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उपन्यास

नीलकंठी ब्रज
इंदिरा गोस्वामी

अनुवाद - दिनेश द्विवेदी


सूरज निकलने से पहले यदि कोई ज्ञान गुदड़ी से लेकर मौनी दास की टाटी तक प्रात: काल घूमने निकले, तो उसे लगेगा कि ब्रजधाम किसी नष्ट हो चुके साम्राज्य का मात्र ध्वंसावशेष है। लगता है चार सौ वर्ष पूर्व विद्रोहियों का दमन करने के लिए औरंगजेब ने जो रक्तरंजित होली खेली थी, उसकी कुछ बूँदें आज तक मौजूद हैं। प्राचीन गोपीनाथ, मदनमोहन, राधावल्लभ के टूटे हुए कलश अभी भी चुपके-चुपके कह उठते हैं। उस वीभत्स कांड को हुए अभी बहुत दिन नहीं हुए हैं। कान लगाकर सुनने पर मन्दिर के मलबे के नीचे दबे पड़े पुजारी का करुण अन्तर्नाद अभी भी सुनाई पड़ जाता है।

आज भिनसार से ही सौदामिनी खिन्नमना होकर यमुना तट पर घूम रही थी। रूखे बाल, अस्त-व्यस्त कपड़ों के ही वह पगलायी-सी भटक रही थी। पूरी रात आँखों में जागते कटी थी। एकाएक वह घुटनों के बल रेत पर बैठ गयी। केसीघाट के निकट ही उसे उस भयंकर भँवर का स्वर सुनाई दे रहा था। जनधारणा है कि वृन्दासारणी के रथ के पहिये की घरघराहट यहाँ सुनाई पड़ती है। मगर उसे तो आकाश-पाताल एक गूँजता हुआ वही महाकाल का प्रचंड स्वर सुनाई पड़ रहा था। इस स्वर के आगे सबेरे के सभी स्वर दब गये थे।

कुछ समय यहाँ-वहाँ भटककर सौदामिनी कृष्ण मन्दिर के सिंहद्वार पर जा खड़ी हुई। कार्यालय का दरवाजा खुला हुआ था। मन्दिर के कर्मचारी हुंडी और बहीखातों में जुटे हुए थे।

वह प्रधान कर्मचारी के सामने शीश नवाकर बोली, 'जै श्री राधेरानी की।'

समवेत स्वर में कर्मचारी बोल उठे, 'जै श्री राधेरानी की,' बूढ़ा मैनेजर उसकी ओर देखकर बोला, 'आगे आओ!'

'मैं मन्दिर के दर्शन करने नहीं, नौकरी की तलाश में आयी हूँ।'

'नौकरी!'

सारे कर्मचारी उसे अचरज से ताकने लगे।

बूढ़े मैनेजर ने पूछा, 'तुम कहाँ तक पढ़ी हो।'

शिक्षा की पूछताछ ने उसे पसोपेश में डाल दिया। बोली, 'मुझे कोई बड़ा काम नहीं चाहिए...भंडारी या रसोइये की सहायिका या फिर...' कोने में बैठा कोषाधिकारी ठठाकर हँसते हुए बोला, 'हम जवान औरतों को काम पर नहीं रखते। कभी-कभार एक दो राधेश्यामी बुढिय़ाँ यहाँ काम के लिए आती हैं। पर हम उन्हें भी दूर ही रखते हैं। आजकल सबकुछ बहुत कठिन हो गया है। अभी दो दिन पहले ही जमीन का किराया उगाहने वाले कर्मचारी के पद हेतु दो स्नातक आये थे। अभी थोड़े दिन पहले तक ब्रज में उँगलियों पर गिनने योग्य स्नातक ही थे।'

अचानक कोषाधिकारी विस्मित हो बोला, 'तुम, तुम कहीं डॉक्टर रायचौधुरी की बेटी तो नहीं हो? मैंने तुम्हें दवाखाने में काम करते देखा है। सुनो, तुम्हारे लिए तो इससे बढ़कर कोई काम नहीं हो सकता। जाओ, प्रभु तुम्हारा कल्याण करे।'

सिंहद्वार के पास खड़ी हुई ही उसने रथगृह से चरण बिहारी गौतम को निकलते देखा। उसे देख वह आग्रह के साथ बोला, 'राधा रानी की जय।'

सौदामिनी ने सिर झुकाये यही शब्द दोहरा दिये।

'सुना है आजकल दवाखाने में दिन व्यतीत हो रहे हैं?'

वृन्दावन के पाँच हजार मन्दिर देखने का उत्साह शायद अब नहीं रहा।

इस वक्त चरण बिहारी से मुलाकात सौदामिनी को बिल्कुल नहीं अखरी। वैसे भी वापस यही जाकर उसे अँधेरे कुँए में ही कैद होना था। कुछ दिनों से उसे महसूस हो रहा था कि कोठरी की चारदीवारी उसे घेरकर दबोच लेगी। एक दिन वह जिन्दा दफना दी जाएगी।

वह बोली, 'आपको इस वक्त कोई काम न हो तो क्या अभी मेरे साथ एक चक्कर लगा सकेंगे?'

'फिर आप थोड़ा रुकिए, रथ का पहिया साफ कर रहे मजदूरों को थोड़े-से निर्देश देकर आता हूँ।' केला, कपड़ा, घंटा, झंडा तथा लकड़ी के गन्धर्व-किन्नर आदि से विहीन रथ के पहिये की सफाई कर रहे मजदूर सिर उठाकर सौदामिनी को देखने लगे।'

'तो आज वृन्दावन के पाँच हजार मन्दिर देखने की आपकी इच्छा हुई है। परन्तु आज उत्साह कैसे?'

'मेरी वापसी का वक्त हो गया है।'

'लौट जाओगी?'

कातर कंठ से चरण बिहारी बोला, 'रंग जी की नौका लीला होने को है। क्वार में राम लीला, पौष में बैकुंठ-उत्सव, चैत्र के कृष्णापक्ष की दूज पर ब्रह्म-उत्सव होंगे। न-न ब्रज से इस तरह लौटना ठीक नहीं होगा। खासकर रंगजी की रथयात्रा नहीं देखोगी?'

गोविन्दजी के सामने से दोनों निकले। भयंकर गर्मी थी। गोविन्दजी के लाल पत्थरों से चिनगारियाँ-सी निकल रही थीं।

कुछ दूर तक दोनों चुपचाप चलते रहे। मन्दिरों को छोड़ दोनों यमुना की तरफ बढ़े। टूटी-फूटी दीवारों पर चिपके हुए सूखे भोजपत्र के समान बदरंग से पोस्टर दिखाई दे रहे थे।

'ये कैसे विज्ञापन हैं?'

'ये सब कृष्ण मन्दिर में खेली गयी खूनी होली के निशान हैं।'

सौदामिनी ने दीवार के सामने खड़े होकर पढ़ने की कोशिश की-भक्तों के चढ़ावे के धन की प्रबन्धन समिति की फिजूलखर्ची से रक्षा कीजिए। विभिन्न विभागों के अधिकारियों को अपने मतलब के लिए दावत देकर मुकदमा इत्यादि में मन्दिर की रकम पानी की तरह बहाने और मन्दिर में पुलिसिया राज स्थापित करने का हम विरोध करते हैं। भक्तों द्वारा चढ़ावे में आने वाले सोना-चाँदी, मोती-जवाहरात, कपड़ा-बर्तन का सही उपयोग नहीं होता है। बल्कि ये सब काला बाजारी से औने-पौने दाम में बेच दिये जाते हैं। राधाजी की जरीदार पोशाक ले जाकर बाहर अधिक मूल्य में बेच दी जाती है। बिहारीजी के प्रसाद को जलाना तो जघन्य अपराध है। उम्मीद है आप सब समझ गये होंगे।

चलते-चलते दोनों यमुना की रेत पर आ गये। विगत कुछ दिनों से जरामासी उग आयी थी। इस धीर-समीर घाट पर इस वक्त मांगलिक कार्य हेतु कोई भी मौजूद नहीं था। जरामासी लताओं की छाया में विशालकाय कछुए लेटे थे। परिक्रमा के रास्ते पर दोनों चलने लगे। चरणबिहारी बोला, 'इस वक्त ठीक यहीं पर एक रहस्यमय चीज देख सकेंगी यानी यमुना के जल से आती हुई एक अजीब-सी किरण अपनी आभा से चतुर्दिक छाया देगी। गौर से देखिए।'

'नहीं, आज मेरा मन इन सब बातों की तरफ बिल्कुल नहीं है।'

'क्या आपके मन पर निराशा छाने लगी है?' सौदामिनी खामोश रही। दीवारों पर मन्दिर की दुव्र्यवस्था सम्बन्धी भोजपत्र जैसे जर्जर इश्तहारों की चिन्दियाँ उड़कर बालू पर बिखर रही थीं। अंजीर के पेड़ तले साँप खोज रहे व्यक्ति के खुरपे से खोदने की आवाज सुनाई पड़ रही थी।

'आइए, इन सीढ़ियों पर कुछ देर बैठने से आपकी उद्विग्नता कम हो जाएगी। सामने आप जो टूटी सीढ़ियाँ देख रही हैं न, अभी कुछ दिन पूर्व यहीं से सीढ़ियों के नीचे दबी हुई भगवान दधीकर्ण की प्रतिमा खोदकर निकाली गयी है। इनके हाथों में दान पत्र और मस्तक पर सात फन वाले सर्प का मुकुट शोभित हो रहा था। यही वह धीर-समीर घाट है, जहाँ पर गोकुलचन्द्र कृष्ण ने मानिनी राधा के दोनों चरणों को माथे से लगाकर मनाते हुए कहा था-

स्मर-गलरखंडनं , मम शिरसिमंडनम्।

देहि पद पल्लवमुदारम्। '

अचानक सौदामिनी एक सवाल पूछ बैठी।

'आप तो इतने दिनों से वृन्दावन में हैं, क्या मुझ जैसी कोई स्त्री कभी वृन्दावन आयी है?'

'आप जैसी से क्या मतलब?'

सौदामिनी चुप रही। सहसा उसकी दोनों आँखें डबडबा आयीं।

'जो प्रसंग आपको दुख देता है, उसकी चर्चा आप मुझसे मत कीजिए। आप जैसी दो-एक स्त्रियाँ आयी थीं, जिनके लिए मेरे दिल में अब तक आहें हैं, और कुछ नहीं...सुनिए, शायद आयी थीं।'

'ओह, क्यों आपको मुझे प्यार करने की इच्छा नहीं होती? लोग कहते हैं अभी भी मैं बूढ़ी राधेश्यामी स्त्रियों जैसी नहीं लगती हूँ।'

हृदय से शुष्क, अनेक कल्पनाओं के साथ अनेक बार उत्तेजना से भरा हुआ समय उसने बिताया था...शराब के नशे जैसा। यह भी एक नशा ही है। परन्तु आश्चर्य, इस समय सामने बैठी इस स्त्री का चेहरा उसे अपनी बेटी जैसा लग रहा है। और वह इस समय चमेली की माला...।

'इस तरह मेरा चेहरा क्या ताक रहे हैं? सच बताइए, क्या मैं बूढ़ी लगने लगी हूँ? किसी समय लोग मेरे रूप-लावण्य की बहुत तारीफ किया करते थे। हमारी पहचान हुए भी एक लम्बा अर्सा बीत चुका है। क्या आपका मन मेरी ओर आकर्षित नहीं होता?...अभी थोड़ी देर पहले आपने कहा था कि यमुना जल से एक आध्यात्मिक किरण निकलती है। उसे सिर्फ आप ही देख पाते हैं।...कुछ दिनों से ठीक आपके समान मैं भी एक अँधेरा देख रही हूँ, जो मुझे घूरकर मेरे जीवन को ग्रस लेना चाहता है। कभी-कभी तो लगता है। यह अन्धकार उस प्रकाश से भी बढक़र है। आप भरोसा कीजिए।...'

सौदामिनी का गला रुँध गया।

'तो वह ईसाई, क्षमा कीजिए, मुझे उसका नाम नहीं मालूम, क्या आपको सान्त्वना दे सका था।'

सौदामिनी पुन: मौन हो गयी। दोनों घुटनों पर चेहरा टिकाये वह रेत पर हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई लिखने लगी। हिन्दू, मुसलमान, ईसाई।

'क्या तुम्हें पति की यादें जीने को प्रेरित नहीं करतीं?'

'नहीं करतीं-उनके चेहरे की स्मृति तक धूमिल पड़ चुकी है। अतीत पर धूल जम गयी है। फिर कभी-कभी लगता है, वही यादें ही सब कुछ हैं। उसके बाहर सब कुछ शून्य है।'

'जीने की प्रेरणा कौन देता है?'

'अभी आप जिस ईसाई की बात मुझसे कर रहे थे। उनसे अनोखी प्रेरणा मिली है। उनकी उपस्थिति ही मुझे अनोखी प्रेरणा देती है, जिसे मैं समझ नहीं सकती। आप भी ठीक से समझ नहीं पाएँगे। धरती का कोई भी इनसान नहीं समझ पाएगा। हालाँकि मैंने उनसे वैसा गहरा प्रेम नहीं किया है, फिर भी वे हैं वे मेरे लिए हैं। अब बोलिए, क्या मेरे जैसी पवित्र नारी इस ब्रज भूमि में इससे पहले नहीं आयीं?'

चरण बिहारी ने सिर झुका लिया। उसे अन्दर ही अन्दर एक ऐसी वेदना का एहसास हुआ, जिससे उसका परिचय पहले कभी नहीं हुआ था। उसे अपनी बेटी का कोमल चेहरा बार-बार याद आने लगा। वह चमेली की माला पहिने मन्दिर-मन्दिर डोलती रहती है।


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