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उपन्यास

नीलकंठी ब्रज
इंदिरा गोस्वामी

अनुवाद - दिनेश द्विवेदी


गोपीनाथ बाजार के बीचो.बीच बिहारीमोहन कुंज है। यहाँ एक प्राचीन मन्दिर था। मन्दिर से लगा हुआ एक पुराना दालान। बिहारीमोहन कुंज के सामने थी रहस्यमयी हाड़ाबाड़ी। इसके दरवाजे मामूली लकड़ी के थे। परन्तु दरवाजा खोलकर अन्दर जाने पर एक दूसरी ही दुनिया नजर आती थी। यहाँ राई.दामोदर का मन्दिर है। इसके अलावा अनेक कोठरियाँ भी हैं। कबूतर के दड़बे के समान घास.फूस से बनी झोपडिय़ों में जीवित कंकाल जैसी वे बूढ़ी विधवाएँ रहती हैंए जो राधेश्यामी होकर अपना जीवन काट रही हैं। बिहारीमोहन कुंज में मन्दिर की पूजा.अर्चना आलमगढ़ का एक पुजारी करता था। लोगबाग उसे आलमगढ़ी कहकर पुकारते थे। मन्दिर के स्वामी ब्रज से बाहर रहते थे। आलमगढ़ी ने मन्दिर.संचालन में पूरी आजादी का फायदा उठाया था। यहाँ तक कि लोग कहते हैं कि आखिर में आलमगढ़ी ने प्रतिमा के चाँदी.सोने के जेवरों तक पर हाथ साफ कर दिये थे। किन्तु इस बीच वृन्दावन के कुछ निठल्ले युवक इसके पीछे पड़ गये। वे मन्दिर के सामने की चाय की दुकान पर शाम के समय अड्डा जमाते तथा ठंड के दिनों में मन्दिर की सीढ़ियोंपर बैठकर गजक खाया करते।

इसी दरम्यान इन निठल्ले युवकों ने ब्रजधाम में कुछ अनोखे कारनामे कर दिखाये। किसी मन्दिर के कोई कर्मचारी ने देवता का करधौना चुरा लिया। इन युवकों ने उसके गले में लोहे का करधौना पहनाकरए एक सजे.धजे गधे पर बैठकर भीड़.भरी गलियों से उसकी शोभायात्रा निकाल दी। वृन्दावन के बच्चे ही नहींए बल्कि कुआँ पूजने जाती हुई स्त्रियों के साथ चलते हुए हिजड़े तक इस जुलूस में शोरगुल करते शरीक हो गये थे।

मन्दिर की सीढ़ियों पर खड़ा आलमगढ़ी बड़बड़ा उठा थाए श्साले अब जहन्नुम में जाएँगे।श्

परन्तु उस दिन से आलमगढ़ी डर जरूर गया था। सीढ़ियोंपर बैठकर गजक खाने वाले लड़कों को उसने खुश करना चाहा था।

शशिप्रभा नाम की एक कम उम्र विधवा मन्दिर के कामकाज में आलमगढ़ी की मदद किया करती थी। आखिर में वह आलमगढ़ी के संग एक ही कोठरी में रहने लगी। पर इसे लेकर आलमगढ़ी को सीढ़ी पर बैठकर गजक खाने वाले लड़कों से भयभीत होने की कोई आवश्यकता नहीं थी। और भी लोग थेए कई ऐसी विधवाओं को रखे हुए थे। मरते वक्त सिर्फ दो विधवाएँ ही बेफिक्र होकर मरी थींए क्योंकि पुजारियों ने अपनी इन रखैल विधवाओं का क्रिया.कर्म किया था।

आलमगढ़ी के दिन सुख.चैन से कट रहे थे। किन्तु अकस्मात एक ऐसी घटना घटीए जिससे उसका सुख.चैन भंग हो गया। दरअसल घटना इस तरह हुई। रात के समय मन्दिर और बाजार.हाट सभी के पट बन्द हो चुके थे। यहाँ तक कि गलियों में बाहर सोने वाले भी सो चुके थे। केवल मन्दिर के सामने वाली बड़ी दुकान में मद्धिम.मद्धिम प्रकाश हो रहा था। आलमगढ़ी जरूर जाग रहा था। उसके पास खटिया पर बेफिक्री से शशिप्रभा सोयी पड़ी थी।

ठीक तभी घोड़े की टापें और ताँगे की पहियों की घरघराहट सुनाई पड़ी। शोर उसके दरवाजे पर आकर रुक गया। आलमगढ़ी ने खिड़की खोलकर देखाए नीचे ताँगा खड़ा है। लालटेन की बत्ती तेज कर हड़बड़ाया.सा नीचे उतर आया। आगन्तुक के मुँह के सामने लालटेन ले जाने पर विस्मय.विमूढ़ रह गया। ये बिहारीकुंज के वर्तमान मालिक वृद्ध कृष्णकान्त ठाकुर थे। लोगों के बीच वे ठाकुर साहब के नाम से जाने जाते थे। उनके संग उनकी चालीस वर्षीया अविवाहित बेटी तथा दिमागी बीमारी से ग्रस्त पत्नी भी थी। उनके म्लान चेहरों को देखकर ऐसा आभास होता थाए मानो प्रेतात्माओं की टोली आधी रात को धमक आयी हो।

आलमगढ़ी ने मृणालिनी से पूछाए श्बिटियाए बगैर कोई खबर दिये कैसे आना हुआघ्श्

श्यह सब बाद में बताऊँगी। पहले पिताजी को सँभालो। गत दस वर्षों से खटिया पकड़े हैं। इन दिनों उन्हें बिल्कुल दिखाई भी नहीं देता है।श्

दोनों ने कृष्णकान्त ठाकुर को सहारा देकर ताँगे से उतारा। ताँगे से उतारते हुए उनके घुटनों से चरमराहट सुनाई पड़ी। इसी दरम्यान शशिप्रभा भी आहट पाकर उठ आयी थी। वह खटिया उठाकर बरामदे में बिछा गयी। सारा असबाब भीतर उठाकर ताँगे को विदा करने के बाद मृणालिनी अन्दर आयी। आलमगढ़ी ने पूछाए श्आज क्या गाड़ी बहुत देर से आयीघ् खाने.पीने का इन्तजाम किया जाएघ्श्

श्नहींए खाने.पीने की जरूरत नहीं है।श्

श्तो गर्म चाय पीकर गरमाहट का अनुभव कीजिए।श् मृणालिनी मुँह.हाथ धोने कुँए की तरफ चली गयी। शशि ने गोरसी में कजलायी आग में नये कंडे डाल दिये।

मुँह.हाथ धोकर मृणालिनी शशिप्रभा के पास आ बैठी।

श्शायद तुम्हारा ही नाम शशिप्रभा है नए मन्दिर में तुम्हारा बनाया हुआ भोग न लगाये जाने के लिए ही किसी ने पिताजी को गुमनाम पत्र लिखा था। पिताजी को तो कुछ दिखता नहींए इसलिए मुझे ही सबकुछ करना पड़ता है। इन दोनों को लेकर बड़ी विपदा में पड़ गयी हूँ।श्

शशिप्रभा अपलक देखती रहीए परन्तु कुछ बोली नहीं। इसी बीच आलमगढ़ी भी गोरसी के पास आ बैठा।

श्बिटियाए तो तुम लोग कुछ दिनों के लिए आये होघ्श्

श्कुछ दिनों के लिए नहींए हमेशा रहने के लिए आ गये हैं। घर का सारा माल.असबाब बेच आये हैं। लगता है हमारी दशा के बारे में तुमने सुना नहीं।श्

श्श्रीधाम आनेवालों के मुँह से थोड़ा.बहुत सुना है। तुम्हारे दो भाई भी तो हैं!श्

श्आप जानबूझकर अनजान बन रहे हैं। बड़े भाई की मौत मौलानापुर गोलीकांड में गाली लगने से हुई। क्या आपसे यह छिपा हैघ् उसकी पार्टी के लोग अँधेरे में छिपकर आये और बता गये कि यह पार्टी के नाम पर गुंडागर्दी कर रहा था। मौलानापुर में गोली से भून दिये जाने पर उसकी लाश की शिनाख्त के लिए जाना पड़ा था। इन बातों को मुझे याद न दिलाइए।श्

श्शशिए जाओ चाय ले आओ।श्

मृणालिनी की बातें सुनकर शशि चाय बनाना छोड़ मारे अचरज के उसका मुँह देखती रह गयी।

श्सुना थाए तुम्हारा छोटा भाई भी ठीक रास्ते पर नहीं चल रहा है!श्

श्वह भी इसी पार्टी में है। कभी.कभार रात के अँधेरे में छुपकर आता है। राक्षस बनकर आता है। भूख की मार से विचित्र.सा दिखता है। उसे देख मेरे हाथ.पाँव तो मारे भय के सुन्न पड़ जाते हैं। तीन जनों के हिस्से का सारा भात उसकी थाली में डालकर मैं तो उसके पास सहमी.सिकुड़ी बैठी रहती हूँ। खाते.खाते बक.बक करता रहता है। अब बहुत दिन नहीं रह गये हैं। एक भयंकर इन्कलाब होगा। कई जन मरेंगे। दीदीए पर तू इस बात का गम न करना कि जिन्दगी में कुछ पाया नहीं। तेरी खुदकिस्मती होगी यह कि तू यह इन्कलाब देख सकेगी। मुझे पूरा भरोसा है। कि तू अवश्य ही यह क्रान्ति देखेगी। आलमगढ़ी जीए पूरे वक्त मैं डरी रहती हूँ कि न जाने कब किसको मारकर आ जाए।श्

मृणालिनी का चेहरा पीला पड़ गया। नथुनों के करीब दोनों तरफ लकीरों के उभर आने से वह अजीब.सी दिखाई देने लगी। सबसे अधिक डर यदि इस धरती पर उसे थाए तो वह यह कि एक न एक दिन उसका भाई नरहत्या अवश्य करेगा।

शशि उठी और ठाकुर साहब और उनकी पत्नी को चाय दे आयी। बाकी ये तीनों भी चाय पीने लगे। कुछ देर के लिए वार्तालाप बन्द हो गया।

चाय का गिलास मुँह से लगाकर चुस्की लेते हुए मृणालिनी गौर से शशि का चेहरा देख रही थी। कमसिन लड़की। प्यारा.प्यारा चेहरा। आलमगढ़ी पुजारी और इसमें जमीन.आसमान का फर्क है। पुजारी ने तीनों गिलास एक जगह रख कहाए श्अब सोने का इन्तजाम किया जाए। मैं ऊपर चला जाऊँगा। शशि को जमीन पर सोने की आदत है। हमारा कमरा साफ.सुथरा है। सबेरा होने में भी अब देर नहीं है।श्

श्मेरी अब सोने की इच्छा नहीं है। डोकर.डोकरी ;बूढ़ा.बूढ़ीद्ध का ही प्रबन्ध कर दो। शृंगारवट के घंटे टनटनाने का समय हो गया है।श्

शशि बोलीए श्मेरी भी अब सोने की मंशा नहीं है। जमुना पार घटवारों के बैठने का समय हो गया है। उन्हें खाँसते.खँखारते जाते हुए मैंने अभी.अभी सुना है।श्

श्तुम्हारा भी तो जमुना जाने का समय हो गया है। अच्छा हुआए मैं भी तुम्हारे साथ डुबकी लगा आऊँगी। जरा बत्ती देनाए इतने दिनों में मन्दिर के बारे में भूल.भाल गयी हूँ।श्

बत्ती ले मृणालिनी बाहर आयीए यह है पक्का कुआँ और ये रहीं ऊपर जाने के लिए टूटी.फूटी सीढ़ियाँ। थोड़ा लेटना अच्छा रहता। लेटने पर नींद आना सम्भव नहीं। काफी लम्बे अर्से से एक अज्ञात भय मृणालिनी के मन में समा गया है। इससे वह बहुत तकलीफ झेल रही है। अपने बाप को बोझा ढोने वाले गधे से ज्यादा कुछ नहीं समझती। ऐसा गधाए जो कि वजन के बोझ से अधबीच में ही मुँह के बल गिरकर रक्तवमन करता हुआ दम तोड़ देगा।

कुछ कोठरियाँ कुएँ की दाहिनी तरफ भी थीं। दो से लेकर पाँच रुपये तक किराया देकर राधेश्यामी वृद्धाएँ और भिक्षावृत्ति के सहारे रहने वाली कुछ वैष्णव स्त्रियाँ इनमें रहती थीं। मृणालिनी ने बत्ती उठाकर देखाए दरवाजे बन्द हैं। किसी बुढ़िया के खाँसने की आवाज आ रही थी। ये राधेश्यामी बुढिय़ाँ देर तक नहीं सो सकतीं। बत्ती उठा मृणालिनी ने आखिरी कोठरी की तरफ देखा। पिछली बार उसने एक अत्याधिक जरा.जर्जरित बुढ़िया को उसमें रहते देखा था। वह इतनी बूढ़ी थी कि जमुना स्नान के लिए उसे दो बुढिय़ाँ पकड़कर ले जा रही थीं। यह राधेश्यामी बुढ़िया खटिया पर बैठे.बैठे अभागी सती की कथा सुनाया करतीए लखपति राजा के संग तीन सौ रानियों के सती हो जाने की कथा। वृन्दावन का उद्धार करने वाले गोस्वामियों की कथा। मीराबाईए वल्लभाचार्यए रूपगोस्वामीए सनातन गोस्वामीए मानसिंहए असंख्यों भक्तमना राजपूतानियों की कथाएँ।

आगे बूढ़ी की कोठरी थी। मृणालिनी चौंक उठी। घुन खाये सड़े हुए किवाड़ खुले पड़े थे। भीतर कोई नहीं था।

मृणालिनी को शशि का कंठ सुनाई पड़ाए श्दीदीए अँधेरे में क्या कर रही होघ् चलो चलेंए जाने का समय हो गया है।श्

श्क्या डोकर.डोकरी के सोने का बन्दोबस्त हो गया हैघ्श्

श्पुजारी ने इन्तजाम कर दिया हैए चलोए राधा.अष्टमी के कारण स्नान के लिए ठीक.ठाक जगह मिलना मुश्किल हो जाएगा।श्

श्अच्छाए मेरे कपड़े भी अपने साथ धर लो। बत्ती भी ले लो। गली में अभी भी गहरा अँधेरा है।श्

दोनों गोपीनाथ मन्दिर तक पहुँचीं। अँधेरा तब भी था। झुट.पुटे में दोनों प्रेतात्माओं.सी लग रही थीं। इसी बीच जमुना.तट पर सिर मुड़ी विधवाओं का झुंड आ पहुँचा। वे सब भी प्रेतात्माओं.जैसी लग रही थीं।

श्रुको दीदीए सावधानी से नीचे उतरना। यहाँ एक खतरनाक जगह है।श्

श्खतरनाक मानेघ्श्

श्लोगों का कहना है कि इस जगह के जल में किसी देवता का वास है। यहाँ बहुत लोग मरे हैं। अभी सिर्फ दो दिन पहले बरसाना मन्दिर की एक मालिन मरी है। कछुओं ने खाकर उसकी जो दुर्गति कीए उसका वर्णन नहीं किया जा सकता।श्

श्तो रहने दोए और थोड़ा आगे चलते हैं।श्

श्नहीं दीदीए घबराने की जरूरत नहीं। वह भयानक जगह तो पीछे रह गयी। आप इधर सँभलकर आइए।श्

दोनों जनीं रेत पर आ गयीं। बालू पर चलना बहुत सुखद लग रहा था। जमुना शान्त थी।

श्दीदीए यहाँ ठीक रहेगा।श्

जवाब का इन्तजार किये बगैर शशि कपड़े उतारने लगी। आखिर में उसके शरीर पर एक पतली चादर के सिवाय कुछ भी नहीं रह गया।

श्दीदीए पानी में उतरने में आपको डर लग रहा होगा। आइएए आपको सहारा देकर ले चलूँ।श्

मृणालिनी के कुछ बोलने से पहले ही अर्धनग्न शशि ने उसे अंक में भरकर खींच लिया।

इस स्पर्श से मृणालिनी ऐसे चौंक पड़ींए मानो भूत देख लिया हो।

श्हटोए इस प्रकार मुझे मत छुओए भिनसारा होने को है। अच्छी तरह कपड़े पहनकर पानी में उतरो।श्

क्यों दीदीए भिनसारा होने में अभी बहुत देर है। मैं तो हमेशा ऐसे ही नहाती हूँ। मेरे पास कपड़ों की बहुत तंगी है।श्

यद्यपि अन्धकार थाए फिर भी मृणालिनी उसका यौवन देखकर चकित रह गयी। उसे दो दशक पहले का अपना यौवन शशिप्रभा में दिखाई पड़ा। एक ठंडे.से एहसास ने उसके शरीर को जकड़.सा लिया। काँपती आवाज में भर्राये कंठ से बोलीए श्जरा ठीक से कपड़े पहनकर पानी में उतरोए या दूर जाकर नहाओ। मुझे अकेला नहाने दो।ण्ण्ण्देखती क्या होण्ण्ण्जाओ मुझे अकेला छोड़ दो।श्

शशि दूर हटकर कुछ देर तक मृणालिनी को घूरती रही। इसके बाद सहज नहीं हो सकी। वह पानी में उतर गयी। इस समय यमुना.जल कुनकुना रहता है। और दिन होताए तो शशि काफी देर तक तैरती. अठखेलियाँ करती रहतीण्ण्ण् शृंगारवट का घंटा बजते.बजते वह पानी के बाहर आ जाती थी। आरती का घंटा अभी तक नहीं बजा था। लगता था भिनसारा होने में अभी भी विलम्ब है।

दोनों ने चुपचाप वस्त्र बदले और घर की तरफ लौट चलीं। शशि चुप थी। मृणालिनी ने बातचीत शुरू कीए श्इस बार हम लोग सब कुछ गँवा कर यहाँ आये हैं। हमारी वापसी के सारे रास्ते बन्द हो चुके हैं।श्

श्मतलबघ्श्

श्गुजरे पच्चीस बरसों से सिर्फ बैठकर खाया है। अब कुछ नहीं बचाए सब कुछ खत्म हो गया है।श्

श्सुना हैए आपके पिताजी ने स्वतन्त्रता.आन्दोलन में हिस्सा लिया थाघ्श्

श्गलत सुना है। पिताजी ने तो अँग्रेजों की तारीफ की थी। अब तक करते हैं। आन्दोलन में भाग लेने की बात निरी झूठ है। वे इतने महान नहीं हैं।श्

श्दीदीए यही वह सर्वनाशी जगह हैए आप मेरा हाथ पकड़ लीजिए।श्

श्नहीं.नहींए मुझे डर नहीं लग रहा। ऐसा लग रहा है कि कोई पीछे से आवाज दे रहा है।श्

श्घटवार दे रहा है। आज हल्दी.कुंकुम का टीका नहीं लगावाया न।श्

श्तुम क्या हमेशा टीका लगवाती हो।श्

श्बिना लगाये मानता ही नहीं वहए दो पैसे के लिए ही तो आधी रात से आ बैठता है।श्

खतरनाक जगह पारकर वे घाट की सीढ़ियाँ चढ़ने लगीं। रेत में धँसी सदियों पुरानी सीढ़ियाँ।श्

श्हम बिहारीमोहन कुंज को बेचने का निश्चय कर यहाँ आये हैंएश्

शशि सुनकर अचकचा उठीए फिर अपने को संयत कर पूछने लगीए श्मन्दिर बेचकर रहेंगी कहाँघ्श्

श्राधेश्यामी बुढ़ियों की कोठरियों में एक खाली जान पड़ती है।श्

श्वह गन्दी कोठरी है.बुढ़िया वाली। छिरू छिरूए आप नहीं जानतीं वह बुढ़िया उस कोठरी में कितनी खराब बीमारी से मरी है। कितनी खुशामदें कीं मैंने मेहतर कीए फिर भी अन्दर जाने को तैयार नहीं हुआ।श्

श्ये सब फिजूल की बातें हैं। फिर हम एकदम मजबूर हैं। मन्दिर बेचने के बाद हमें ट्रस्ट में मिलने वाली आमदनी से गुजर.बसर करनी होगी। दूसरा कोई उपाय नहीं हैए क्योंकि हम सब बेच.खोचकर हिसाब चुकता करके ही आये हैं।श्

शशि उसके आगे कुछ न कह सकी। उसे लगाए उसकी आँखों में दाह पड़ रही है। मन्दिर बिकने का मतलब है.सब कुछ खतम।

श्शशिए घाट के मन्दिर के पट अभी.अभी खुले हैं। मैं मन्दिर में प्रणाम करके ही जाऊँगी।श्

दोनों के मन्दिर से लौटते वक्त भी अँधेरा कम नहीं हुआ थाए परन्तु गोविन्द जीए राई.दामोदरए और हनुमान मन्दिर की शंख और घंटों की ध्वनि से सारा वृन्दावन गूँज उठा। इससे पहले ऐसे सुप्रभात की बेला में हजार कष्टों के बीच भी शशि आनन्द का अनुभव करती थीए किन्तु आज उसे एकान्त की दरकार थीए जहाँ बैठकर वह कुछ सोच.विचार सके।

 


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