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उपन्यास

नीलकंठी ब्रज
इंदिरा गोस्वामी

अनुवाद - दिनेश द्विवेदी


एक दिन अलस्सुबह सौदामिनी ने अपने कमरे से बाहर जाते हुए मलाई के रंग के साँप को देखा, जो आसपास के विद्यमान लोगों की उपेक्षा करते हुए, कुएँ तक पहुँचा और कमरे के किसी टूटे कोने के छेद में लौट गया। दो घूमते हुए संन्यासी, जिन्होंने उस प्राणी के क्रियाकलापों को देखा, कहने लगे, 'यह एक बुरा सगुन है। आज का दिन अच्छा बीतने वाला नहीं है।'

हाँ, वे सही थे। अस्पताल के सामने उसी सुबह एक मृत शरीर पड़ा हुआ पाया गया। पहली रात पानी की असामयिक झड़ी लगी थी। शायद वह आदमी इलाज के लिए आया होगा। वह पूर्णरूप से तर-बतर था।

एक संन्यासी और कुछ राधेश्यामियों ने उस शव का परीक्षण किया। उनमें से एक उत्तेजना से चिल्लाया, 'उस पवित्र आत्मा का एक सोने का दाँत है।'

'सोने का दाँत!' झुंड के बाकी राधेश्यामियों ने एक साथ पूछा, मानो अविश्वास में हों। वे और करीब आयीं और उस शरीर की जाँच करने लगीं। संन्यासी ने कहा, 'अपने बचपन में हरिद्वार में, मैंने जली हड्डियों के बीच सोने के दाँत और सोने के सिक्के इकट्ठे किये थे। एक खास साल, क्या तुम विश्वास कर सकते हो, मैंने सोने के पूरे बीस दाँत इकट्ठेकिये। वह भी एक चौड़े छेदों वाली जाली से। किन्तु आजकल जो लड़के नदी की तली से तारों की पतली जाली से जली हड्डियाँ इकट्ठा करते हैं वे आधे भी भाग्यशाली नहीं होते।'

शव के सोने के दाँत ने ब्रज के लोगों के दिमाग में काफी सनसनी जगा दी। अस्पताल के सामने भीड़ बढ़ती गयी। सौदामिनी ने दो औरतों को कहते सुना, 'कैसे कह सकते हो कि ब्रज पवित्र शक्ति से वंचित है। झाड़नेवालों के द्वारा शव नदी में बहा दिया गया होता, पर अब उसे एक सम्माननीय दहन मिलेगा। उसको शवपेटी उठाने वालों के द्वारा उठाया जाएगा। कितना भाग्यशाली है!'

एक अन्य स्त्री ने ताना कसा, 'मैंने सुना कि सरकार निर्धन राधेश्यामियों के अन्तिम संस्कार का इन्तजाम करेगी।'

एक पतले ओठों वाली राधेश्यामी ने गलगंठ के साथ फब्ती कसी, 'यह सब बेकार की बातें हैं। पिछले साल और उसके भी पिछले साल रक्षा के काम पर लगे सिपाही से यही बात करते सुना, पर कुछ भी नहीं हुआ।' फिर भी एक औरत ने कहा, 'डॉक्टर की बीवी बहुत जल्द मर जाएगी। मैंने उसी दिन देखा, वह हड्डियों का ढाँचा मात्र रह गयी है।'

'उसकी विधवा बेटी और उसके ईसाई प्रेमी ने उसे मृत्यु की ओर बढ़ा दिया। इसमें कोई शक नहीं है।'

'अपने पूर्व जन्म में किसी के भोजन में जहर घोला होगा। इसी से उस जैसी लड़की को उसने अपने गर्भ में धारण किया। क्या तुमने नहीं देखा, वह वेश्या अकेली ही कैसी भटकती रहती है।' दूसरी ने कहा।

फिर तीनों औरतों ने पास के अस्पताल के लोगों की उपस्थिति की परवाह किये बिना अपने कपड़े उतारे और बिना वस्त्र पहने हुए कुएँ के पास नहाना शुरू कर दिया।

अब उनमें स्त्री और पुरुष के बीच कोई अन्तर नहीं रह गया। उस बाधा को उन्होंने बहुत पहले पार कर लिया था।

सौदामिनी ने बहुतों को अपनी बुराई करते सुना। पर वह मुश्किल से ही कोई प्रतिक्रिया करती थी, क्योंकि वह बेतुकी बातों के प्रति मूक बन गयी थी। अब पीठ-पीछे होने वाली बुराई उसे आसानी से परेशान नहीं करती। 'राधा, पवित्र रानी राधा की जय हो' तेज चिल्लाती उस अजनबी की शवयात्रा किसी अन्य हरीड़ा स्वामी की शवयात्रा से जा जुड़ी, जिसने उसी सुबह अपनी अन्तिम साँस ली। दोनों की यात्राएँ मिल गयीं और उस शाश्वत नदी के रेतीले किनारे की ओर बढ़ीं।

कुछ राधेश्यामियों ने, जो अभी तक अपने अन्तिम संस्कारों के लिए पर्याप्त नहीं बचा पायी थीं, बिना शर्म के उन बिछड़ी आत्माओं के भाग्य पर ईर्ष्या व्यक्त की।

सौदामिनी भीतर चली गयी। फिर एक बार बारीकी से कमरे के प्रत्येक कोने की जाँच कर ली। साँप अपने आपको सम्भवत: कहाँ छुपा सकता है! दीवार की लकड़ी की चौखटों में छेद है। पर उसके वहाँ प्रवेश करने का कोई चिह्न नहीं है। कुछ छिपकलियाँ वहाँ अक्सर देखी जाती हैं। जैसे ही उसने खिड़की खोली, कुछ चिरैया कमरे के भीतर कीड़ों की खोज में टूटे प्लास्टर में चोंच मारने आ जुटीं।

महन्त के हाथी पर बँधी घंटियों की आवाज सुनाई दी। हरीड़ा स्वामी की शवयात्रा प्रभु रघुनाथ के रंगमहल के पास पहुँची। जैसा कि माँगने वाले संन्यासियों ने कहा, सबेरे-सबेरे साँप का दर्शन बुरा सगुन होता है, यह कथन उसके लिए एक प्रकार की मनोग्रन्थि बन गयी।

दोपहर को उस दिन अस्पताल में असाधारण भीड़ आ गयी। उस स्थान के आधे लोगों को अभी शवयात्रा से लौटना था। सौदामिनी के लिए मृत्यु फुतीर्ली दिखाई देने लगी। कुछ जाने-पहचाने चेहरे बहुत कम समय में अदृश्य हो गये। ब्रज में ऐसा लगने लगा, जीवन और मृत्यु हाथ में हाथ डाले घूमा करते हैं।

सौदामिनी देख सकती थी कि उसकी प्रिय माँ की जीवन-बाती धीरे-धीरे मन्द, और अधिक मन्द होती जा रही है। जैसा अब है क्या वह आगे खींच पाएगी? लगता है कोई रहस्यपूर्ण प्रतिनिधि प्रत्येक गुजरते दिन उसके कान में फुसफुसाता है। समय तेजी से उड़ा जा रहा है। वह किसी के लिए प्रतीक्षा नहीं करता।

उस दिन बुरे-बुरे विचारों ने सौदामिनी पर चारों ओर से हमला बोला। उसने सोचा, राधेश्यामियों के समान उसे भी शवयात्रा का साथ देना चाहिए था। वह नहीं जानती थी कि सारे क्षण वह अपने आपको व्यस्त कैसे रखे। क्या उसे उस नौकरानी की मदद करनी चाहिए, जिसे उसकी माँ की सेवा के लिए रखा गया है? पर लम्बे समय तक उसके पास रहना! नहीं नहीं, यह तो पूर्णत: असम्भव है!

खोयी हुई-सी वह धीर समीर घाट की ओर चल पड़ी। सीढ़ियों पर उसने यह देखने के लिए कि आस-पास कोई है तो नहीं, गर्दन घुमायी। यह पाकर वह आश्वस्त हुई कि शवयात्रा उस रास्ते नहीं जा रही है। फिर उसने अचानक अपने से थोड़ी दूरी पर एक झाड़ के नीचे एक सँपेरे को देखा। फिर एक बार उसने उस संन्यासी के कथन को याद किया कि सबेरे-सबेरे साँप का दिखना अपशकुन होता है। उसके लिए वह साँप एक पहचाना दृश्य है, क्योंकि वह लम्बे समय से उसके अपने कमरे के किसी अँधेरे छेद में रह रहा है। पहली बार जब उसने एक प्रकार की सरसराहट सुनी थी जैसे कि लम्बी रस्सी के टुकड़े को फर्श पर खींचा गया हो, तब उसने जाना कि वह साँप है और निशाचरी के लिए बाहर निकला है। किन्तु वह किसी तरह भी चीख न सकी थी। उसने अपने आपको किसी सम्मोहन के अन्तर्गत पाया।

सफेद साफे का ऊपर-नीचे होना इसका संकेत है कि सँपेरा अभी वहीं पेड़ के नीचे साँपों के लिए जमीन खोदते हुए क्रियाशील है।

दूसरे ही क्षण उसने अपने आपको उसके पास पाया। वह आदमी किसी साँप की चमड़ी उतार रहा था। बिना चमड़ी का उसका शरीर किसी मछली के समान डाली से लटक रहा था। उसके दर्शन मात्र से सौदामिनी अवाक रह गयी। क्योंकि वह साँप उसका जाना-पहचाना था। वह पीड़ा का अनुभव करने लगी। उसने उस आदमी से पूछा कि उसने साँप कहाँ से पाया।

आदमी ने केवल आँख उठायी पर उत्तर कुछ नहीं दिया। 'क्या यह दशरथ अखाड़े का बूढ़ा साँप नहीं है?' उसने फिर पूछा, 'क्या यह जहरीला साँप था?'

इस बार उस आदमी ने स्वीकृति में सिर हिलाया। अचानक वह आशा से भर उठा और कहा, 'ब्रज में ऐसी ऊँची सर्प की चमड़ी मुश्किल की चीज है। स्वर्ण की पृष्ठ भूमि पर चाँदी-सी ये बिन्दु देखा।'

उस समय तक दिन काफी चढ़ चुका था। सूर्य के प्रकाश में नदी का रेतीला विस्तार चमकने लगा था। सौदामिनी भिक्षागृह की ओर जाने वाली सड़क पर धीरे-धीरे चल रही थी। यमुना की रेत पर उसने दोगुना अकेलापन महसूस किया। पास के लेंट हाउस, जिसका ऊँट के चमड़े का रंग था, से गहरे प्रभावित करने वाले एक गीत की आवाज तैरती आ रही थी, जिसने उसके हृदय की गहराइयों को छू लिया।

'उद्धव, तुम मृदु बोलने वाले सन्देश वाहक हो। तुमने हमें पलकें खोलने-बन्द करने को कहा और हमने किया। हमने अपनी आँखों को खोला और बन्द किया, जहाँ कभी श्री हरि की मूर्ति रहा करती थी। तुमने हमें अपने कानों को छेदने को कहा और उलझे बाल धारण करने को कहा, चन्दन के लेप की जगह शरीर पर राख लगाने को कहा, पर तुम्हारे सारे उपदेशों का हमारे लिए क्या उपयोग है? हमारे लिए, जो अपने प्रियतम के बिछोह की आग में प्रतिदिन समर्पित हैं। वे योगी, जो एक जगह से दूसरी जगह शाश्वत की खोज में भटकते हैं, हमारे काफी निकट हैं। एक क्षण के लिए भी हम उनसे अलग नहीं हो सकते। जैसे कोई वृक्ष एवं उसकी छाया।'

वह गीत और उसके विषय ने उसे गहराई से छू लिया। उसकी आँखें नम हो गयीं। एक बार फिर उसके कानों में कोई फुसफुसाया, 'समय भागा जा रहा है मेरे दोस्त, समय ठहर नहीं सकता।'

वह अपने स्वर्गीय पति सुब्रत का चेहरा याद करने लगी। वह उसकी स्मृति में फीका पड़ गया था। वह उसके चेहरे को याद न कर पायी। किन्तु उसके मन की आँखों के सामने एक और चेहरा इन दिनों लगातार फुदकता था। वह उज्ज्वल एवं आकर्षक है। सारे विचार उस एक चेहरे के आस-पास केन्द्रित हो जाते हैं। यमुना की पवित्र रेत पर बैठी वह सोच रही थी, उसके समान और कौन सोच सकता था। नैतिक आदर्शवाद के प्रति उसका खयाल अब कहाँ खो गया और यह सब...?

उन्होंने यद्यपि, ब्रज में रहना शुरू कर दिया था, उसे विश्वास था कि एक दिन वह आएगा। कि अपने आपको किसी दिन दिखाएगा।

दोपहर में वह उसी स्थान पर लौटी। एक राधेश्यामी भी थोड़ी देर के लिए उसके पास आ बैठी। उसने सौदामिनी के साथ नैवेद्य (फल और चना का पवित्र भोग), जो प्रभु मुरलीधर को समर्पित किया गया था, जिसे वह ताड़ के पत्ते के दोनों में लायी थी, बाँटकर खाया। उसके बाद वह चली गयी। सौदामिनी फिर एक बार अपने पीड़ादायक विचारों में खो गयी। वह नितान्त अकेली महसूस करने लगी। पर वह वहीं बैठी रही। बहुत देर तक उसे पता नहीं लगा। फिर अपने विचारों से चौंककर वह जागी, क्योंकि उसने पास में ही शोर सुना। उसने देखा, कई लोग उसी की ओर भूतोगली कहलाने वाली जगह (भूतों की गली) से बढ़ रहे हैं। वह परेशान हो गयी और समझ नहीं पा रही थी कि क्या करे। अत: जहाँ वह थी, वहीं वह स्थिर खड़ी रही।

उसने उनकी ढँकी-मुँदी आवाजें सुनीं। वे उस स्थान के अनिष्ठ व्यक्ति थे।

'उड़ चलो, जितना तुम भाग सकती हो, भागो। क्योंकि उन लोगों ने राधेश्यामी पर आक्रमण कर दिया है,' ऐसा कोई चेतावनी में चिल्लाया। उन्होंने बूढ़ी राधेश्यामियों को ऐसे घसीटा, मानो वे अभी जवान लड़कियाँ हों, क्योंकि आसपास कोई युवा लड़की नहीं थी।

'तुम गुंडे, तुम गुंडे, तुम भूखे पशु से भी गये-बीते हो।' कुछ उन्हें गाली देते हुए चिल्ला रहे थे। 'तुम्हें शाप लगे, नाली के मलबे, तुम्हारे मुँह में कीड़े पड़ें।' ऐसा अन्य ने कोसा।

सौदामिनी ने अपना चेहरा अपनी साड़ी में छुपा लिया और चलना शुरू कर दिया। भूतोगली के पास उसने एक बूढ़ी राधेश्यामी को सड़क पर लेटे देखा।

गली की बत्ती की भद्दी रोशनी में उसने देखा, वह पूर्णत: नग्न थी। उसका एक हाथ अपने वक्षस्थल पर और दूसरा हाथ उसके गुप्तांग पर रखा हुआ था। अपने सम्मान को बचाने के प्रयास के रूप में उसने ऐसा किया- सौदामिनी ने अपने आप से बताया।

वह डर गयी थी। भेडिय़ों का वह झुंड शायद उस ओर आ जाए। अत: वह अँधेरे में भी पागल-सी भागने लगी।

उसने टूटी दीवार की दूसरी ओर से किसी को कहते सुना, 'आज सबेरे से उन्होंने नशीला पदार्थ तम्बाकू के पत्तों को भिगोकर पीसकर बारीक लुगदी बनाकर तैयार कर लिया था।...ऐसा लगता है उनका आक्रोश मुख्यत: उन विधवाओं के विरुद्ध है जो किसी आदमी के साथ विवाह बन्धन में बँधे बिना सम्मिलित प्रार्थना के नाम पर रह रही हैं।'

'क्या तुम्हें याद नहीं कि नरनारी रीति के अवसर पर पुराने जमाने में क्या होता था। विधवाएँ अपने चेहरों को अच्छी तरह ढँक लेती थीं।'

'तो भी लम्पट लोग उनमें से युवतियों को उनके पैरों को नंगा करके खोज लिया करते थे।' ऐसा दूसरे ने कहा।

दूसरे आदमी ने धर्म के नाम पर काम और हिंसा की प्रचंडता की निन्दा की।

सौदामिनी हताश थी। उसने महसूस किया कि समय भागा जा रहा है। किसी समय वे बदमाश उस पर काबू पा सकते हैं। अत: भागी और अधिक तेज भागी। अँधेरे में प्रत्येक कदम पर तेजी पाते हुए उसे यह सब विश्वास के परे दिखाई दे रहा था।


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