए यहाँ सोने दो।'

'लगता है तुम इतनी बीमार हो कि चल भी नहीं सकती। तुम भीतर आओ। रात भर के लिए विश्राम लो। हाँ, आलमगढ़ी की मृत्यु की खबर सब जानते हैं। मुझे पूरा पक्का यकीन था कि राधेश्यामी तुम्हें अपने साथ नहीं रखेंगी। दिनों दिन आदमी अधिक स्वार्थी और क्रूर होता जा रहा है। अब अपने कपड़े बदलो। मेरे बिस्तर के किनारे एक सूखी चादर है। किन्तु सावधानी बरतो। जोर की आवाज मत करो। अन्यथा मेरी माँ जाग उठेगी। उसकी दशा गिरती जा रही है। जब मैं एक भिक्षागृह से दूसरे भिक्षागृह रोटी के चन्द टुकड़े माँगने जाती हूँ, मुझे उनके हाथ-पैर बाँधने पड़ते हैं। तुम देख सकती हो, यह सब करना मेरे लिए कितना भद्दा और पीड़ादायक है। पर कोई और चारा नहीं है। फिलहाल मैंने एक राधेश्यामी को कुछ सोचकर उनकी देख-रेख के लिए रखा है। पर अब वह एक ऊँची रकम की माँग कर रही है। वह कहती है कि मन्दिर के सामने या सामने की गली में कटोरी लेकर माँगने बैठ जाए, तो इससे ज्यादा कमा सकती है। तुम देखती हो शशि, मैंने तुम्हें ऊपर की मंजिल में एक माँद दे दी होती, पर तीन क्रूर प्राणी-वे निश्चित रूप से राधेश्यामी हैं, वहाँ रह रही हैं। वह भी इन कई सालों से। अब मन्दिर ट्रस्ट से हम भूख से बचाने की अपेक्षा रखते हैं। किन्तु, जैसा कि तुम देख रही हो हड्डियों के ढाँचे में बदल गयी हैं।'

कोने में जलती मिट्टी के तेल के दीपक की हल्की रोशनी में शशि मृणालिनी की ओर बढ़ी और उसके पास धरती पर बैठ गयी। मृणालिनी ने उससे कहा, 'मौसम की परवाह किये बिना उसने तुम्हें मदद की या नुकसान पहुँचाया, दूर से ही सही, आलमगढ़ी तुम्हें एक प्रकार से सुरक्षा देता रहा। अब वह नहीं रहा। ये ब्रज के मानव- लोमड़ युवा विधवाओं को सूँघते रहते हैं और गुंडे सोचेंगे कि वे तुम्हारे साथ मनमाना बर्ताव कर लेंगे। उन्हें मालूम है कि तुम्हारे पास देखभाल के लिए कोई नहीं है। तुम्हें अपने को उन भिखारी स्वामियों से भी अपना बचाव करना चाहिए। मुझे पक्का मालूम है कि उनमें से कुछ तुम्हारे सामने यह प्रस्ताव लेकर आएँगे कि तुम उनके साथ पूजा-पाठ में साथ मिलकर रहो, पर शादी करके नहीं। तुम्हें अब दूसरी बार वही गलती किसी भी हालत में नहीं करनी चाहिए। गली में भूख से मर जाना ज्यादा अच्छा है, क्योंकि एक ईमानदार व्यक्ति के रूप में मरने में यश है।'

शशि ने एक भी शब्द नहीं कहा। दोनों ही फर्श पर पसर गयीं। मधुर संगीत और मौज मस्ती की तरंगें गोपीनाथ बाजार से उनके कानों तक पहुँच रही थीं। उनसे शान्त ब्रज प्रतिध्वनित होने लगा। अन्य से हटकर फूटे गले से गाने वाले के गीत शशि को अच्छे लगने लगे। कुछ दिनों से यह स्थान यह गुनगुनाहट सुनता आ रहा था। उसने कहा, 'उन दिनों को, चाहे वे कितने ही कम क्यों न हों, ऐसे जियो, जिससे लगे कि सारी पृथ्वी तुम्हारी है।'

मृणालिनी ने महसूस किया कि गीत का सार उल्लेखनीय रूप से अच्छा है। वह भ्रमणकारी संगीत ब्रज के लोगों के लिए कई दिनों से बन रहा था। तुम्हें मालूम है कि उस बाजार में मेरी माँ भी यही गाना गा रही थी। किन्तु पंडों के लड़के आगे आये और घर तक घसीट दिया। यहाँ अब बहुत से लोग मेरी माँ को जानते हैं।'

शशि ने उन बातों की ओर, कम रुचि दर्शायी, जो उसकी साथी बता रही थी। वह अपने ही विचारों में खो गयी। फिर उसी समय मृणालिनी ने देखा कि वह सुबक रही है।

'तुम्हें रोना नहीं चाहिए, शशि, तुम एक साहसी लड़की के रूप में जानी जाती हो। मुझे मालूम है कि तुम ईमानदार हो। मैंने उन्हें कहते सुना कि डॉक्टर रायचौधुरी तुम्हारी मदद करेंगे। मैं सोचती हूँ कि तुम जानती हो। उनकी अपनी बेटी के प्रति की गयी सारी योजनाएँ धूसरित हो गयी हैं। उनकी पत्नी भी अब बिस्तर पर है। वह ईसाई यहाँ आ पहुँचा है। वह ब्रज में कइयों द्वारा देखा गया है। रोना छोड़ो प्रिय शशि, दोनों हाथों से साहस बटोरो और दुनिया का सामना करो। मुझे मालूम है कि तुम एक छोटी-मोटी चीज के लिए खजाना लुटाने वालों में से नहीं हो। तुम्हें कौन-सी बात परेशान कर रही है? प्यार, वृन्दावननाथ मन्दिर के युवा स्वामी का प्यार? समय तेजी से उड़ा जाता है। यदि यह तुम्हारा प्यार क्षणिक आसक्ति नहीं है, तो समय की कसौटी पर इसका परीक्षण हो जाएगा और सोने-सा महान एवं खरा सिद्ध होगा। उसकी उपेक्षा उस मूर्ति को जरा भी नष्ट करने की क्षमता नहीं रख पाएगी। विश्वास करो मुझ पर मेरी प्रिय, मैं जो कुछ कहती हूँ, वह जीवन के अनुभव की गहराई से खोद कर निकाला गया है। उठो और साहसी बनो। आगे के लम्बे साल क्षणों में तेजी से बीत जाएँगे। तुम फिर तुम बन जाओगी। मुझे पक्का यकीन है। मालूम है कि तुम तिनके के बदले में खजाने का विनिमय नहीं करोगी।'

कोने की धीमी जलती लैम्प बुझ गयी। कब, उन्हें पता भी नहीं चला। गहराते अँधेरे में, जो उन्हें घेरे था, दो शिशुओं के समान वे दोनों भोली आत्माएँ, जो जीवन में बुरी तरह नष्ट कर दी गयी थीं, गीली धरती पर सुरक्षा के लिए एक दूसरे से लिपटी पड़ी थीं। दोनों ही निर्दयी और सुनिश्चित भविष्य के परिणाम से भयभीत अनुभव कर रही थीं।


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