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उपन्यास

नीलकंठी ब्रज
इंदिरा गोस्वामी

अनुवाद - दिनेश द्विवेदी


दोनों एक भजनाश्रम के निकट खड़ी थीं। सर्राफ सेठानी आज गरीबों को कपड़े बाँटने आयी हुई थीं। भजनाश्रम की राधेश्यामी बुढ़ियों की भीड़ मची हुई थी। जिनका आश्रम से ताल्लुक नहीं था, काँच मन्दिर के पास बैठी हुई वे वृद्धाएँ भी आ जुटी थीं। आश्रम की सीढ़ियों पर बैठी सर्राफ सेठानी का इन्तजार कर रही थीं। शशि भी उनके पास जा बैठी।

अचानक उसने मुनीम को सेठानी का कान भरते सुना।

'आप इन्हें जो कपड़े बाँट रही हैं, वे सस्ते दाम बाजार में बेचकर रात के समय पीपे के पुल के पास पैसे गिनती मिलेंगी। इन पैसों को वे अपने दाह संस्कार के लिए रख लेंगी। इन मरभुक्खियों को आप कहीं देख लो, तो ये साक्षात प्रेतनियाँ लगेंगी।'

सीढ़ियों पर बैठी हुई शशि दूर से ये बातें सुन रही थी। इस नरभक्षी बाघरूपी मुनीम की कथा को सारा ब्रज जानता है। कितनी ही कमसिन राधेश्यामी विधवाओं को इसने दुष्कृत्य के लिए उठवा लिया था। शशि का मन खट्टा हो गया। उसकी आगे बढऩे की इच्छा ही मर गयी। कहाँ तो सोच रखा था, सेठानी से अलग से भेंट हो जाती तो अच्छा था।

वह चौक में लौट आयी। पीड़ा से उसका हृदय छटपटा उठा। अपने आप से कहने लगी, 'इस उम्र में भगवान किसी की भी ऐसी दुर्दशा न करे और न ही किसी को इस बुरी तरह निस्सहाय ही करे।'

उसने सौदामिनी से कहा, 'देश विभाजन के समय पिता राजशाही की बलि चढ़ गये और माँ...। ब्रज में एक बार अकाल पड़ा, तो लोग तरबूज के बीज-पत्ते खाने लगे। इसी कुघड़ी में अक्रूर घाट पर खून की कै करती माँ भी खत्म हो गयी। फिर ब्रज की यही गलियाँ मेरा घर हो गयीं। यहीं मैं बड़ी हुई।' आगे वह कहती चली गयी।

'भले ही वनखंडी की गलियों में मैं भूखी पड़ी रही, परन्तु अपने सतीत्व और पतिव्रत को बचाये रखा। आज भी इस सबको याद करते हुए मैं गर्व और आनन्द का अनुभव करती हूँ। लोगों की बुराई की मैं जरा भी परवाह नहीं करती...पर अब लगता है समय बीतता जा रहा है। परन्तु एक अजीब-सी पीड़ा है, जो मेरी आत्मा को नोचकर खा रही है। मैं बहुत ही बेचैनी भरे दिन काट रही हूँ।' वह घुटनों के बीच मुँह छुपाने की कोशिश करने लगी।

'तुम्हारी बातों पर मुझे भरोसा हो रहा है, पर मन्दिर बिक जाने के बाद जाओगी कहाँ? आलमगढ़ी के साथ रहोगी क्या?'

'कोई चारा न होने पर रहना ही पड़ेगा। या फिर सर्राफ सेठानी राधेश्यामियों को जब फिर कम्बल बाँटने आएँगी, तो उनसे पूछकर देखूँगी। शायद उनके पास कोई रियायत निकल आये।'

दोनों के बीच चुप्पी फैल गयी। बाहर से आये हुए यात्रियों के ताँगों में जुते घोड़ों के गले में पड़े हुए घुँघरुओं और टापों ने सन्नाटे को भंग किया।

'चलो, घर चलें।'

दोनों उठ खड़ी हुईं। तालवन के महन्तजी का हाथी रंगजी की रथशाला के पास दिखाई पड़ा। उसकी पीठ पर सजा-धजा हौदा था और गले में चमेली की माला पड़ी थी। 'आज वनखंडी के महन्तजी परिक्रमा करेंगे।' शशि बोली।

दोनों आगे बढ़ीं। केवल रसभरी बेचने वाले के स्वर को छोड़कर सारा गोपीनाथ बाजार शान्त पड़ा था।

शशि ने हनुमान मन्दिर के आँगन में कुछ लोगों को बैठे देखा। वे जमुना पार के दूध विक्रेता थे। उनके हाथ में दूध के रीते हुए बरतन थे। शशि उनके करीब जा बैठी। एक उचटती-सी नजर डाल वे फिर से अपनी गपशप में खो गये।

एकाएक शशि की आँखें डबडबा आयीं। मन्दिर का सौदा लगभग तय ही था। इसी प्रकार आलमगढ़ी के साथ रहना भी निश्चित ही था। अलावा इसके यह भी तय था कि आलमगढ़ी उसका कोई अहित भी नहीं कर सकता। लोगों की फब्तियों का भी उसके मन में किसी तरह का कोई मलाल नहीं था। फिर भी बदनामी आखिर बदनामी होती है और वह भी खासकर औरत की। यह बदनामी एक ऐसे शिलालेख के समान है, जिसके जमींदोज होने पर भी लोग बारम्बार उखाडक़र पढ़ने की कोशिश करते हैं।

यदि एक-दो दिन में कुछ इन्तजाम नहीं हुआ, तो उसका सबकुछ बर्बाद हो जाएगा। शोहदे उसके पीछे लग जाएँगे।

मन्दिर से वापसी के वक्त वह यही सब सोचती रही। उसके हाथ में एक फूटी कौड़ी भी नहीं थी। पहले फुर्सत में वह तुलसी की कंठ-माला बनाकर और गोपीचन्दन घिसकर टका-दो टका कमा लेती थी। किन्तु मन्दिर की बिकने की बात ने उसे उदासीन कर दिया था।...यद्यपि वह इस बात से आश्वस्त थी कि इस ब्रजधाम में वह कभी भी भूख से तो मरने वाली नहीं है। भिखारियों की पाँत में बैठ वह भंडारों से पेट भर सकती थी। आश्रम में भी पंक्तिबद्ध होकर बैठने से भोजन तो मिल ही जाएगा। दूसरी राधेश्यामियों के समान भजनाश्रम में एक समय भजन गाकर अठन्नी भी पा जाएगी।...मतलब यह कि भूख से तो नहीं मरेगी। पर इस तरह बेफिक्री से पेट भरने के लिए अभी कम से कम बीस साल और प्रतीक्षा करनी होगी। बीस बरस बाद जब इस शरीर की खाल-दीवाल धँसक जाएगी, और उसकी हालत कोढ़ा-खजही कुतिया के समान हो जाएगी, तब कहीं निश्चिन्त हो भंडारों की पंक्ति में बैठ सकेगी। आलमगढ़ी के साथ रहने से पहले अधिकांश समय उसने राधेश्यामियों की कोठरियों में रहकर गुजारा है। असहनीय दुर्गन्ध से गँधाती उन कोठरियों में उसने दो-तीन मरणासन्न स्त्रियों के मुँह में पानी भी डाला है। कई बुढ़ियों ने तो उसका हाथ थामे-थामे ही अन्तिम साँस ली थी। वे भयानक क्षण वह कभी नहीं भूल पाएगी।

इसके पश्चात उसने अपने आप में एक अद्भुत बदलाव का अनुभव किया। जिन गली-कूचों पर चलने वाले लोग उसे जिन्दा प्रेतात्मा समझकर कुतूहल से देखते थे, वे ही अब उसे एक अलग ही कुतूहल से निरखने लगे थे।

उसने खुद भी महसूस किया कि उसके प्रेतीले मुख पर एक खास तरह का बदलाव आ रहा है। एक-दो राधेश्यामियों ने कहा भी-वह ब्रज की चमेली-जैसी फूल रही है।

बाजार के पास पहुँच कर उसके कदम तेज-तेज उठने लगे। बिहारीकुंज में अब काफी भीड़ जमा हो गयी थी। बाजार की तरफ के बरांडे में खड़ा हुआ गोविन्दजी के पंडे का लड़का हो-हल्ला मचा रहा था। कुंजबिहारी के बिकने का आज अन्तिम दिन था। यहाँ हर वस्तु के लिए उसके मन में ममत्व था। अंजीर का वह वृक्ष, जिस पर बन्दर ऊधम मचाते रहते थे, सीढ़ियोंवाली मीठे पानी की बाबड़ी,...और वह लम्बा-चौड़ा फर्श, जिस पर वह मनमाफिक आराम किया करती।

शशि की आँखें सजल हो उठीं। भीड़ को ठेलते हुए वह भीतर घुस गयी।


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