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कविता

मूँगफलियाँ
सर्वेंद्र विक्रम


आदमकद पुतले, डिजाइनर पोशाकें, खुलापन
चमचमाते जूते और चश्मे रंगीन
अलग तरह के स्वाद पिज्जा बर्गर आइस्क्रीम
निरंतर बज रही धुन पर खाते-पीते मस्त लोग
पुराना काफी हाउस, गांधी की मुहरवाला खादी भंडार
संकटमोचन मंदिर पटरी पर पत्रिकाएँ और अखबार

सद्यजात जिनकी अभी नभिनाल भी नहीं काटी गई थी
बेच रहे थे खास रंगोंवाले कपड़े
भाषा को दी जा रही थीं नई क्रियाएँ
वहाँ बहुत कुछ था

'यहाँ आटा पीसने तेल पेरने का इंतजाम कहाँ है' ,
पता नहीं उसने यूँ ही पूछा
या सचमुच था उसके पास था गेहूँ और तिल

जो चीज जिस भाव बिकनी चाहिए थी
बिक रही थी किसी और भाव
चलन में नहीं था किसी तरह का मोलभाव
उसकी भी हिम्मत नहीं पड़ी

उसने मूँगफलियाँ खरीदीं
कागज का थैला भी उसी भाव तौले जाने पर
अपने आपको ठगा सा महसूस किया

जनवरी की उस शाम मूँगफलियाँ टूँगते हुए
वह यूँ ही पहुँच गया गुजरात
जहाँ से निकलकर पहुँचती हैं मूँगफलियाँ देश के कोने-कोने
उसने कुछ और सोचने की कोशिश की
कौंध गया 'मंटो' का बयान
छातियों को छातियाँ न कहें तो क्या मूँगफलियाँ कहें
उसे अपने आप पर झेंप आई
गोया अश्लील हरकत करते देख लिया गया हो
पकड़ी गई हो बाजार में इधर-उधर फिसलती उसकी नजर,
उसने कनखियों से देखा अगल-बगल
किसी का ध्यान नहीं था उस पर
ठीक ठीक समझ नहीं आ रही थी उसे इस शर्म की वजह

हालिया रिलीज फिल्म के लिए उमड़ रही थी भीड़
कहीं से आने लगी डूबती सी अजान की आवाज

वृत्तांतों को पार कर आने लगे सरपट बावर्दी घुड़सवार
मौनियों की साधना जारी निष्कंप निर्विकार

बीते साल कितनी मेहनत से तैयार हुई जमीन
अब कटने के लिए फसल थी भरपूर तैयार
नायक सफलता के इस नए रसायन को आजमाने की तैयारी में
दूसरे सूबों में अच्छी फसल के लिए अगली ऋतु में


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