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उपन्यास

नीलकंठी ब्रज
इंदिरा गोस्वामी

अनुवाद - दिनेश द्विवेदी


सौदामिनी के चेहरे पर ज्यों-ज्यों दु:ख और अवसाद की छाया गहराती गयी, त्यों-त्यों डॉक्टर रायचौधुरी और माँ अनुपमा देवी की चिन्ता भी बढ़ती गयी।

एक दिन तड़के ही अनुपमा ने सौदामिनी के मुख पर यही छाया देखी। फौरन वह सजग हो इसका निदान सोचने लगीं। अभी हाल में ही सुदूर मानसरोवर से देवधरी बाबा का पदार्पण हुआ है। यमुना के किनारे पानी के बीच मचान बाँधकर रहने वाले देवधरी बाबा की चमत्कारपूर्ण कथाएँ किंवदन्ती की तरह ब्रजवासियों के मुख से प्रसारित होती रहती हैं। यह एक अच्छा मौका है। क्या पता, शायद देवधरी बाबा के करीब रहने से सौदामिनी की अन्तरात्मा का कोई बन्द द्वार खुल जाए। क्या खानदान की जो गौरवशाली परम्परा रही है, उसकी आत्मा के बन्द दरवाजे खुल जाने पर कोई असर नहीं डाल सकेगी!

देवधरी बाबा के आगमन का समाचार अत्यन्त आग्रह के साथ अनुपमा देवी ने सौदामिनी को सुनाया। थोड़ी देर बाद ही माँ-बेटी यमुना की रेत पर चल पड़ीं।

दोनों मौन चली जा रही थीं।

सौदामिनी को एक विचित्र-सी उत्तेजना का अहसास हो रहा था। किसके लिए है यह उत्तेजना, क्या यह साधारण-सा कौतूहल है, या फिर उसके भीतर उस भक्ति का उन्मेष हो रहा है, जिसकी भक्ति रस में भीगकर सभी गौड़ीय वैष्णव एक न एक दिन पागल हो जाते हैं, जिस रस को शृंगार रस का ही एक भेद मान सम्प्रदाय विशेष के लोग आपस में जूझते रहे। क्या यह वही अनचखा रस नहीं है? न-न इन सबको साधारण मानकर वह दिल से नहीं फेंकेंगी। स्वामी हरिदास की बाँकेबिहारी की प्रतिमा पर दृष्टि पड़ते ही वह इसी तरह की उत्तेजना महसूस करती है। इसी रस के नशे में मस्त एक और भी प्राणी है, जिससे सौदामिनी रू-ब-रू हुई है। वह रंगनाथजी के मन्दिर की एक वृद्धा है।

जब महाप्रभु रंगनाथ की परिक्रमा या विलास-विनोद की शोभायात्रा आम्रकुंज के लिए निकलती है, तब पुरोहितों के घर के पास बनी टूटी-जीर्ण-शीर्ण कोठरी से यह बूढ़ी बावली-सी निकल पड़ती है। उसके दुबले-पतले हाथ-पैरों में खून के दौरे से इतना उन्माद सा छा जाता है कि लगता है, वह सम्पूर्ण शोभायात्रा को आलिंगनबद्ध कर लेगी।

उस समय नृत्य के उन्माद में उसका पुराना लहँगा पसीने से भीगा जाता, धवल केशों का जूड़ा खुल जाता और जूड़े में खोंसी हुई चमेली की माला खिसक पड़ती।

कैसा अनोखा अनन्य प्रेम है! यह दुर्भाग्य-सौभाग्य दोनों ही तुच्छ हैं इस प्रेम के सामने। जब भी इस वृद्धा से सौदामिनी का आमना-सामना होता, उसकी आँखों में आँसू उमड़ आते। आखिर ये आँसू किसलिए उमड़ते हैं?

क्या सिर्फ साधारण कुतूहल वश?

सूखे-चिकने बालू पर माँ-बेटी मौन चली जा रही थीं। दो-चार कछुए जल से निकल बालू पर आ गये थे। धीर-समीर घाट के पास लगे अर्जुन के पेड़ों पर मोरों का झुंड पंख पसारे बैठा था।

दोनों पीपे के पुल के करीब पहुँचीं। यमुना की धारा कुछ सूख-सी गयी है। पानीगाँव की तरफ तो यमुना की धारा के बीच जमीन निकल आयी है। पल्ले पार देवधरी बाबा का तम्बू दिखाई पड़ा। इस समय भीड़ कम थी। पानीगाँव, बरसाना आदि गाँवों से भक्तजन आये हुए थे। वल्लभगढ़ और हाथरस के लोग बाद में आने वाले थे। पीपे से बना हुआ पुल पार कर बाबा तक नहीं पहुँचा जा सकता था। यहाँ-वहाँ रुके हुए पानी के वह बच्चे कुंड-जैसे दिखाई पड़ रहे थे, जिनमें भैंसें लोट लगाती रहती हैं। बालू का ऊँचा सा टीला पार कर गहरी यमुना का नीला जल दिखाई पड़ा। लोगों को आर-पार ले जाने वाले मल्लाह नावें बाँधकर वापस आ रहे थे। जब ये दोनों पहुँची, तो उन मल्लाहों ने कुछ और सवारियों का इन्तजार करने को कहा और रेत के टीले पर चढ़ने लगे। उन्होंने पलटकर देखा, कुछ और लोग भी आ रहे थे। गोविन्द मन्दिर की अन्धी मालिन भी आ रही थी। टटोल-टटोलकर रेत के टीले पर चढ़ने के कारण वह लड़खड़ाती-सी नजर आ रही थी। लुई बाजार के अस्तबल का बूढ़ा चौकीदार भी आ रहा था।

पीली गरदन वाले दो गरुड़ पक्षी रेत पर उड़ रहे थे।

सौदामिनी ने ब्रज के ख्यातिलब्ध शिल्पकार चन्द्रभानु राकेश को भी आते हुए देखा। वह राधाबाग होते हुए आ रहा था।

राधाबाग में ताड़ के पत्तों से निर्मित छतरी के तले बैठकर वह अष्टधातु की मूर्तियाँ गढ़ा करता है। निकुंज-वन के बाग में रासलीला के जो अपूर्व तैलचित्र बने हैं, वे उसी के बनाये हुए हैं। उसके पूर्वज कलिंग के थे। ताड़पत्र की छतरी के नीचे बैठे हुए वह अपने पुरखों के किस्से सुनाया करता है। हिन्दूकुश पर्वत की घाटियों से आने वाले तुर्क-अफगानों के विध्वंसकारी दिनों के किस्से। किस्सागो शान्तिभद्र ने सही कहा है,'तब कलिंग में चक्रवर्ती गंग वंश के राजा नरसिंहदेव का शासन था। उड़ीसा का दूसरे देशों से व्यापार बन्द था। सभापति चित्रकार के घर की छत नहीं थी। पेट में अन्न नहीं था, निराश्रित दशा, चित्रांकन का रिवाज ठप्प हो गया था।'

ऐसे दुर्दिन में चन्द्रभानु के बाप-दादाओं ने कँटीली झाड़ियों से घिरे मथुरा के मन्दिर के खँडहरों में पनाह ली थी। उनके कानों में लगातार ये स्वर गूँजते रहते, 'मन्दिर ढहाओ, मस्जिद बनाओ।'

चन्द्रभानु के अनेक पूर्वजों को मन्दिर के प्रांगण में जिन्दा जला दिया गया। यह दु:ख भरा इतिहास अब किंवदन्ती बनकर रह गया है। ताड़पत्र की छतरी तले बैठकर अलीगढ़ी रेत-मसाले से अष्टधातु में प्राण फूँकने और राधा की अनुपम देह को रगड़-रगड़कर चमकाने वाला शिल्पी चन्द्रभानु बस इससे ज्यादा कुछ नहीं बताता।...परन्तु जैसे-जैसे राधा की देह-कान्ति उजलाती...वैसे-वैसे उसके मुख की कान्ति दु:ख के कारण फीकी पड़ती जाती। जैसे धूप में दमकते बालूखंड पर किसी ने मछली का जाल फैला दिया हो। मानो काजी-कोतवालों का अनचीन्हा दल फिर से आ रहा हो। जिस तरह रत्नजटित अक्रूर घाट और चीरहरण घाट डुबो दिये गये थे, उस तरह ही इन अष्टधातु की मूर्तियों को भी खंड-खंड कर यमुना में फेंक दिया जाएगा।

नष्ट हुए ये घाट अब यमुना की रेत पर लाल पत्थरों के रूप में बिखरे पड़े हैं। अगहन-पूस के महीनों में जब यमुना चीरहरण-घाट से दूर हट जाती है, तब यह रेत बुढ़िया के श्वेत-केशों की तरह फैली दिखती है। तब ये खँडहर हजार बरसों से सोये पड़े नरकंकालों की तरह जाग उठते हैं। यमुना पुलिन की रेत पर एक रुँधा हुआ-सा हाहाकार पसर जाता है। रेत में से सर निकाले हुए मरे हुए कछुओं के खोखल और किसी सुहागिन की अधजली चुनरी इस बेआवाज रुँधे हुए हाहाकार को और भी दोगुना कर देते हैं।

सब लोग आ गये क्या-जल्दी करो, पश्चिम में बादल उमड़ रहे हैं।

चप्पुओं से छप्-छप् पानी ठेलते मल्लाहों के लड़कों ने नाव किनारे लगा दी।

इकट्ठे जनों में से कोई आवाज आयी, 'क्या कोई और भी रह गया है?'

एक और दल चीरहरण घाट की तरफ से आ रहा है। किन्तु यहाँ तक पहुँचने में अभी देर लगेगी। इसलिए पहले इतने यात्रियों को पार पहुँचा दिया जाए।

एक-एक करके लोग नाव में बैठने लगे। यमुना जल इस समय कुनकुना था। मेघाच्छादित होने के कारण पानी काला दिखाई दे रहा था।

देवधरी बाबा का मचान स्पष्ट दिखाई पड़ने लगा। उनके मचान के नीचे छोटी-छोटी कुछ अस्थायी झोपड़ियाँ थीं। इनमें बाबा के भक्तगण ठहरे हुए थे। बीच-बीच में एक-दो भक्त उठकर यात्रियों की देखभाल कर रहे थे।

'जमना मैया की जै' बोलते हुए एक-एक कर सभी यात्री नाव से उतर गये। बैठने के लिए दरी-चटाई कुछ भी नहीं थी। सभी रेत पर बैठ गये। मचान के ऊपर बनी झुग्गी से बाबा अभी तक नहीं निकले थे। रसभरी गजक के टुकड़े चारों ओर बिखरे हुए थे।

बूढ़ा घटवार गुहार उठा, 'दर्शन दो प्रभु'। दूसरों ने भी दोहराया, 'दर्शन दो प्रभु'।

बाबा ने दर्शन दिये। वे झुग्गी से बाहर निकल आये। देह पर जरा-सा भी कपड़ा नहीं था। एकदम नग्न। उनकी जटाएँ फागुन महीने की राधाकुंज की मिट्टी की तरह थीं। वे जंगली जीव जैसे लग रहे थे।

घुटने टेक सभी ने अपना सर झुकाया। फिर क्रमवार सभी ने अपने दुखड़े सुनाने शुरू किये।

बाबा के चेले बाँस की टोकरी ले एक-एक के पास जाकर भेंट बटोरने लगे। भेंट में ज्यादातर रसभरी और तरबूज ही मिले। चेलों ने सीढ़ियाँ चढ़कर मचान पर जाकर भेंट को बाबा के सम्मुख रख दिया। उन्होंने आशीर्वाद देकर फलों को प्रसाद-स्वरूप भक्तों में वितरित कर दिया।

यात्रियों ने श्रद्धा सहित प्रसाद ग्रहण किया। इस समय लज्जा निवारण के लिए बाबा ने जो मृगछाला पहन रखी थी, बीच-बीच में वह नीचे खिसक जाती थी। वे अपनी झोपड़ी में लौटने ही वाले थे कि एक भयंकर आर्तनाद ने न केवल उन्हें, बल्कि वहाँ इकट्ठे सभी लोगों को चौंका दिया।

सबने देखा एक हड़ियल बूढ़ा मचान का खम्भा पकड़े खड़ा है।

वहाँ उपस्थित जनसमूह में हलचल हुई-अरे, यह तो रामगोपाल मन्दिर का दोना बनाने वाला बूढ़ा है! क्या हुआ है इसे? सायटिका-कर्कट रोग।

जन समूह में से किसी ने कहा, 'कैंसर रोग'। बूढ़ा फिर चिल्लाया, 'भगवान, अभी मेरे छोटे-छोटे बच्चे हैं। यदि कहीं मैं मर गया, तो उन्हें रंगजी के भिखारिनों के बीच बैठना पड़ेगा।' बूढ़ा रेत पर लोट-पोट हो बिलख-बिलख कर रोने लगा।

देवधरी बाबा मौन हो गये। बाबा के इस मौन से सभी हताश हो उठे। एकाएक बाबा ने कोने में बची पड़ी हुई रसभरियाँ बूढ़े की तरफ फेंक दीं।

यही काफी था। दोना बनाने वाले बूढ़े के लिए तो यही बहुत था। उसने बालू पर माथा टेक बाबा को साष्टांग दंडवत किया। देवधरी बाबा अपनी झुग्गी में प्रवेश करने ही वाले थे कि एक दूसरे आर्तनाद ने उन्हें पलटकर देखने के लिए विवश कर दिया।

सौदामिनी को घोर अचरज हुआ। यह अनुपमा थीं।

'सुनिए प्रभु, आप अभी ना जा सकेंगे। आज तो आपको मेरी बात सुननी ही पड़ेगी।'

भक्त मंडली के बीच से उठ उन्होंने एक दूसरा ही रूप धारण कर लिया। उनकी आँखें आरक्त हो उठीं। वे उत्तेजना वश थर-थर काँपने लगी और सौदामिनी की ओर इंगित कर चीख उठीं, 'प्रभु, मैं अपने लिए कुछ भी नहीं माँगती। पर आप इस लड़की की जिम्मेदारी तो लीजिए। इसका जीवन मेरे साथ बँध गया है। मुझे इस बात का भय है कि मैं इसका उचित मार्गदर्शन नहीं कर सकूँगी। मैं भय से स्तब्ध रह गयी हूँ।'

भीड़ में काना-फूसी होने लगी-क्या यह विधवा है? तब तो इस दुखियारी को अकेले ही यात्रा करनी पड़ेगी। ब्रज में तो कुत्तों-भेड़ियों की भरमार है।

चुप हो जाइए, देखो, बाबा आशीर्वाद दे रहे हैं। बाबा बोले, 'ठीक है कि यह लड़की कुत्तों-भेड़ियों के बीच है, किन्तु चिन्ता की कोई बात नहीं। सीता का स्मरण नहीं है क्या? वे भी तो ठीक इसी प्रकार कुत्तों-भेड़ियों के मध्य रहीं। पर क्या कोई भी उनका बाल बाँका कर पाया? मनुष्य खुद ही अपना मित्र, दुश्मन या स्नेहमयी माँ है। देखो, पश्चिम में मेघ घुमड़ रहे हैं। मल्लाहों की वापसी का समय हो गया है। जाओ, लौट जाओ।'

भक्तों ने साष्टांग दंडवत किया। उनके माथे और बाल धूल-धूसरित हो गये।

नाव पर सवार हो सौदामिनी ने मुडक़र देखा, सभी आ गये हैं। देवधरी बाबा भी अपने चेलों के संग मचान के ऊपर बनी झुग्गी में चले गये हैं।

सौदामिनी ने दोबारा पलटकर देखा। देवधरी बाबा की मचान का खम्भा थामे कोई खड़ा था।

यह तो वही अष्टधातु का बूढ़ा शिल्पी चन्द्रभानु राकेश है। हवा के झोंकों की वजह से उसके वस्त्र शरीर के चिपक गये हैं। इस कारण वह दुबला और बीमार दिखाई पड़ रहा है। 'राकेश लौट जाओ।' भीड़ में से किसी ने आवाज दी, किन्तु शिल्पी ने मुडक़र भी नहीं देखा।

'आ जाओ, नाव फिर नहीं मिलेगी।'

किसी ने फब्ती कसी, 'वह तैरना जानता है।'

किन्तु राकेश में जरा भी हलचल नहीं हुई। एक मुसाफिर बोला, 'काफी अर्से से यह शिल्पकार बहुत ही उदास दिखाई दे रहा है। आपको स्मरण होगा, जब मौनी बाबा की अर्थी यमुना तट के बालू पर रखी गयी थी और उनके शिष्यों ने भिखारियों पर ताँबे-चाँदी के सिक्के लुटाने शुरू किये थे। शायद आप लोगों को याद होगा, तब इसी शिल्पी ने शव पर लुटाये जा रहे सिक्कों के लिए भिखारियों के बीच हुए घमासान का हू-ब-हू चित्र उतार कर रख दिया था। जिस तरह कसाई द्वारा फेंके गये बकरे के मांस पर गिद्ध टूट पड़ते हैं, उसी तरह की चित्रण चित्र में प्रतीत हो रहा था। मैंने तो राकेश को सलाह दी थी कि इस चित्र को खत्म कर दो।'

'कितना वीभत्स था वह चित्र!'

अचानक कोई बोल पड़ा, 'आजकल उसकी दुकान पर कोई ग्राहक भी नहीं दिखाई देते, एक ही मूर्ति को घंटों घिसता बैठा रहता है।'

'अष्टधातु की नक्काशी का धन्धा इन दिनों मन्दा भी है। ज्यादातर शिल्पकारों के घरों पर छप्पर भी नहीं है। राकेश के लिए रुके रहना अब नामुमकिन है। चलो चलें। मौसम भी ठीक नहीं है।'

एक के बाद एक सभी नाव पर सवार हो गये। एक अनजाने दर्द से अनुपमा बेचैन हो उठीं।

देवधरी बाबा ने सिर्फ सीता का किस्सा सुनाया। न जाने कितनी सीताएँ इस पृथ्वी पर पैदा हुई हैं। अनेक सीताओं की दास्तानें इस ब्रजभूमि की माटी में दबी पड़ी हैं।

किसी ने भी नहीं सोचा होगा कि बारिश इतनी जल्दी होने लगेगी। हवा तेज हो गयी। दो-एक बोल उठे, 'केसी घाट तक जाने की जरूरत नहीं है, नाव वंशीवट पर बाँध दो।'

यमुना की रेत पर बारिश की बूँदें तड़ातड़ गिरने लगीं।

नाव वंशीवट घाट पर जा लगी। लोग नाव से उतरकर भागे। किसी को कोई भी परवाह नहीं थी। दोनों माँ-बेटी ने दौड़कर वंशीवट की टूटी दालान में शरण ली। देवधरी बाबा का मचान आँखों से ओझल हो चुका था। बारिश के सघन धुँधले पर्दे के पीछे सब कुछ एकरूप हो गया था। दालान की दूसरी तरफ बैठे हुए भक्तजनों के बीच बैठा बलभद्र अखाड़े का घटवार बोला, 'बहुत बेमौसम की बरखा है यह।'

एक और बोला, 'अच्छा ही हुआ न, देख नहीं रहे धरती कैसी सूखी पड़ी है।'

'अब की यमुना की रेत में तरबूजों की फसल अच्छी होगी।'

'इस बार राधेश्यामी औरतें तरबूज खाकर अपने पेट की आग बुझा सकेंगी।'

'तब तो वे और कुछ खाना बन्द कर देंगी। क्योंकि एक-एक पैसे के बीस-बीस तरबूज मिलेंगे।'

'बिल्कुल ठीक कहा। इनमें कोई तो तादाद से अधिक खाकर शाहजी के मन्दिर की सीढ़ियोंया फिर लालाजी के मन्दिर के सामने कै कर-कर के मौत की घडिय़ाँ गिनेगी। ...मरी हुई बुढ़िया ने अपने क्रिया कर्म के लिए जो पैसे जमा किये होंगे, उन्हें लेकर दलालों में जूतम पैजार होगी। मैंने खुद अपनी आँखों से देखा है। ऐसे मौके पर एक-दो ठोकरें मुर्दे को भी पड़ जाती है।' ऐसा कहते हुए बलभद्र अखाड़े के घटवार ने उसाँस भरकर कहा, 'ब्रज में यह सब क्यों हो रहा है। यह धाम तो संसार का सार है, जगत का मर्मस्थान है।'

मैदा की बोरियों की तरह गुड़ी-मुड़ी लोगों में से कई ठठाकर हँस पड़े।

बारिश रुक गयी। देवधरी बाबा का मचान अब स्पष्ट दिखाई दे रहा था। सतर्कता के साथ एक-एक कर लोग टूटी दालान से बाहर निकल आये।


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