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कविता

इस विश्वास पर
सर्वेंद्र विक्रम


जैसे प्रेतयोनि में पड़ा हो कोई पुरखा
और इसी में छिपी हो उसकी मुक्ति,
माँ पीट रही है सूप घर के हर कोने-अँतरे
इतना हक है उसे

दलिद्दर खेदने से दूर हो जाएगा परिवार का दारिद्र्य
दुखों के पीछे-पीछे सूप पीटती जाती है सरहद तक
अपनी समझ से फेंक आती है वहाँ दुख
दुख की स्मृतियाँ और वह सूप,
वापस अपनी दुनिया की चौखट पर कदम रखते ही
पाती है, कब से वहीं बैठे हैं गुड़ी-मुड़ी दुख
जैसे कहीं गए ही न हों
जैसे कोई दूसरा ठिकाना ही न हो

स्याह-सफेद में सिफर दुनियादारी में अनाड़ी पिता से नाराज
पीटती रही कपड़े बर्तन बच्चे
हर कोने-अँतरे से बुहारती रही अँधेरा
जैसे कर रही हो हर नए दिन को प्रणाम

उसने बाँधा नहीं पल्लू में ज्ञान
चलने से पहले गँठिया दिया गया धान
राँधती रही करती रही सारा जीवन अरवा भुजिया
पल्ले नहीं पड़ा मुक्ति-अभियान
कुश की पिटारी में सँजोती रही चिट्ठियाँ हल्दी लगे निमंत्रण
जोड़ती रही धागे में धागा दिन-रात अरुझा सुलझाती रही
बुनती रही कंकड़-पत्थर बीनती रही

दुख जमा दलिद्दर बराबर जीवन, करती रही
नहीं दिया अदृश्य को उलाहना

घर की नींद में बिना खलल डाले
माँ अब भी मुँह-अँधेरे सूप पीटती
दलिद्दर खेदती जाती है सीमांत तक
पता नहीं, उस वक्त कोई मंत्र बुदबुदाती है या नहीं
कभी कभी बताती है सन् सैंतालिस की याद में
उसकी माँ भी सूप पीटती गई थी सिवान तक
गोरे तो गए फिर दलिद्दर क्यों नहीं ?

फिर किसके पीछे पड़ी हुई है माँ अपने औजार लेकर
सूप जैसा प्राचीन विश्वास लेकर।


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