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संस्मरण

है अभी कुछ और अज्ञेय
ज्योत्स्ना मिलन


कम ही साहित्यिक आयोजनों में भागीदारी करने वाली मेरा वत्सलनिधि के आयोजन में कई बार शामिल होना हुआ था। सबसे पहले आबू गई थी। बच्चे अभी पर्याप्त बड़े नहीं थे, इसलिए वात्स्यायन जी हम दोनों को बारी-बारी से शिविरों में आमंत्रित करते थे। इसी तर्क से आबू शिविर में मेरी बारी थी। इस तरह के आयोजन का मेरा यह पहला अनुभव था। पेड़ के पास खड़े थे, पत्र-रचना देख रहे हो सकते थे, सात-समंदर, सात-स्वर, सप्तपदी, सप्तर्षि या सात मार्च (उनका जन्मदिन)। आबू में घूमते हुए मैं, इला चंद्रप्रभा सब एक पेड़ के नीचे ठिठके, पेड़ को गौर से देखते हुए। काहे का होगा पेड़? हममें से किसी को पता नहीं था पीछे मित्रों के साथ आ रहे वात्स्यायन जी की प्रतीक्षा की उस पेड़ के नीचे खड़े होकर। आए तो मैंने पूछा 'वात्स्यायन जी, यह काहे का पेड़ हैं? उन्होंने आँख उठाकर देखा पेड़ को और बोले, 'इतना आम पेड़ है। आपको नहीं मालूम।' नाम पेड़ का उन्होंने नहीं बताया। इला ने कहा लगता है उन्हें भी पता नहीं है। बात विश्वनीय तो नहीं थी। मगर बहरहाल।

पाँच-सात दिनों के होते थे ये शिविर। एक प्रमुख विषय होता उसके विभिन्न पहलुओं पर पर्चे होते, चर्चा होती। रचना पाठ होता, आस-पास के दर्शनीय स्थानों पर घूमना होता। सब लोग साथ-साथ खाते-पीते रहते। वात्स्यायन जी सारे समय सबके बीच बने रहते। एक दोपहर इला के कमरे में वात्स्यायन जी, दुर्गा भागवत, रघुवीर चौधरी और मैं बैठे थे। उन्होंने मुझसे कविताएँ सुनाने को कहा। आतंकित तो अज्ञेय जी ने कभी नहीं किया, उनके जैसे कवि की उपस्थिति में कविता पढ़ते हुए संकोच अवश्य था इसलिए अपनी पूरी आवाज में कविता पढ़ना शायद नहीं हो पाया होगा। 'कविता क्या ऐसे पढ़ी जाती है? ' अज्ञेय जी का उलाहना था। जवाब इला ने दिया। 'बेचारों ने पढ़ दी यही क्या कम है?' 'कवि कभी बेचारा नहीं होता।' कवि अज्ञेय बोले थे।

आबू से लौटते हुए रास्ते में मोढेरा का सूर्य मंदिर देखने का मौका मिला था। कोणर्क के बाद यह दूसरा सूर्य मंदिर था। इसकी परिकल्पना कोणर्क के स्थापित की परिकल्पना से एकदम भिन्न थी। अहमदाबाद रूकना भी हुआ, गुजरात विद्या-पीठ के गेष्ट हाउस में। वहाँ गुजरात साहित्य अकादमी ने वात्स्यायन जी के काव्यपाठ का आयोजन किया था। दो, एक कविताओं कि फरमाइश मैंने भी की थी। उन्होंने अपने चयन में उन कविताओं को शामिल कर लिया था। पाठ के बाद जब लौटने के लिए कार में बैठने लगे तो बोले 'अब तो आप खुश हैं?' 'बिलकुल। खुश तो हूँ कविता से पूरी एक पंक्ति नदारद थी।' कौन-सी? मैंने अपनी पसंद की वह छोटी-सी कविता दोहरा दी - 'मैंने देखा / एक बूँद सहसा उछली / सागर के झाग से / रंगी गई पल भर को / ढलते सूरज की आग से / मुझको दीख गया / सूने विराट के सम्मुख / हर आलोक छुआ अपनापन / है उन्मोचन / नश्वरता के दाग से।' 'सूने विराट के सम्मुख' पंक्ति गायब थी और मजा यह कि स्वयं कवि को भी इसका पता नहीं चला था। पर वे मुद्रित थे। यह कविता अज्ञेय जी ने विद्यानिवास जी वाले चयन से पढ़ी थी, उसमें भी यह पंक्ति गायब थी।

दूसरे दिन मैं और इला बाजार गए थे। क्या खरीदा था यह तो याद नहीं, इतना याद है कि जब लौटकर आए तो अज्ञेय जी ने लाओ की मुद्रा में उँगलीयों को अपनी ओर मोड़ा और 'हमारे लिए क्या लाए हो?' बच्चों वाले उत्साह से पूछा था। पहली बार दिमाग में वह बात कौंधी की वात्स्यायन जी को भी कुछ दिया जा सकता है उसके बाद ऐसा कुछ ढूँढ़ती रहती थी, जो उन्हें दिया जा सके। एक बार खादी भंडार में बढ़िया ऑफ व्यइट डोरिया मिल गया बस तुरंत ले लिया और उन्हें दे दिया। अगली बार जब वे भोपाल आए तो कुरता बनवाकर लाए। दूसरे रोज दिन भर वही पहने रहे।

इन शिविरों ने मुझे अकेले लंबी यात्राएँ करने और उनका मजा लेने के अवसर दिये। आबू, बोधगया, जम्मू, भरवारी। बोधगया जाने के लिए गया स्टेशन पर मुँह अँधेरे पहुँची थी। आते हुए दिन में अभी अँधरे का स्वाद था और हवा में खुनकी। इक्के से जाना इसलिए चुना था कि धीरे-धीरे चलता हुआ वह मय अपने पूरे आस-पास के मुझे बोध गया ले जाए। आबू में ब्रह्मकुमारी आश्रम का परिसर था और बोधगया में बोधिवृक्ष वाला परिसर। हर का एक अलग वातावरण था और अलग प्रभाव। एक शाम शिविर के सब साथी गया गए थे। गया की पिंडदान की ख्याति से मैं परिचित थी लेकिन उसके लाल और काले पत्थरों से बने कई आकार-प्रकार के कटोरों की ख्याति का पता वहीं जाकर लगा। वात्स्यायन जी ने भी दुकानों में जा-जाकर कटोरों का चुनाव खुद किया था घंटों लगाकर। प्लेटें भी चुनी थी। उनका उपयोग शिविर में होता रहा और फिर वे उन सब को वहीं छोड़ गए थे। मैं चकित थी कि जितने चाव से खरीदा था उतनी ही निःसंगता से वे उन्हें छोड़ भी गए। वे कटोरे इतने अच्छे थे कि वजन के बावजूद उनको लाने का लोभ संवरण करना कठिन था।

जम्मू शिविर में हम दोनों साथ गए थे। नवीन सागर भी हमारे साथ थे। अलग-अलग शहरों से कई सारे सहभागी लेखक दिल्ली आए थे और दिल्ली से जम्मू तक की यात्रा सबने साथ की थी। बोगी भर में जहाँ देखो लेखक ही लेखक थे। कुछ अजब ही दृश्य था। रेल में इतने सारे लेखक एक साथ, खाते-पीते, ठहाके लगाते, गंभीर बहसों में उलझे हुए। ऐसा लगा जैसे उनका कुनबा आ जुटा हो देश के कोनो-कोनो से। वहाँ चाय-कॉफी पीने वाले हम लोगों के लिए कहवा एक नया और अनोखा अनुभव था। इलायची के बावजूद दालचीनी अपनी धाक जमाए रहती थी। ऐसा कहवा हमारे साथ भोपाल न आता तो ही बात अचरज की होती। जगह जहाँ ठहरे थे इतनी अह्लादक, इतनी शांत थी जैसे अपने में पगी हो। जंगल, झील, पहाड़ सब कुछ एक साथ था।

वात्स्यायन जी से पहली बार मिलने का मौका इतनी अचानक और एकदम बगल से ऐसे गुजर गया था कि मैं देखते रहने के अलावा कुछ नहीं कर पाई थी। अल्मोड़ा में ऐसा कोई अवसर भक् से उपस्थित हो जा सकता है इसका खयाल तो सपने में भी कभी नहीं भटका था। कासार देवी जाते हुए छोटे भाई के.पी.शाह ने कलमटिया पर एक ऊँचे -पूरे, कदावर आदमी को देखा और 'उनके मन में आशंका जाग गई हो न हो ये अज्ञेय जी हैं'। आमने-सामने न देखा हो, तस्वीरों में तो देखा ही था। फिर भी तस्वीर, तस्वीर थी और धोखा भी दे सकती थी। जितनी दूरी पर वे थे, मिलान सिर्फ कद-काठी से ही संभव था।

पहले 'मैं' बाद में 'हम' वाले रमेश उसी शाम कलमटिया की ओर चल पड़े कि तहकीकात कर लें। हमें चकित करते हुए सच में वे वहाँ थे और रमेश की उनसे मुलाकात भी हो गई। दूसरे या तीसरे दिन जब हम पहुँचे तो कलमटिया वाले उस घर के सामने ताला लटका देखकर भी उम्मीद नहीं छोड़ी थी, हो सकता है घूमने गए हों। 'घूमने नहीं, वो तो आज सुबह चले गए' कलमटिया से उतरते हुए मिले चौकीदर ने उम्मीद के लिए कोई जगह नहीं छोड़ी थी।

अल्मोड़ा में हम कभी बाजार या सिनेमा न जाते। जितनी जल्दी हो सके बाजार को लाँघ कर इस, उस या किसी भी सिरे से बाहर जंगल की ओर निकल लेते। जब भी कभी नीचे दो पहाड़ों के बीच से बहती सुआल की झलक मिल जाती तो ये पंक्ति जरूर मन में कौध जाती-बिछी पैरों में नदी / ज्यों दर्द की रेखा'। इसी तरह सामने पाँखुरियों की तरह खिली पहाड़ की चोटियों को देखते हुए इन पंक्तियों को दोहरा लेने का लालच कभी कम नहीं हुआ - 'धूप / माँ की हँसी के प्रतिबिंब-सी। शिशुवदन पर / हुई भासित / नए चीड़ों से कँटीली पार की गिरि श्रृंखला पर'। अलग-अलग ऋतुओं में प्रकृति के बीच होने पर अज्ञेय की कविता साथ बनी रहती हैं फिर वो 'ओ पिया पानी बरसा हो', कि पकी ज्वार से निकल शशों की जोड़ी गई फलाँती / सन्नाटे में बाँक नदी की / जगी चमक कर झाँकत' हो कि 'घास हरी हुलसानी हो' या भोर-बेला सिंची छत से ओस की तिप् तिप् हो', इसके अलावा कर्म ही आघात को सहने का एकमात्र उपाय है' या, विश्वास पाकर धोखा देना आसान नहीं जेसी उक्तियों ने हमेशा कर्म और मनुष्य पर मेरे विश्वास को बनाए रखा।

वात्स्यायन जी से मिलने का मौका फिर ठेठ सन् 1975 में आया। जब वे 7 मार्च जन्म दिन पर भोपाल आए। इला भी साथ आई थी। गाजर के हलुए और मुठिए से हमने उनका जन्म दिन मनाया था। रमेश के साथ तय हुआ था कि उन्हें लेकर वे लोग साँची विदिशा जाएँगे अब मैं परेशान, यह क्या बात हुई कि हर बार बाजी ये मार ले जाएँ। मैंने वात्स्यायन जी को लिखा कि आपने आमंत्रित किया हो, न किया हो 'मैं भी साथ चलूँगी।' उन्होंने कुछ झेंप के साथ लिखा 'मैं भी चाहता था कि आप चलें। संकोच इतना ही था, कि बच्ची छोटी होने से आपका चलना शायद संभव न हो। आप अवश्य चलें।' बस फिर तो क्या थीं उन दिनों तो यों भी बात मन को पंख लग जाया करते थे। फिर तो आसमान होता और मैं होती। न मैं थकती न आसमान खत्म होता।

पहले साँची गए। वहाँ गेस्ट हाउस में चाय-शाय के बाद विदिशा महावराह को देखने चल पड़े। साँची से विदिशा ताँगे में गए। लौटकर साँची में सड़क किनारे के एक ढाबे में पेड़ के नीचे चाय पीते हुए उन दिनों चल रहे क्रिकेट मैच की कमेंट्री सुनी थी। दूसरी बेटी कक्कू तब अभी गोइ में ही थी, कुल जमा डेढ़ साल की। घूमने में किसी न किसी को उसे गोद में लिए रहना पड़ता था। उसे गोदी लेने की अपनी बारी वात्स्यायन जी खुद ही तय करते थे। रात गेस्ट हाऊस में रहना तय था। दिन भर घूमने में थक कर कक्कू सो गई थी। टीकू हमारे वाले कमरे में उसके साथ थी और खाना खा रही थी। हम लोग डायनिंग हॉल में थे। वात्स्यायन जी बेयरा को बुलाकर कहा कि कमरा नं. इतने में रोटी-सब्जी पहुँचा आए। हमने मान लिया कि वह पहुँचा आया होगा। पर वात्स्यायन जी का ध्यान लगातार उधर था। बेयरा जब वहीं का वहीं नजर आया तो बिना बोले वे उठे, रोटी और सब्जी की प्लेटें लेकर हमारे कमरे की ओर बढ़ लिए। उनका विश्वास कर्म में अधिक था।

वे जब भी हमारे यहाँ आते खाना खाने के बाद काफी देर तक खाने की मेज पर बैठे रहना पसंद करते। इस बीच कई पुरानी बातें बात में से निकलती बात की तरह निकलती चली आतीं। जिसमें ऊपर जाकर चिमनी से रेत डालकर खाने में खिसखिसाहट पैदा करके रसोइए को डाँट खिलवाने जैसे प्रसंग भी होते। बोलते वे कम तो थे, पर इतना कम भी नहीं। कभी सोचती हूँ तो चकित रह जाती हूँ, क्या नहीं जानते हम उनके बारे मैं? क्या नहीं कहा उन्होंने? हालाँकि स्वयं कवि ने कुबुल किया है कि - ' है, अभी कुछ और जो कहा नहीं गया / इस अहंकार के मारे / अंधकार में सागर के किनारे / ठिठक गया : तन हूँ / उस विशाल में मुझ से वहा नहीं गया / इसी लिए जो और रहा वह कहा नहीं गया।'

उनकी उपस्थिति सदा एक मुखर उपस्थिति होती थी। वे चुप शायद इसलिए भी रहते थे कि आसपास की सूक्ष्म ध्वनियाँ उन्हें सुनाई दें और वे उनकी कविताओं में ध्वनित हों। उन्हें पता था कि - 'शब्द, यह सही है, सब व्यर्थ है / पर इसी लिए कि शब्दातीत कुछ अर्थ है।'

गांधीजी ने सत्य को अपने जीवन में खोजा था। 'सत्य ना प्रयोगों' अपनी आत्मकथा की भूमिका में वे लिखते हैं - 'दूर-दूर से सत्य की, ईश्वर की झलक भी देख रहा हूँ। सत्य ही है, उसे छोड़ कुछ भी नहीं है इस दुनिया में और फिर जो कुछ भी मेरे लिए संभव है, वह एक बच्चे के लिए भी संभव है, ऐसा मैं अधिकाधिक मानने लगा हूँ और इसके लिए मेरे पास ठोस आधार है। सत्य की खोज के साधन जितने कठिन हैं, उतने ही आसान भी हैं।' अज्ञेय जी ने सत्य की खोज शब्दों में की। उनका सच का आग्रह, उनकी कविता गवाह है, सर्वोपरि रहा - 'कहा सागर ने चुप रहो। मैं अपनी अबाधता जैसे सहता हूँ / अपनी मर्यादा तुम सहो... / जितना तुम्हारा सच है उतना ही कहो।' किसी ने उनसे पूछा हो या न पूछा हो, उन्होंने अपने से अवश्य पूछा और बार-बार पूछा - 'यह जो दिया लिए तुम चले खोजने सत्य / बताओं क्या प्रबंध कर चले / कि जिस बाती का तुम्हें भरोसा / वही जलेगी सदा / अकंपित, उज्ज्वल, एकरूप निर्धूम?' इस प्रश्न में शक से अधिक विश्वास सुनाई देता है - 'यह वह विश्वास / नहीं जो अपना और अपने शब्द का था उन्हें। जितने, जैसे वे शब्द के साधक थे वैसे ही सजग प्रहरी भी। कभी-कभी दोनों के बीच का अंतराल खत्म हो जाता - 'कौन द्वारी/कौन आगारी / पर भीतर के देवता ने / बाहर के प्रतिहारी को बार-बार किया पा लागन।' रचना की मूल शर्त अगर शब्द की जीवंत सत्ता हो तो, शब्द साधना का मर्म भी वही हो सकती है। शब्द और सत्य का जितना सम्मोहन कवि अज्ञेय को था उससे जरा भी कम 'अनुभव अद्वितीय' और उसके उजाले का नहीं था - 'मेरे छोटे से घर कुटीर का दिया / विराट के विस्तृत आँगन में / सहमा-सा रख दिया गया / या / ओ तू पगली आलोक किरण / सूधर की खोली के, कर्दम पर / बार-बार चमकी / पार साधक की कुटिया को / बज्र अछूता / अंधकार में छोड़ गई।'

साहित्य की लगभग सभी विधाओं में उन्होंने एक नई शुरुआत की। कविता, कहानी उपन्यास, यात्रा वृतांत सभी में उनका योगदान शीर्ष स्थानीय माना जा सकता है। नवाचार जैसे उनका स्वभाव-धर्म था। जो भी काम वे करते, वह उनकी आत्माभिव्यक्ति की तरह होता। मानसिक थकान को उतारने के लिए वे कई तरह के शारीरिक काम करना पसंद करते - जैसे मिट्टी की या चीनी मिट्टी की चीजें बनाते (पॉटरी करते), जूते बनाते, बुनाई करते, बागबानी करते, फोटोग्राफी करते, अपने और इला के कपड़े डिजाइन करते, पकवान सहित सादा खाना भी कभी-कभी बनाते।

मुझे याद है, वे अभी वसंत के दिन थे। अल्मोड़ा से लौटते हुए हम लोग एक दिन उनके यहाँ रूके थे। इला अपने पिता की अस्वस्थता के चलते अस्पताल में व्यस्त थी। वात्स्यायन जी ने लौकी की बरफी बनाई थी। मैंने भी इससे पहले और इसके बाद भी लौकी की बर्फी तो कई बार बनाई थी। बाद में उस उम्मीद में कि क्या पता वैसी बन हीं जाए। मगर लौकी, मावा और शक्कर का वात्स्यायन जी वाला वह अनुपात कभी नहीं सधा, इसलिए वह स्वाद दोबारा कभी नहीं मिला था और लौकी की बर्फी खाने का वह अनुभव अभी तक अद्वितीय बना हुआ है।

लौकी सब्जी के रूप में भी उन्हें प्रिय थी। जब कभी भोपाल आते और मैं 'सब्जी क्या बनाऊ' उनसे पूछने जाती तो पूछते क्या-क्या है? अगर लेने का दो-एक सब्जियों के ही नाम होते तो कहते 'कुछ न हो तो कविप्रिया (लौकी) तो है ही।' खाना पकाने की महीन गुर वे जानते थे। भाजी (हरी सब्जी) के रंग को हरा कैसे रखा जाए से लगाकर सब्जी को किस सीमा तक पकाया जाए, किस सब्जी में कितना मसाला डाला जाए कि सब्जी का अपना स्वाद कायम रहा आए तक कई सारे।

उनका इतनी तरह के कामों में दिलचस्पी लेना भी कई लोगों के लिए उनसे चिढ़ की एक बजह थी। लेकिन जो जानते हैं उन्हें पता है कि इससे कम में उनकी आत्माभिव्यक्ति नहीं हो पाती थी। घर की साज-सज्ज और रख-रखाव भी इसी तरह उनकी पसंद का एक काम था। दीवान इस बार बैठक में रहेगा या नहीं? रहेगा तो किस जगह, सोफा बेंतवाला (उसे उन्हें डिजाइन किया था) मन कुर्सियों के किस तरह रहेगा? कुर्सी कितनी तिरछी या कितनी सीधी रहेगी? कौन सी, दीवार पर कौन सा शिल्प रहेगा? एक सुबह मुझे और इला को बाजार भेज दिया और खुद भृत्य के साथ जुटे रहे। हमारे लौटने तक उन्हीं चीजों के बावजूद कमरे की काया पलट हो चुकी थी। इस बार की सज्जा में कुर्सी की बगल में रखा लैंप प्रमुखता से ध्यान खींच रहा था। 'बड़ा सुंदर शेड है!' मेरे मुँह से निकला! 'दिस इस ऑल्सो 'डिजाइंड बाय एस.एच.वात्स्यायन।' वे बोले थे।

सुबह उठकर बगीचे में पहुँचे रहते। किस मौसम में किस पेड़ के पत्ते बदलेंगे, कौन-सा पेड़ कब फूलेगा, किस रंग में फूलेगा, कौन-सा कब फलेगा? कब पेड़-पौधों को किस चीज की जरूरत होती है उन्हें मालूम होता। उनके जाने के बाद तीसरे दिन सुबह बगीचे में माली से मुलाकात हुई थी, बोला 'देखने वाला तो चला गया। किस पौधे में आज नई कोंपल फूटी है, कली आई है या फूल खिला है उन्हें पता होता था।' उन्होंने खुद लिखा है 'कहाँ-कहाँ से पौधे ले जाकर कहाँ-कहाँ लगाता रहा हूँ लगे तो नब्बे प्रतिशत, जो फूलने-फलने वाले थे वे फूल-फले भी। कुछ लोग यह सबाल भी पूछते रहे है - 'इस सब से आपको क्या मिला?' ऐसे सवालों का जवाब देना जरूरी नहीं लगा।

बात उनके पचहतरवें जन्मदिन की है। जहाँ आयोजन हुआ था तांबे-पीतल के बड़े-बड़े कसेरों में ढेर सारी गुलछड़ी सजी थी। उनके घर के दरवाजे पर रोली और हल्दी से सजी रंगोली रंग-सुगंध फेला रही थी। शाम को कुमार गंधर्व का गायन हुआ था। अंत में खाना हुआ। बाद में हम लोग लॉन में बैठे थे। कोई फूल खरीदकर देने का विचार, जाने क्यों उनके और अपने मेल में नहीं लगा था। बहुत देर की चुप्पी के बाद मुँह ये निकला 'अगर कोई आज के दिन खिले सारे फूल आपको देना चाहे तो कैसे दे सकता है?' प्रश्न यों भी उत्तर के लिए नहीं था। वे प्रसन्नता से मुस्कराए थे।

वे कवि थे। शब्दों के बीच की चुप्पियों में अनकहे को कहने का रहस्य जानते थे। फिर भी कुछ घटानाएँ, कुछ अंतःसाक्ष्य या साक्ष्य होंगे अवश्य जिन्हें हम-आप न जानते होंगे और यों भी अंततः इससे फर्क भी क्या पड़ना है। वे जो थे वह होकर ही वे जिये। जो, जैसा जब चाहा किया, किसी दबाव में नहीं आए। वे स्वभाव से ही स्वाधीन व्यक्ति थे। वे जब नहीं रहे तो उस मौके पर निर्मल जी ने कहा था - 'उन्हें फर्श पर लिटाया हुआ देखकर मुझे दुख या विषाद नहीं हुआ बल्कि कुछ ईर्ष्या-सी हुई कि कैसा अनुभव समृद्ध जीवन जिया इस आदमी ने!'

बहुत सारे लोगों को वे इलीट या अभिजात, अहंकारी, आत्मकेंद्रित, पाश्चात्य आदि-आदि लगते थे। क्या वे आतंक जगाते थे? प्रदर्शन प्रिय थे? क्या वे दूसरों को लघुता-बोध कराने के लिए ही बहुत सारे काम किया करते थे। या यही उनकी जरूरत थी, उनका स्वभाव था और वे स्व-भाव में रहते थे?

जिस समय जिसके साथ रहना था या होना चाहा रहे या हुए। जब मानवेंद्र नाथ राय के साथ सोचा तो सोचा, और एक दिन सड़क किनारे की पान की दुकान पर बज रहे रेडियों से बोल रहे महात्मा गांधी की आवाज ने रोक कर थाम लिया तो अपने को उनके हवाले कर दिया। सत्य के खोजी के केंद्र में यह जो खुलापन है वही, उसके होने की बुनियादी शर्त है। उनकी अनुपस्थिति में सबसे बड़ी कमी जो महसूस होती है वह इस खुलेपन है, जो दूसरे को भी स्वयं होने का अवकाश देता है। - 'तुम यही जानो कि अनुक्षण मुक्त है आकाश'।

सन 75 में वात्स्यायन जी के भोपाल आने की संभावना का पता जब अशोक वाजपेयी को चला तो उन्हें भी यह पता चला था कि वे हमारे यहाँ ठहरने वाले हैं तो उन्होंने फोन करके उनसे कहा कि 'आपको असुविधा हो सकती है, आप कहे तो मैं होटल एक कमरा बुक करबा दूँ।' जहाँ तक सुविधा-असुविधा की बात है अशोक का सोचना सही था कि जिस सरकारी घर में हम रह रहे थे, वह उस तरह से सुविधाजनक नहीं था। फिर भी वात्स्यायन जी ने हमारे साथ रहना चुना, यह हमारे लिए एक अदभुत खूशी का मौका था। बाद में भी वे हमारे पास आकर कई बार रहे। इस बात की ओर ध्यान बहुत बाद में गया कि जिस तखत पर वे हमारे यहाँ सोते थे, उसकी लंबाई, खुद उनकी लंबाई से कम थी। जब यह बात समझ में आई तब तक बहुत देर हो चुकी थी। वे हमारे यहाँ ठहर कर अप्रैल 1987 की रात जा चुके थे। हमें पता नहीं था कि उनका वह आना अंतिम बार था और अपनी गलती की कहीं कोई गुंजाइश नहीं बची थी।


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हिंदी समय में ज्योत्स्ना मिलन की रचनाएँ