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कहानी

मितवा
डॉ. आशारानी लाल


ए ईया-गोड़ धरतानी!

     तोहार गोड़वा जब हम धर लेलीं, तब हमरा बड़ा सुख आ चैन मेंटा जाला। सुनिलाँ-ईया कि तू अगमजानी हऊ, त हमरा गोड़ धरते हमरा मन के बतिया त तूँ जानिए जात होइबू। हो सकेला कि मने-मने इहो कहत होइबू कि ई त बिलाइल रहलि ह, फेरु केने से आ के धमक गइल। ए-ईया हम अपन बेचैनी तोहरा के सँउप के केतना सुख पाइलाँ, ईत हम बता ना पाइब, बाकी हमके बड़ा चैन भेंटाला-इहे कहब।

ए-ईया-तूँ जब अपना कवनो पोती लोग के बाउर बात देख के, चाहे जान के ओह लोग के बरजत रहू त का कहत रहू-तोहरा इयाद बा किना। हमके त आजो तोहरे बतिया हमरा मन में बेर-बेर ओसहीं टनकल आ खटकल करता जइसे केहू केवाड़ी पर जंजीर खटखटावत होखे।

तू अपना पोती लोग के अपन आँख तरेर के इहे न कहत रहू कि - 'एक धिया होइती बाबा कुल रखती।' ओह घड़ी तोहार बात बूझ के तोहार पोती लोग स‍टकियो जात रही आ तोहके कबो उलट के कवनो जबाब ना दे रही, बाकी अब ई बात नइखे रह मइल। अब त तोहार इ बतिया कवनो दादी के अपना पोती से कहहीं के हिम्‍मत ना पड़ी।

आज हमहूँ ईया तोहरे नियर-इया त नाही बाकी दादी बन गइल बानी। कइगो पोता-पोती हमरो लगे बान लोग। कुल पोता-पोती एक से एक बढ़-बढ़ के बा लोग। ऊ लोग बहुते लायक कहाता, बाकी ईया हो तू कबो एह पोती लोग के लाएक नाही कहतू। आज के पोती लोग सतयुग के गोपी बन गइल बा लोग। एह लोग के दोस्‍त-मित्र आ सखा एगो कृष्‍णा नइखन कइगो कृष्‍ण जइसन लडि़कालोग बा-जेके ई पोती लोग आपन मीत कहता लोग। एह पोती लोग के माई-बाप खुश बा लोग कि उनकर बेटी नया जमाना के तेज-रफ्तार के दउड़ में हिस्‍साले रहल बाड़ी। बाकी ए ईया तू ई कुल देखतू त का कहतू-उहे बतिया न कहतू जवन कृष्‍ण के समय में गोपी लोग के माई-बाप आ भरल समाज कहत रहे। ऊ लोग कहल करे कि ओह लोगिन के सब बेटी-बेकहल आ कुलनासी हो गइल बाड़ीस।

ईर्या तोहरा ओह सीख के अब कवनो महत्‍व नइखे रह गइल, भले तूँ ओके चउबिसो घड़ी बोलत चाहे रटत रहल कर कि- 'एक बेटी होइती बाबा कुल रखती, एक पूत होइतन गया पिंड परतन।' तोहार सीख अब आज के जमाना में पुरान पड़ गइल बा। दूसर बात ई बा कि केकरा हिम्‍मत बा कि तोहरा एह बात के कवनो पोती लोग के सोझाऊ दोहराई।

हम जानतानी ईया कि तू इहे कहबू कि - 'पुराने चाउर पंथ परेला रे।' त ईया अब ई जमाना अबे बिमार नइखे भइल। एहिसे पंथ परला के बात सोचहीं के नइखे। ई जमाना त अपना के जवान आ हट्ठा-कट्ठा बुझता। एकरा नइखे बुझात कि एह जवनिए में ई मीत लोगिन के बिमारी कैंसर बन बनके अइसन पटक दी कि फिर उठल मुश्किल हो जाई। कैंसर जइसन बिमारी के त अबे कवनो दवाई ठीके ना कर पाई।

इहे कुल सोच मन के बड़ा बेयाकुल कइले बा ए-इया। हम तोहरा सरन में एही से आइल बानी आ तोहार गोड़ पकड़ के बइठल बानी कि हमरा के अब एह बिमारी से बचे के कवनो उपाय तूँ जरूर बताव-जेसे अपना देस के कुलबाबा लोग के कुल-खानदान के रक्षा इहे पोती लोग करो आ अपना देस के पुरान संस्‍कृति त इहे न रहे कि चाहे जेतना लोग दोस्‍त-मीत बनो बाकी वियाह बस एकही बेर आ एकही लडि़का से होखे के चाँहीं।

अपना देस के नारी लोग त ए ईया हरदम तोहरे लोग के कहला में रहिके न देस के नाँव विदेशों में बढ़वले रहत रहे। एहिसे हम तोहके बार-बार गोहरावतानी कि उहे तोहार-राज फिर से अपना देस में कायम हो जाव।

तनी जल्‍दी अपना देस में बढ़त एह मितवा लोग के रोग के खतम करे के तू अपन कवनो खरबिरउवा दवाई जरूर बताव, जे के पाके एह देस के भटकत तोहार पोता-पोती लोग के मन बदल जाव आ ई देसो तर जाव।

हमरा उमीद बा कि तोहार बतावल मंत्र के दवाई बहुते कारगर होई। तोहर बतावल ओही मंत्र के राह हम ताकतानी, जेके खाली मुँह से फूँक मार देला से सबकुछ बदल जाला।

तोहरा मंत्र आ फूँक के राह ताकत।

तोहार

-पोती


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