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कविता

जनपथ पर धूप
सरोज बल
संपादन - शंकरलाल पुरोहित


तरल पिचू के बिस्तर पर
सोई है धूप
पवन फरार है।

चौड़ी सड़क पर ऐश के लिए
कट चुके मुरबी श्रेणी के पेड़
अब किस की खातिर।

तनिक असावधान हो देखो
जनपथ दिखता नदी-सा
देखो किसी गाँव की औरत-सी
कैसे ब्लाउज खोल
दुपहर की निर्जन पोखर में नहा रही
जनपथ की धूप (ओह कितनी गोरी) !

पैदल लोगों को लाल आँख तरेर
भगा दिया उन्हें धूप ने ग्यारह बजे से

बाइक वाले तो हेलमेट काँच से मुँह निकालें नहीं
वह जानती है,
और ए सी कार वाले खाली सड़क पा कर
क्यों स्पीड बढ़ाते पता नहीं
जनपथ की धूप सच
सबसे सुखी।

सारे ग्रीष्म वह मनाएगी

अकेली बैशाखी, हालाँकि
इस उत्सव में शामिल होंगे नहीं
जनपथ के लोग
फिर भी आसपास दूरी के
कोई न कोई कूकर इसके साक्षी होंगे।

मैंने देखा है कैसे
के सी पाल छाते तले कोई युवती
रमादेवी महिला कॉलेज से निकल
डुबकी लगाती जनपथ पर
और हालाँकि अनेक एक्सरे आँखें
उसे फॉलो करती, वह
उनकी बेखातिर करती।

जनहीन जनपथ, सारी दुपहर
केवल टाउनबस कुछ अंतर में
कहानी कहती धूप के कान में
तरबूज की ठेलागाड़ी ग्राहक तकते-तकते
धीरे से ऊँघ जाती ।
जलछत्र देखते रहे
प्यासे का अता पता नहीं, सारी गरमी के मौसम
कौवे तक का ठिकाना नहीं
चोंच मार मटके में छेद करने।

अनशन तोड़ती नहीं जनपथ की धूप
चुपचाप अट्टालिका
भट्टा पड़ जाता खरीद-फरोख्त में सारी दुपहर
इसी घर में बैठे-बैठे बोर होती मालकिन
सड़क पर फिरते किसी आवारा को
जरूरत पड़ती घर की ।

मैं छीन सकता सारा दुख
जनपथ की धूप से

राजधानी की सबसे कीमती जगह
उसकी यों हिमाकत
मुझ से सही नहीं जाती
पर मैं निरुपाय।

अपने ताप में स्वयं जलने के सिवा
अधिक कुछ पता नहीं
यह धूप भी क्या जाने अधिक उपाय।


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