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उपन्यास

नीलकंठी ब्रज
इंदिरा गोस्वामी

अनुवाद - दिनेश द्विवेदी


रंगनाथ प्रभु के रथोत्सव का समय निकट था। पवित्र कदम्ब, जिसके नीचे कृष्ण भगवान ने अपनी पवित्र लीला की थी, उससे ओस की बूँदें टपकने लगीं। भगवान के बगीचे में चमेली अत्यधिक चमक-दमक के साथ फूल उठी थी।

रथ वाले हॉल का दरवाजा कई दिन पहले खोल दिया गया था। बढ़ई उसे ठीक करने में जुटे हुए थे। तब जाकर रथ तैयार हो पाये। सहायक भी-प्रवेशक, ब्राह्मण, रसोइये, छत्र धारक, और मामूली-सा कर एकत्रित करने वाले और बाकी सब। पंडे ने नये तीर्थयात्री की खोज में उस स्थान पर बराबर आना-जाना शुरू कर दिया था। वे सब जगहों से आते थे। लाठूरिया हनुमान, अटिला चौकी, और मथुरा जंक्शन स्टेशन से भी।

मेला भी शुरू हो गया था। एक के बाद एक छोटी और बड़ी दुकानों का खुलना भी शुरू हो गया था मन्दिर के प्रांगण में फिर आदमी और टाँगों की इतनी भीड़ बढ़ गयी थी कि सडक़ों पर चलना भी करीब-करीब मुश्किल हो रहा था। खासकर गोपीनाथ बाजार में भीड़ ज्यादा घनी थी। मोरों के झुंड, जो कभी मन्दिर के प्रांगण में अपने पंखों की महानता को पर्याप्त मात्रा में फैलाया करते थे, अब बुद्धिमत्ता से राधाबाग को लौट गये और अर्जुन वृक्ष की छाया में अपनी अठखेली शुरू कर दी।

एक बहुत बड़ा रथ, चन्दन की लकड़ी से बना, अस्सी मन वजन का और उसके विशाल चक्र। उसको देखना भर कल्पना है। मानो वह कुबेर का लोकप्रसिद्ध चैत्र-रथ हो। तुम सोच सकते हो कि सड़क उसके भार से दब जाएगी पर वह प्रभु रंगनाथ का रथ है। वह रथों का रथ है। सबके द्वारा परम श्रद्धा से माना जाने वाला। अत: असंख्य लोग उसके समने जमा हो गये थे। वे सब जगहों से आये थे। दूर के और पास के। नन्दीग्राम, बरसाना, उत्तरकाशी और दूर के अयोध्या से भी बड़े झुंडों में तीर्थयात्री आ पहुँचे। मन्दिर प्रांगण ठसाठस भर गया था। गलियाँ और उपगलियाँ भी लोगों से पटी पड़ी थीं। लोग भगवान रघुनाथ के रथ की रस्सियों को खींचने की जीवन भर की अभिलाषा को पूरी करने में उत्साह से भरे थे।

फिर बारीक गणना के बाद मांगलिक खगोलीय क्षण की घोषणा की गयी, समय के उस बिन्दु पर 'भगवान रघुनाथ की जय हो' के जयघोष के साथ वह रथों का रथ बाहर लाया गया।

नगवली की रीति (जिसमें एक सेर चावल चक्र के नीचे अन्तहीन रेखा में रखा जाता है) शुरू हो चुकी थी। रथ सरका और उसकी असंख्य घंटियाँ पवित्र नदी की हिलोरें लेती लहरों की याद दिलाती बज उठीं। परियों और गन्धर्वों की लकड़ी की मूर्तियाँ हाड़मांस की लग रही थीं। हालाँकि पिछले दिन तक ये लकड़ी की आकृतियाँ अलग-थलग ऐसे पड़ी थीं, मानो जलोदर के सूजन से पीडि़त कोई बूढ़ी औरत हो। अब वे चमेली के फूलों की माला, नथ, कुंडल, चन्दन का लेप और रंगे गये माथे पर सिन्दूर के टीके से सजी चमक रही थीं।

तोप गरजने लगीं। विशाल रथ ने भगवान रंग की पवित्र विशाल मूर्ति के साथ धीरे-धीरे सरकना शुरू कर दिया। अर्जुन वृक्ष की मौसमी डालियों के समान घनी एवं खुरदरी रस्सियों को खींचने की इच्छा में लोग आगे लहरों की तरह बढऩे लगे। वहाँ लगभग भगदड़ मच गयी थी। सिपाही एक पंक्ति में खड़े थे और भीड़ को पीछे धकेल रहे थे। अन्यथा लोग पहियों के नीचे कुचल जाते।

रथ एक-एक इंच करके आगे बढऩे लगा। बीच-बीच में वह पहियों के आगे लकड़ी के बड़े-बड़े ठूँठ लगाकर खड़ा कर लिया जाता था। इससे खींचने वालों को साँस लेने का मौका मिल जाता था। पर वहाँ सैकड़ों-हजारों लोग जमा और एक दूसरे से स्पर्धा करने लगे थे रस्सियाँ खींचने के लिए। अत: किसी खास व्यक्ति के थके होने की वहाँ खोज नहीं हो सकती थी। लगता था कि प्रत्येक में रस्सी खींचने की अद्भुत शक्ति है। और तो और वे राधेश्यामी, बेचारी कमजोर लगती हैं, आज शक्ति से भर गयी थीं। सिपाही अब फालतू समझे जाते रहे। कुछ राधेश्यामी चमेली के फूल और पवित्र जल सिपाहियों के मुँह पर छिडक़ने लगीं। वह केवल हर्षोल्लास का प्रतीक था।

आगे पूरे हफ्ते भर भगवान रंगनाथ के घर तीर्थयात्रियों की भीड़ रही। अन्य अवसरों पर भी लोगों की ऐसी भीड़ देखी जा सकती है। उदाहरण के लिए, भगवान गरुड़ पर या चाँदी के शेषनाग पर सवार कराकर जुलूस में लाये जाते हैं, या जब वे पवित्र कदम्ब, जो भगवान की पवित्र लीला के जगजाहिर गवाह हैं, की पवित्र लकड़ी के बने आसन पर पूरे ब्रज में घुमाये जाते हैं। प्रस्तुत अवसर पर आश्चर्य की बात यह है कि रस्सी खींचने में लगीं आधा पेट खाने वाली इन राधेश्यामियों का बल और शक्ति का स्रोत क्या है यह पता नहीं चलता। धार्मिक समर्पण की भावना मात्र ही यह शक्ति प्रदान कर सकती है। फिर इसे शायद धर्म को आगे बढ़ाने वाली शक्ति कहा जा सकता है।

गोपीनाथ बाजार का क्षेत्र आज श्मशान-सा निर्जन था। क्योंकि आदमी और औरतें अपने घरों को बन्द कर रथयात्रा के महान दृश्य में शामिल होने या देखने चले गये थे। और तो और, बिहारी कुंज के पास कोने में तुलसी माला बेचने वाले आदमी ने भी आज अपनी दुकान बन्द कर दी थी और त्योहार में भाग लेने चला आया था।

लम्बे घंटों तक ठाकुर साहब सीढ़ी पर बैठे रहे। दो राधेश्यामी उन्हें अपने झोंपड़े के नीचे लायीं। आज पवित्र दिन उस बूढ़े आदमी की प्रार्थना को ठुकराने का दिल उनके पास नहीं था। उस बूढ़े अन्धे आदमी ने अपनी जंग खायी पेटी में हाथ डाले और एक जोड़ी जोधपुरी बाहर निकाली। एक समय यह उसका प्रिय पहनावा था। इस शुभ दिन पर राधेश्यामी ने उन्हें उसे पहनाने में मदद करने में हिचकिचाहट नहीं दिखायी।

'यह कोट तुम्हारे लिए ढीला है' साहब के पास से गुजरने वालों में से एक ने उनसे कहा, 'यह तुम पर भार-सा लग रहा है।'

'हाँ, पहले मेरी छाती पैंतालीस इंच की थी।' ठाकुर साहब ने उतने ही गर्व और उतनी ही पीड़ा में कहा-किन्तु फिर वे एक ठहाका लगा बैठे। जो उन्हें जानते थे, उन्होंने उन्हें इस तरह अपने हृदय को व्यक्त करते हुए हँसते कभी नहीं देखा था।

'साहब, आप जुलूस देखने निकले। पर आपको ले कौन जाएगा? आज हर एक रस्सी खींचने को उत्सुक है। और प्रत्येक आदमी, औरत इसके लिए चले गये हैं। वे एक दूसरे से होड़ कर रहे थे। तुम्हारे पास खड़े होने को कौन हैं?' एक पुराने परिचित ने पूछा।

बूढ़े आदमी ने जवाब नहीं दिया। पर उन्होंने संस्कृत के एक पद का पाठ किया। उसका सार था-चाहे जितनी बुढ़ापे की लकीरें दिखने लगीं, बाल सफेद हो जाएँ, और हाथ-पाँव (अंग) ढीले पड़ जाएँ फिर भी इच्छाएँ उतनी ही युवा रही आती हैं।

कुछ राधेश्यामी, जो पास ही खड़ी थीं, प्रस्तावित-सी दिखाई देने लगीं। ठाकुर साहब थोड़ा उत्साहित हुए। क्योंकि उन्होंने दूसरे पद को गुनगुनाया जिसका अर्थ है-जब एक ज्ञानी, जिसने अपना जीवन अच्छे तरीके से बिताया, गरीबी से दूर, भीख माँगने के लिए मजबूर कर दिया जाता है तब उसके जीवन और वाणी के बीच एक संघर्ष उठ खड़ा होता है कि पहले कौन बाहर निकले।

एक बूढ़ी राधेश्यामी को उन पर दया आयी और वह उनके प्रति सहानुभूति से भर उठी, 'आज तुम्हारी आँखें ठीक हो गयी होतीं, तो हृदय की सन्तुष्टि होने तक भगवान के सुबह के महान दृश्य का आनन्द उठाया होता!'

'कोई खेद नहीं...' ठाकुर साहब ने कहा, 'मेरे आँखों की कमी-पूर्ति कानों की शक्ति द्वारा हो गयी है। मैं चक्रों का मधुर सरसराना सुन सकता हूँ। भगवान मुरलीधर के पवित्र खिलखिलाने की लहरों का आनन्द ले सकता हूँ।'

फिर अचानक उन्होंने राधेश्यामी की ओर उँगली उठाकर गर्जना की, 'मैंने आज मथुरा के स्वामी के पद शब्द सुने थे। तुम विश्वास करने के सिवा कुछ नहीं कर सकतीं। मैंने निश्चित रूप से उन्हें सुने। अचानक ही वह उदास आदमी आनन्द और उत्साह के पागलपन के अतिरेक में आ गया।

राधेश्यामी बूढ़े व्यक्ति से अब और नहीं बतियाना चाहती थीं। वे उत्सव के साथ बढ़ना चाहती थीं।

अब वह सीमा-चौकी तक पहुँच गया होगा। एक ने कहा, 'निश्चित है वह वहाँ पहुँच गया होगा। चलो हम वहाँ चलें।' दूसरी ने कहा। फिर बूढ़े आदमी से कहा, 'बूढ़े महाशय, यदि भीड़ के द्वारा तुम कुचला जाना नहीं चाहते हो, तो अच्छा है कि तुम इस जगह को छोड़ दो। हम तुम्हें ले जाएँगे और वहाँ के कदम्ब के वृक्ष के नीचे बैठा देंगे। पर हम यहाँ तुम्हारी रक्षा करते हुए नहीं रहेंगे। वहाँ तुम ठूँठों की तड़ाक से मारने की आवाज सुन नहीं सकते। मतलब है जुलूस थोड़ी देर के लिए रुक गया है और हम शहनाई का मधुर प्रेम संगीत भी सुन रहे हैं।'

'नहीं मेरी बेटियो, मुझे कहीं भी ले जाने की आवश्यकता नहीं है। मुझे यहीं छोड़ दो। और तुम जहाँ जाना चाहती हो जाओ। मेरा अपना आदमी मुझे मदद करने को है।'

'कौन तुम्हें मदद करने आ रहा है? क्या भगवान मुरलीधर स्वयं?' ऐसा कहते हुए वे सब कर्कश हँसी में फूट पड़ीं।

समय गुजरता जा रहा था। राधेश्यामी ने सोचा और गोपीनाथ बाजार को पार करते हुए तेज भागीं। घोड़ों के हौज में सब्जी व्यापारी आधा बोरी सड़े आलू फेंक आया। यदि कोई दूसरा दिन होता, तो राधेश्यामी का झुंड एक दूसरे से गुत्थमगुत्था होकर उस पर टूट पड़ता। आज ऐसा नहीं था। हर एक के लिए समय बढ़ता-सा लग रहा था।

बहुत-से पोस्टर, मन्दिर के कदाचार को जैसा कि पहले बाँकेबिहारी के मन्दिर में भ्रष्टाचार के बारे में था, दर्शाते हुए बाँटे जा रहे थे। पर लगता था शायद ही कोई उसमें रुचि ले रहा हो। किसी के पास उसकी एक झलक देखने तक का समय नहीं था। समय की कीमत थी और समय कम था।

बूढ़े आदमी ने अपनी लाठी को कसकर पकड़ा और उत्सुकता से शाम के उस युवा मित्र की प्रतीक्षा करने लगा। उसने प्रतीक्षा की और प्रतीक्षा की, किन्तु वह युवा लड़का नहीं आया। इसी बीच वह शोर शराबा, हल्ला-गुल्ला दूर चला गया, और तो और महान चक्रों का सरसराना करीब-करीब अश्रव्य हो गया।

ठाकुर साहब परेशान हो गये। उनके आस-पास का स्थान नीरव हो गया। निधुवन के ब्राह्मण के लड़के ने, जिसका काम पद और प्रार्थना का पाठ करते हुए, झाँझ बजाते हुए सारी जगहों पर जाना जाता है, अपना चक्कर पूरा कर लिया और बूढ़े आदमी के रास्ते को काटा।

'शायद वह भूल गया हो। सबसे परे वह एक छोटा लड़का है। मुझे अचरज नहीं करना चाहिए।' ठाकुर साहब ने अपने आप से कहा, 'शायद वह अपने वचन को याद नहीं रख पाता है।'

फिर उनका दिमाग भूतकाल की अँधेरी में सताने लगा। कोई इस बात को इनकार नहीं कर सकता कि जब-तब समय भी कठोर होता है। षड्यन्त्र रचना सिद्ध होता है। आदमी का परिवेश उसे क्रूर एवं तटस्थ बना देता है। क्या ऐसा नहीं है। मृणालिनी राधेश्यामियों-सी कठोर नहीं बन गयी होती, वह भी जीवन में इतनी जल्दी अन्तिम संस्कारों के प्रति। उसे अपने आपको इतना कंजूस नहीं दिखाना चाहिए था। पर सही रूप से इसे तुम क्रूरता कहोगे। फिर वह जितनी जल्दी भूत में धँसता है, उतनी ही जल्दी तल पर वापस तैरने लगता है। वह अपनी स्थिति से वाकिफ है। दूरी में रथ की बजती घंटियाँ उसके कानों तक पहुँचीं। उस मधुर झनझनाहट ने, लगता है उसके कानों में कुछ कहा, 'यदि दूसरों की भलाई करने का कोई मौका तुम तक आये उसके आखिरी क्षण तक का उपयोग कर लो।' इसके लिए किसी आवाज ने, कहीं से तैरती आयी कोई सुगन्ध ने उसके कानों में बहुमूल्य शब्द फुसफुसाये हैं। आजकल वे शब्दों के रत्न सुनहरी फ्रेम में मढ़ने योग्य हैं।

एक बार और रथ की नाकेबन्दी सुनी जा सकती थी। सारी घंटियाँ साथ-साथ धीरे-धीरे बजीं। बूढ़ा आदमी और अधिक अधीर हो गया। किन्तु ठीक उसी समय उन्होंने अपने पास किसी के कदम की आवाज सुनी, फिर उन्होंने अपनी लाठी कसकर दोनों हाथों से पकड़ ली, उत्सुकता भरी अपेक्षा में। लड़का आ पहुँचा, 'कृपया खड़े हो जाइए और मेरे साथ आइए।' लड़के ने बूढ़े आदमी की राहत के लिए कहा।

'तब तुम यहाँ हो। मुझे पक्का मालूम था कि तुम आओगे।' उसने लड़के को लाठी का दूसरा सिरा पकडऩे को कहा, एक को स्वयं ने पकड़ा और उसके पीछे चलने लगा।

वे गोपीनाथ बाजार में चलने लगे, अब बिल्कुल चुपचाप। सचमुच वह बड़ा ही प्यारा दृश्य था। बूढ़ा और युवा साथ-साथ एक दूसरे को रास्ता बताते हुए।

वह महान रथ तब पुलिस की सीमा-चौकी तक पहुँच चुका था। उसके बड़े चक्र, लगता था लोगों के समुद्र में डुबकी लगा गये।

'तुम काँप रहे हो, महाशय। मुझे कसकर पकड़ लो। क्या तुम रथ के किनारे तक जाओगे या यहाँ पर खड़े रहोगे? इस टीले पर?'

ठाकुर साहब ने चिल्लपों मचायी और कहा, 'मुझे उसके बहुत करीब ले जाओ ताकि मैं रथ के चन्दन की लकड़ी की बनावट स्पर्श से अनुभव कर सकूँ।'

लड़का कुछ देर के लिए बिल्कुल शान्त था। उसकी दुविधा को सूँघकर बूढ़े आदमी ने कहा, 'लगता है, मानवता के विशाल समुद्र में मुझे ले जाने में हिचक रहे हो। पर अब प्रतीक्षा मत करो, मेरे बेटे। जब सीमा चौकी के पास मोड़ पर रथ घूमेगा और आगे बढ़ेगा बगीचे की ओर, वे कहते हैं तब और बड़ा जमाव हो जाएगा।'

वह बूढ़ा आदमी और उसका युवा मार्गदर्शक आगे बढ़े। फिर अचानक पहले से लगता है उन्होंने अपने शरीर में अत्यधिक शक्ति पा ली, जैसे राधेश्यामी रहस्यपूर्ण ढंग से अपनी हड्डियों के ढाँचे में एक प्रकार की शक्ति प्राप्त कर लेती हैं। ठाकुर साहब भी लड़के की असहाय मिन्नतों की ओर ध्यान दिये बिना धक्कम-धक्का करने वाली भीड़ में से अपना रास्ता बनाने लगे। साथ ही लड़के को हाथ से खींचते हुए कई बार वे उस रेला-पेली में गिर-गिर पड़े, क्योंकि उनके पास उमड़ती भीड़ को झेलने की शक्ति नहीं थी। वह पुरानी जोधपुरी भी चिथड़ों में गिरने लगी। किन्तु उन्होंने उसे कसकर पकड़ लिया, जैसे कोई माँ अपनी छाती पर अपने बच्चे को पकड़ रखती है। उन्होंने चलना और चलना चालू रखा और रथ के बहुत करीब चले गये। वह जलती धूप को और उस जगह पर फैली चमेली की सुगन्ध को सूँघने लगे।

पवित्र रथ को छूना, उसके सामने सिर रखना और उसकी एक झलक प्राप्त कर लेना महान योग्यता की बात मानी जाती थी। ऐसा केवल कुछेक भाग्यशाली मात्र ही कर सकते थे, क्योंकि झुंड में कई थे। यह तो अनुपम अवसर था। अत: वे आगे धँस चले और जितना सम्भव हो उतना करीब उस पवित्र रथ के पास पहुँच गये।

ठाकुर साहब ने भी दृष्टि के अभाव एवं कमजोर शरीर के साथ न रह कर वही किया।

फिर एक बार रथ के चक्र ने घूमना शुरू कर दिया। एक शोर उठा। लोगों का समुद्र आगे धँसा। वह बूढ़ा आदमी और उसका युवा मार्गदर्शक डरने लगे कि दूसरे ही क्षण वह उत्तेजित भीड़ उन्हें कुचल न दे।

वह लड़का ठाकुर साहब को और आगे न बढ़ने के लिए और लौट चलने के लिए मना रहा था, क्योंकि एक और बहुत बड़ी उत्तेजित भीड़ की लहर उसकी ओर दौडऩे को थी।

किन्तु उस लड़के को यह मुश्किल से ही मालूम हुआ कि यह कैसे हुआ। वह बूढ़ा आदमी तीर के समान रथ की ओर भागा और देखने वाले उसके इशारे को समझकर उसे पकड़ सकें, इससे पहले ही वह पूरा का पूरा उस चक्के के नीचे कूद गया और दब गया।

जब उसका शरीर बाहर खींचा गया, तब भी वह साँस ले रहा था। पर एक क्षण के लिए, कुछ पल के लिए, फिर सब खत्म हो गया। उसका शरीर रथ से फेंकी गयी चमेली की मालाओं से ढँक गया। क्षण में उस मरते व्यक्ति ने उन्हें अपने सिर पर रखने की कमजोर-सी कोशिश की। इस पवित्र दृश्य ने हजारों हृदयों को दुख में डुबो दिया। उस सामान्य शोर में भी कुछ लोगों को उस पर दुख प्रकट करते सुना जा सकता था। ऐसा भी देखा गया, कुछ लोगों ने उसके होठों पर, जैसी कि रीति है, पानी की कुछ बूँदें डाल दीं।

वे प्रशंसा करने लगे कि वह पवित्र आत्मा है, क्योंकि वह रंगनाथ के रथ के चक्र से लिपट गयी। फिर उन्होंने शरीर को एक तरफ हटा दिया और वे बड़े चक्र आगे की ओर घूमने लगे।

रथ अपनी यात्रा पर बढ़ता रहा, क्योंकि बर्बाद करने का समय नहीं था। समय गुजरता जा रहा था। रथ को अपना रास्ता पूरा करना ही था। एक क्षण को बर्बाद करना भी देश और प्रजा के लिए आफत (संकट), कंगाली, बीमारी और मृत्यु को बुलाना था।

अत: ठाकुर साहब के रक्त के धब्बों को लेकर विशाल चक्के घूमते चले गये।


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