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उपन्यास

नीलकंठी ब्रज
इंदिरा गोस्वामी

अनुवाद - दिनेश द्विवेदी


श्यदि तुम आलमगढ़ी के साथ मन्दिर में नहीं रह रही होतीए तो शायद एक अच्छी जिन्दगी बिता सकती थी।श्

शशि ने सर झुकाकर उत्तर दियाए श्मेरे पास इसके सिवाय कोई चारा नहीं थाए परन्तु आलमगढ़ी ने मेरा कोई अनिष्ट नहीं किया। युगल उपासना के नाम पर ब्रज में अनेक स्त्रियाँ पुरुषों के साथ रह रही हैं। इस पृथ्वी पर जिसका कोई धनी.धौरी न होए अन्धकार में डूबे हुए भविष्य की आशंका ने जिसे किंकर्तव्यविमूढ़ कर दिया होए उसके पास इसके सिवाय कोई दूसरा उपाय नहीं है। पर यह सब आप जैसों की समझ में नहीं आएगा। यह सब वही समझ सकेगाए जिस पर बीत चुकी है।श्

श्मतलब आलमगढ़ी ने तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ा।श्

श्आपका मतलब मैं समझती हूँ। सुनिएए एक दिन उसके कहने से मैं निर्वस्त्र हो गयी। दीपक के उजाले में उन्होंने मुझे चूमती नजर से देखा। इसके बाद दीपक बुझाकर अपने बिस्तर पर जाकर सो गये।श्

श्आलमगढ़ी ने तुम्हारा अनिष्ट नहीं किया।श्

श्वे कर नहीं सके।श् सौदामिनी ने समय बीतने के साथ जिस मानसिक बदलाव की बात सोच रखी थीए उसमें ऐसा कुछ भी नहीं हुआ।

पिता के अस्पताल में नर्स की जिम्मेदारी उसी ने सँभाल रखी थी। परिक्रमा की राह के रोगियों के घाव धोने का कार्य तथा गन्दगी से अलग करने में वह एकदम बेहिचक रहती।

एक दिन वह बालाजी के मन्दिर की सीढ़ियों पर मृत्यु का क्षण गिनने वाले एक मरीज को अपने पिता के साथ जाकर उठा लायी। वह आदमी चिल्ला.चिल्ला कर भीख माँगा करता था। एक दिन सौदामिनी ने जब उसके पैर के घाव धोयेए फिर उसे कुछ खाने को दियाए तो वह झल्लाकर बोलाए श्मुझे बचाने की कोशिश मत करो। मैं बहुत दूर से आया ही हूँ कि ब्रजधाम की रज प्राप्त कर सकूँ।श्

फिर वह ज्यादा दिनों तक नहीं जी सका।

दूसरा मरीज लुई बाजार की घुड़साल में जमीन पर मौत का इन्तजार करते हुए पड़ा रहता था। रायचौधुरी ने उसका मुआयना करने पर पाया कि रोटी और उपचार के अभाव ने उसे मौत के मुँह में पहुँचा दिया है। पहली बार सौदामिनी ने किसी को भूख की यातना से दम तोड़ते देखा।

शुरुआती दौर में सौदामिनी ने उत्साह में आकर रायचौधुरी की काफी मदद की। कभी.कभी उसे लगने लगता कि जिन्दगी से उसने सुलह कर ली है।

दो माह तक लगातार अपने पिता के साथ सैयद बाजारए लुई बाजारए वनखंडी महादेवए अनाजमंडीए यहाँ तक कि हरिजन मोहल्ले में उपजी हुई काँटों की झाड़ियों और सुनसान स्थानों में भी मरीजों को खोजती फिरती थी। उसने भूखे मरते हुए अनेक अधमरे भक्तों को ब्रज की माटी पाने के लिए मौत की घड़ियाँ गिनते हुए देखा। ये सभी फटेहाल भिखारी थे। कुछ ने अपने कफन.काज के लिए कमर की टेंट में पैसे खोंस रखे थे।

इसी व्यस्तता के बीच सौदामिनी एक दिन यमुना स्नान के लिए गयी। असहनीय धूप के कारण घटवार उठ चुके थे। तर्पणादि के लिए आये हुए कुछ लोग यहाँ.वहाँ डटे हुए थे।

सौदामिनी को दिखाई पड़ा. पीपे के पुल पर एक औरत खड़ी है। निकट जाने पर मालूम पड़ा कि यह तो शशि है।

श्मेरी बहुत दिनों से इच्छा थी कि आपसे अकेले में बात करूँ।श्

पीपे से बने पुल के एक कोने में दोनों जा बैठीं। पुल के करीब ही जनशून्य जगह पर किसी के क्रियाकर्म सम्बन्धी तुलसीए फूल.मालाएँ आदि पड़ी थीं। जल पर पड़ती हुई पुल की छाया में उनकी परछाइयाँ जुगनू.सी चमक रही थीं।

श्इस समय नहाना ठीक होगाए क्योंकि भीड़ छँट चुकी है।श् इस पर सौदामिनी ने अपनी सहमति व्यक्त की। कपड़े बदलकर दोनों पानी में उतरीं। कछुओं से अपने आपको बचाते हुए कुछ देर दोनों नहाती रहीं।

किनारे आने पर हठात शशि ने सौदामिनी से पूछाए श्सच बतलानाए क्या ब्रजधाम आकर आपको मानसिक शान्ति मिलीघ् कहने का मतलब यह कि बची हुई जिन्दगी यहाँ गुजारने का निश्चय लेकर आयी हैंघ्श्

अकस्मात किये गये प्रश्न का सौदामिनी तुरन्त कोई उत्तर नहीं दे पायी। तट पर आकर वह केशों से पानी निचोड़ने लगी।

श्मुझे मालूम था कि आप उत्तर नहीं दे सकतीं। काफी अर्से से मैं भी एक मानसिक यातना में हूँ। सुना है आपने भी बहुत दुरूख दर्द झेले हैं। बताइए न आप किस तरह रहने का विचार कर रही हैंघ्श्

सौदामिनी शशि के सवाल को अनसुना कर कपड़े बदलने में लगी रही। एक आकस्मिक.सा सवाल था यह।

तभी तर्पण के लिए कुछ लोग जुड़ आये। थोड़ी.सी दूरी पर एक बूढ़ा खजूर के पेड़ के नीचे जमीन खोद रहा था।

श्यह क्या ढूँढ़ रहा हैघ्श्

श्साँप।श्

दोबारा हँसकर शशि ने कहाए श्साँप। हाँए वह साँप तलाश रहा है। वह साँप पकड़कर चुपके से किसी के घर में घुसेड़ देगा। इसके बाद अपने को होशियार सँपेरा बताकर घर के मालिक से साँप निकालने के पैसे ऐंठेगा।

उस बुड्ढे ने खोदना छोड़ दोनों को कुछ क्षण घूरा और फिर जुट गया।

श्तुमने मेरे सवाल का जवाब नहीं दिया।श्

श्क्या जवाब दूँ। तुम्हारे सवाल का कोई जवाब नहीं है।श्

श्क्या कभी तुम्हें ब्रजचन्द्र मिलेघ्श्

सौदामिनी ने सिर झुका लिया। इस बार वह एकाएक गरम.तेजस्वी.ऊँचे स्वर से बोलीए श्कान खोलकर सुनोए सच के पीछे.पीछे अग्रसर होना तथा उसी की खातिर मिट जाना मेरे जीवन का ध्येय है। यह बात मैं केवल मुँह से नहींए दिल से कह रही हूँ।श्

घुटनों के बल रेत पर बैठी हुई शशि ने कहाए श्कुछ दिनों से एक अनजान.सी यन्त्रणा मेरे कलेजे को फाड़े खा रही है। शायद आप को भी मालूम है कि दो.एक दिन में मन्दिर बिक जाएगा। अब तक तो भगवान दामोदर की सेवा.टहल करती रही हूँण्ण्ण्मगर अब आलमगढ़ी के संग पति.पत्नी की तरह रहना होगा। शादी.ब्याह हुआ नहीं और रहना पड़ेगा पति.पत्नी के रूप मेंए कैसी विडम्बना है। जो राधेश्यामी नहीं हो पातींए उन्हें मृत्यु के उपरान्त दाहसंस्कार के डर से या लालच से इस तरह का जीवन बिताना होता है। परन्तु मैं ऐसी जिन्दगी क्यों बिताऊँघ् शायद आप ये बातें न समझ सकें।श्

श्तुम्हारी शादी तो अब भी हो सकती हैएश् सान्त्वना भरे स्वर में सौदामिनी ने कहा।

शशि चीख उठीए श्आलमगढ़ी नामर्द है।ण्ण्ण्इसलिए इसकी मुझे कोई फिक्र नहीं है।ण्ण्ण्असल बात तो यह है कि कुछ दिनों से मैं प्रेम में पड़ गयी हूँ।श् अचानक सौदामिनी का हाथ अपनी छाती पर भींचते हुए वह फूट.फूटकर रो पड़ीए थोड़ी देर बाद भर्राये स्वर में बोलीए श्मैं कृष्ण के मन्दिर में रहने वाले एक बाल.ब्रह्मचारी के प्रेम में पड़ गयी हूँ। मेरे इस प्रेम ने एक अद्भुत.सा आकार ले लिया है। समझ नहीं आता कि अब क्या करूँ।श्


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