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कविता

आलमारी
सर्वेंद्र विक्रम


उसके ढहाए जाने की पूर्वसंध्या पर एक बार फिर सब इकट्ठा थे
यह कोई पवित्र ढाँचा नहीं घर था जहाँ हमारा बचपन बीता

दीवार में बनी उस आलमारी में मैं जैसे तैसे खड़ी हो पाई
याद आया जब मैं छोटी थी उसके दरवाजे हमेशा खुले रखे जाते
छिपने की कोशिश में कहीं उसी में बंद न रह जाऊँ
और तमाम चीजों के साथ मेरा दम घुट जाए

'हम कैसे रह लेते थे इसमें'
जो मेरी स्मृति में था उससे कितना अलग था घर!
किसी चीज को पाने खरीदने को स्थगित करते रहना
कम पैसों, कम जगह, किसी और वजह से
कोई नई चीज खरीदने से पहले चिंता होती रखेंगे कहाँ

अब हमें सुविधा थी
रोमांटिक हुआ जा सकता था उन पुराने अभावों की याद में

'आलमारियों में बंद पड़े कपड़े किसी और के शरीर पर होने चाहिए'
जब मैंने पढ़ा तो मुझे अपना खयाल आ गया
किसी और के शरीर पर होना चाहिए ?
बँट जाना चाहिए ?

जो लोग मुझे ले आए हैं उनकी आदत होगी
इस्तेमाल के बाद गैरजरूरी हो जाने वाली चीजों को भी
जमा करते जाने की
तमाम दुछत्तियों तहखानों के भर जाने के बाद बचे सामानों को
कहीं भी डाल देना और नई चीजों के लिए जगह बनाना
वे नई से नई चीजें मुझे हर दिन धकेलती रहती हैं बाहर की ओर
बंद खिड़कियों दरवाजों के पीछे सामानों के ढेर में मैं भी

कभी कभी सोचती हूँ माथे पर एक चिप्पी चिपका लूँ
'मुझे खेद है मैं आपके रास्ते में रुकावट डाल रही हूँ'

आलमारियाँ हर देशकाल में फैली हैं
लोगों को लगता है आलमारियाँ होती ही हैं ठसाठस भरी जाने के लिए

बड़े हो चुके बच्चों के कपड़ों खिलौनों
पुरानी डायरियों खानदानी स्मृतिचिह्नों से भरी आलमारियों
कोठरियों घरों से वे मुझे मुक्त भी नहीं करते
मैं किस आलमारी में बंद पड़ी हूँ सामानों के साथ
मुझे किसने बंद किया हुआ है ?
क्या मैंने खुद ने ?


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