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कहानी

स्तब्ध
डॉ. आशारानी लाल


विचित्र रचना है समाज की। वैविध्‍यता इस समाज के पोर-पोर में रची-बसी है। रूप हो या पहनावा-ओढ़वा, खान-पान हो या सोच विचार, सब कुछ अलग-थलग। ऐसे ही इस धरती पर मानव के तरह-तरह के जोड़े दिखते रहते हैं। कहते हैं कि इन सबको ऊपर वाले ने बनाया है। कोई लंबा है तो कोई छोटा, कोई नाटा है तो कोई मोटा। पर वह न तो लंबा था, न मोटा था और न बौना। हाँ, ठिगना जरूर रहा होगा, क्‍योंकि वह शायद चार या पाँच फीट का ही था।

उसका बचपन तो देखने को मिला नहीं और जवानी भी उसके पास कभी फटकी नहीं। हो सकता है, उसका बचपन रेंगते-रेंगते जवानी की ओर खिसका हो, पर रास्‍ते में बहुतेरे ईंट-पत्‍थर ऐसे पड़े मिले हों कि उन्‍हें हटाने में ही वह जवानी, उस शरीर को छोड़, मुख मोड़ कहीं और चल दी हो और वह थोड़ा कंधे से झुक गया हो।

पेट का दबना और कंधे का झुकना वैसे बुढ़ापे को तो इंगित नहीं करता है, पर 'वह' ऐसा दिखता था। शायद उसका पेट कभी भरा नहीं होगा, इसलिए वह पेट बैठा रहा, उठा नहीं। हाँ, पेट-पीठ मिलकर दोनों एक हो चुके थे, ऐसा कहा जा सकता था। इस पेट की मार ने उसके पूरे शरीर को कृशकाय बना दिया था। इसके बावजूद वह झुककर ही चलता था, लकुटिया टेककर नहीं। उसके शरीर का कंधा ही नहीं झुका था, गाल धँस गए थे और आँखों ने गड्ढे का सहारा ले लिया था। दाढ़ी-मूँछ तथा सिर के बाल खोंते-सा बनकर किसी कवि का रूप लेना चाहते थे, पर उसे पा नहीं सके। हाँ, उस कवि की कविता का शीर्षक बनकर ठहर गए, ठिठक गए।

कवि ने तो देखा था कि 'वह' आता, पछताता पथ पर आता, पर मैंने कभी उसे आते नहीं देखा। यदा-कदा जब मैं उधर से गुजरती तो पाती कि वह वहीं बैठा रहता था। उसके पैरों में कभी पैंट तो कभी पायजामा हुआ करता था। इस पैंट का रंग क्‍या था, बताना मुश्किल लगता है, जिसे वह कमर में बटन बंद कर नहीं पहनता, बल्कि उसे वो वहीं 'गँठिया' लेता था। गाँठ लगाने के बाद भी उसको रस्‍सी से बाँधकर बेल्‍ट बनाना पड़ता था। कारण-गाँठ के बावजूद उसके सरकने का डर बना रहता था। नीचे के उसके पैर खाली ही दिखते थे, उसमें जूता-चप्‍पल तो मैंने कभी नहीं देखा। पैरों में चप्‍पलों की जगह शायद उसमें सटी हुई धूल-मिट्टी और कीचड़ ने ले रखा था, जिसे वह अपने से दूर कभी नहीं करता था। ऐसा भी कहा जा सकता है कि उसको अपनी मिट्टी से बेहद प्‍यार था।

जैसे उसकी पैंट का रंग बता पाना मुश्किल है, वैसे ही ऊपर के बदन से झूलते हुए बुशर्ट या कुर्ते के रंग के बारे में भी नहीं कहा जा सकेगा। उसे इस पहनावे के ऊपर हवा-पानी और धूल-मिट्टी सब मिलकर एक साथ तरह-तरह की पेंटिंग रोज करते थे, जिसके लिए उसे न तो कोई प्रयास करना पड़ता था, न 'चिरौरी मिनती'। इस पेंटिंग के बदले उसे किसी भी तरह की मजदूरी नहीं देनी होती थी, शायद इसलिए उसे इसका कोई गम नहीं रहता था कि किस रंग की तूलिका से उसके कपड़ों को रंगा जा रहा है।

वह खुद किस रंग का था - यह जानना भी मुश्किल है। वह न तो गोरा था, न काला और साँवला भी नहीं था। कारण-शरीर के बस तीन ही अंग तो ठीक-ठाक दिख पाते थे - वे थे उसके हाथों की हथेली, ओंठ पर थोड़े-से निकले दो दाँत और आँखों की दो सफेद पुतलियाँ। शरीर के अन्‍य अंगों को दुनियावी धूल, मिट्टी और गर्द ने ऐसा छुपा दिया था कि उसके रंग का पता करने के लिए गरम पानी में सर्फ और सोडा डालकर धोना पड़ता।

वह कितना लंबा था - यह भी ठीक से नहीं बताया जा सकेगा। कारण - वह हरदम बैठा दिखता था उस शिक्षालय के गेट के पास। वैसे वह पाँच फीट से कम का ही जवान रहा होगा। उसको जवान कहना मेरी भूल नहीं है, क्‍योंकि उसका कोई बाल सफेद दिखा ही नहीं, जिससे उसके बुढ़ापे का संकेत मिलता। अगर सफेद होगा भी तो उस पर पड़ी गर्द उसे छुपा रही होगी। यह सही है कि वह अपना बाल औरों की तरह कभी रंगता नहीं था। बिना जवानी के वह जवान था, यह बताना ही सही हो सकता है। वह कभी भी वहाँ अकेले बैठा नहीं दिखा। उसके साथ उसकी 'वह' भी रहती थी। उसके हाथों में बहुत-सी रंग-बिरंगी चूडि़याँ थीं। ललाट पर एक चमकती बिंदी भी दिखती थी। उस बिंदी की चमक से उसकी चमक दस गुनी होती थी कि नहीं, यह कहा नहीं जा सकता। पर यह तो अवश्‍य कह सकते हैं कि बिंदी उसके 'उसकी' होने को चरितार्थ जरूर करती थी। वहीं उसके जीवन की लकुटिया लगती थी, जिसको टेककर वह नहीं चलता था, पर उसके सारे सोच-विचार उसी पर चिपके रहते थे।

वह उससे लंबी नहीं बल्कि छोटी ही दिखती थी, फिर भी बौनी नहीं थी। हो सकता है, इस चित्र के चितेरे ने इस जोड़ी को चार या पाँच फीट के बीच बनाकर वहाँ बैठा दिया हो। इनके पास एक बड़ा कटोरा होता था। उस कटोरे में दयावान अपने आप जब कुछ डाल देते तो दोनों एक साथ ही उसे खा लिया करते थे। उन दयावानों को केवल अपनी आँखों से देखकर लगता था कि वे कुछ उन्‍हें देते थे, जिसकी भनक भी उन पाने वालों को नहीं लगती थी और वे पा भी जाते थे।

इस जोड़े में बहुत कुछ समानता थी। रंग में दोनों एक से दिखते थे। अपने बालों को भी उन्‍होंने एक जैसा ही झाड़-झंखाड़ बनाकर सजाया था। वे बाल लंबाई में भी एक-दूसरे की बराबरी करने में कभी चूकते नहीं थे। इस बालों के झुरमुट में बहुतेरे जीव-जंतुओं ने अपना बसेरा बना रखा था, जिसका पता उस समय लगता था, जब दोनों एक दूसरे की गोद में अपना सिर डालकर बैठे-बैठे उन्‍हें निकाला करते थे। इस जोड़े को जब आँखों से टटोला जाता था तो ऐसा लगता था कि इनके विचार पुराने जमाने की ओर कभी नजर ही नहीं किए जिससे वे शर्म और हया के कायल बनते। लज्‍जा तो उन तक फटकी ही नहीं थी कि वे स्‍मार्टनेस पर विचार करें। मोटापा यों ही उन तक आने से डरता था। दुनियावी चिंता उनकी मस्‍ती देख दूर बहुत दूर से झाँककर मुड़ जाती थी। कारण-उनकी नींद की मस्‍ती इसकी परवाह ही नहीं करती थी। इनकी जिम्‍मेदारी तो बस एक कटोरा ही था, जिसे वे अकसर अगोरा करते थे। उस कटोरे में मिले हुए भोजन को खाने के लिए उन्‍हें न हाथ धोना पड़ता था न मुँह। न तो वे भूख का इंतजार करते थे और न समय का।

यह तो पता ही नहीं चला कि इस दंपति को अपने बैठने के लिए इस शिक्षालय का गेट ही क्‍यों पसंद आया। क्‍या ये युवावस्‍था की दहलीज पर पैर जमाते हुए किशोर-किशोरियों को प्‍यार के पाठ का प्रयोगात्‍मक रूप दर्शाना चाहते थे या उनके हृदय के कोने में पड़े हुए सुषुप्‍त अरमानों को जगाना चाहते थे। इन्‍होंने कुछ छात्रों को यह भी बता दिया होगा कि राधा-कृष्‍ण एक नहीं, अनेक हैं। भले ही इस राधा-कृष्‍ण को वे कभी न याद करें और उन्‍हें ढूँढ़ने के लिए समुद्र तट पर गोवा की ओर ही घुमा करें। उनके अनुसार तुच्‍छता तो मन की होती है। जो कभी इस जोड़े के पास फटकी ही नहीं। वे किसी शिक्षक से भी न लजाए और शर्माए, क्‍योंकि संसार के सारे सामाजिक नियम-कानून उन्‍हें देखकर थरथराते रहे। छोटे-बड़े, गरीब-धनी, खूबसूरत और कुरूपों के वर्गों में तो ये बँटे ही नहीं। इनका मस्‍तमौलापन इन्‍हें ही घूरता रहा, जिससे वे अपनी नजरों में कभी अछूत नहीं बने।

यह शिक्षालय का गेट वह रास्‍ता था, जहाँ से हजारों छात्र-छात्रा एवं शिक्षक नित्‍य गुजरते रहते थे। वे कभी कनखी से तो कभी सीधी आँखों से उनके नेत्रों में तैरते प्‍यार को देखते रहते थे, पर किसी में यह जिज्ञासा नहीं हुई कि ये कौन हैं, कहाँ से आते है और रात्रि में कहाँ रहते हैं - इसे जान सकें। अज्ञात स्‍थान में रहने वाले इस जोड़े पर सबकी नजर पड़ती और यही नजर इनके संतोष की पिटारी होती। इन्‍हें मान-अपमान तो कभी छूता ही नहीं था। इनके संतोष को देखकर वनस्‍पतियों का राजा बरगद अपनी विशाल छाया हमेशा इन पर बिखेरता रहता था, जो वहीं गेट पर ही फैला पड़ा था। बरगद की यह छाया ही इनकी मस्‍ती में लहराती रहती थी। इस छाया में ही इन्‍हे शांति और निश्चिंतता मिलती थी। इनकी विनम्रता और कातरता के गुणों को देखकर सूरज की धूप भी दूर हट जाती थी। केवल संतोष और सरलता ही इनका खजाना था।

पर उस दिन, जिस दिन दोपहर में ही घुप्‍प अँधेरा घिरा आया था, जोरों की तेज हवा सूँ-सूँ कर चलने लगी थी कि उस बरगद के पेड़ ने इस प्रेमी युगल को अपने पेट में छुपा लिया था। छुपाया ही नहीं बल्कि उन्‍हें ठंड से काँपते देख उनके ऊपर अपने एक घने और मोटे तने की रजाई भी ओढ़ दी थी। यही कारण था कि उस रजाई के तले वे दोनों एक दूसरे से सटकर वहाँ हमेशा के लिए उस तूफान में सो गए थे। तूफान के बाद उस रास्‍ते से चलने वाले सुधिजन ही वहाँ नहीं ठिठके, बल्कि सूरज भी दौड़कर उन्‍हें देखने को निकल पड़ा। एक भीड़-सी जुट गई। जब लोगों ने उस मोटी डाल को उनके ऊपर से हटाया तो पाया कि यह जोड़ा अपने अगले जन्‍म में पुनर्मिलन की आस लिए, अपने प्‍यार में चिपके हमेशा के लिए शांत हो चुका था।

अब शिक्षालय का यह गेट उनके प्‍यार का मंदिर बना हुआ था। वहाँ दान ही नहीं, महादान देने वालों की भीड़ उमड़ रही थी। पुण्‍य लूटने में छात्र-शिक्षक के साथ-साथ पूरा समाज वहाँ जुट रहा था। अठन्‍नी, चवन्‍नी, रुपया, दो रुपया, पाँच, दस, बीस से लेकर पचास और सौ के नोट भी इस महादान पर न्‍योछावर होने लगे। आखिर सबको अधिक से अधिक पुण्‍य बटोरना था। सभी दर्शक एक आह के साथ-साथ इस पुण्‍य कर्म के महादान में भाग लेने से चूकना नहीं चाहते थे। पूरी भीड़ गमगीन होने के साथ ही फुसफुसाहटों से भरी थी।

अचानक वहाँ कुछ और होने लगा। एक सुडौल चेहरे वाला कुछ अनजान और कुछ जाना-पहचाना-सा व्‍यक्ति अपने धीरे-धीरे भारी कदमों से चलकर आगे आया। उसका चेहरा झुका हुआ था, आँखों में अश्रु भरे थे, पलकें झुकी थीं, पर शर्म से नहीं, अपनेपन के भार से। उसने उस प्रेमी जोड़े को काका-काकी कहकर पुकारा तो सथी भौचक रह गए। किसी ने कहा कि यह तो शिवपूजन चपरासी है। यह यहीं इसी शिक्षालय के किसी प्रायोगिक विभाग में कार्यरत है। पूरी भीड़ को शिवपूजन का परिचय अब भतीजे के रूप में मिल चुका था।

सबने देखा कि शिवपूजन कभी अपने काका-काकी को निहारता तो कभी उस महादान की राशि को जिसने उसकी आँखों में आँसू की जगह चकाचौंध को भर दिया था। अब इस प्रेमी जोड़े पर केवल उसी का अधिकार था जिस अधिकार का प्रयोग उनके जीते जी वह नहीं कर पाया था। उनकी संपत्ति लेकर भी रोटी के एक टुकड़े के लिए उस नि:संतान काका को तरसाता रहा, उसे ही अब इस महादान के चुंबक ने उनके पास बुला लिया। शिवपूजन मन-ही-मन वहाँ बिखरी हुई राशि को बटोर रहा था तथा हाथों से अपने काका के पैरों को सीधा करता था। उस महादान से जब वह कटोरा लबालब भर गया तो शेष राशि उसने अपनी पॉकेट में भर ली। उसे संतोष था कि वह अब अपने काका को मुखाग्नि दे लेगा और पीपल में पानी देकर पुण्‍य कमाएगा।

वहाँ की भीड़ स्‍तब्‍ध थी कि अंतिम समय में उनका शिवपूजन अपना दुनियावादी फर्ज निभाने आ चुका था। ऐसा लगता था कि वहाँ खड़े लोग कुछ कहना चाहते थे, पर कह नहीं पा रहे थे। कुछ करना चाहते थे, पर कर भी नहीं पा रहे थे। उनके उस प्‍यारे और अपने खास भतीजे को देखकर। सभी सामाजिक बंधनों के शाब्दिक व्‍यंगबाण उनके मुँह तक आने को कुलबुला रहे थे, पर होंठों के तरकश ने उन्‍हें बाँध रखा था। वहाँ एक स्‍तब्‍धता-सी छा गई थी, क्‍योंकि एक प्रेमी-युगल निश्चिंत सो रहा था।


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हिंदी समय में डॉ. आशारानी लाल की रचनाएँ