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कविता

धुनियें
सर्वेंद्र विक्रम


जाड़ा उतरते ही वे प्लेटफार्म पर उतरते हैं
ट्रेन पकड़ने उधर के लिए
वहाँ जहाँ शादियों के मौसम शुरू हो रहे हैं
वहाँ से भी उधर जहाँ ठंड बढ़ रही है

वे बुद्ध की भूमि से आते हैं
बुना गया जहाँ चार आर्य सत्यों का ताना-बाना
दुख है दुख का कारण है दुख का निवारण है
लेकिन उपाय ? धुनियें समझ नहीं पाते
घूमते रहते हैं यहाँ वहाँ शहर शहर

पढ़ा नहीं होगा लंबी हो रही है खुली आयात सूची
कपास उगाने वाले किसानों की आत्महत्याएँ
ध्यानाकर्षण काम रोको प्रस्ताव
रूई की जगह कृत्रिम रेशे का विकल्प

जुलाहों पर तो बहुत कुछ है
बनारस और बंगाल ढाका की मलमल
छह सौ बरस के कबीर हैं
धुनियों के जीवन में नहीं है उपन्यास की संभावना

धुनियें दिल्ली जाते हैं या नहीं
पता नहीं
जहाँ बहुत कुछ है धुनने के लिए
रूई के अलावा भी ।


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