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कविता

पुल पर
सर्वेंद्र विक्रम


खत्म होने और बचे रहने की संधि पर
मूली नींबू मिर्च जैसी मामूली चीजों के भरोसे
वह पुल पर थी
बिकने वाली चीजों का हरापन बचाने की कोशिश करती

आवाज लगाती मोलभाव करती और
चेहरे की नमी खत्म हो रही है इससे बेपरवाह

गुजरते हुए जुलूस और जनाजे साइकिलें ठेले ताँगे
स्कूली लड़कियाँ और किन्नर अफवाहें और मौसम
सर्दियों की धूप में कटी पतंगें मँडराकर गिरती हैं नदी में
तब एक क्षण जी धक्क से रह जाता है
गाड़ियों से उठता धुआँ गाढ़ा होकर टँगा रहता है आसमान में
धीरे-धीरे भरता रहता है भीतर

जूझती हुई वह दिन को दर्ज नहीं करती दिल में
फिर भी कुछ है जो चिपका रह जाता है,
उसे रगड़ रगड़ कर छुड़ाना चाहती है
पानी पीटती छप-छप छपाक्-छपाक् की अभिलाषा में
किसी दिन नदी को अपने एकांत में ले जाना चाहती है

वह सब कुछ तजकर आई, न लौटने की जिद में
कभी याद करती है बिना किसी पछतावे के

तटबंधों को तोड़कर बहती रहती,
सपने में देहभर मिट्टी और देहभर पानी के सहारे
उगाने की आशा में बोती रहती
और प्रकाश की ओर मुँह किए बैठी रहती,
नीम की पीली पत्तियों से ढकता हुआ अपना निर्वसन शव
देखकर अचानक नींद खुल जाती है
देर तक गुनती रहती है : किसे पुकारती थी सपने में ?

खत्म होने और बचे रहने की संधि पर
मूली नींबू मिर्च जैसी मामूली चीजों के भरोसे
पुल पर,
प्रेम के बिना।


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