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कविता

वसीयत
सर्वेंद्र विक्रम


इतनी कम नहीं हो गई थी हवा
फिर भी बेनींद बेदम और निढाल महबूब मियाँ
उन्हें मरने का डर नहीं था
बस गुजर रहे थे कठिन दौर से

अचानक उड़ने लगती है कोई होशरुबा खुशबू
और धान-पान सी वो
बताशे और नीम के फूल
धूप-छाँह सी लुकाछिपी बारिश के दिन
पिछवाड़े क्यारी में प्याज का हरापन
छतनार पेड़ों की छाँह में खामोश कब्रिस्तान
लड़ते हुए नेवले की जिद और साँप का फन
सब डूब जाता है खाँसी की तान में

किसी सूरत तैयार नहीं हो रहे थे महबूब मियाँ
सीने का एक्स-रे निकलवाने के लिए
डर था, खुल जाएगा धीरे धीरे भरता घाव
बेपर्दा हो जाएँगे सबके सामने

यादों का छत्ता जिसकी तमाम कोठरियों में रह रहे थे
यार दोस्त रिश्ते-नातेदार जो कब के जा चुके उस पार
इधर अपनी ही जमीन पर बेगाने फक़त वे
जैसे कोई नश्तर आरपार,

उनकी नस्ल के बारे में जो कुछ दिखाया बताया जा रहा था
शुरुआती हिचक के बाद उन्होंने सच मान लिया

सिकुड़ते सूखते क्रमशः कम होते हुए
चुपचाप एक जैसी मौत हर रोज
सपने में अपार सुंदरता और अछोर प्रेम
उन्हें बचा लेता है डूबने से

उनका कोई एजेंडा नहीं था
शायद इसीलिए अपना कोई इतिहास नहीं था
कोई ऐसी हरकत नहीं की जिससे पुरखों के नाम पर हर्फ आए
फिर भी गर्दन पर जाने कौन सा बोझ है
दीवारों पर डोलती परछाइयाँ ज्यादतियाँ, खो देने का इमकान
जिंदा जलाए जाने मारे जाने का धारावाही अभियान
भयानक चुप्पी के खतरनाक संदेश
हर वक्त किसी अनहोनी का डर

कान के पीछे बीड़ी पर चला गया हाथ
लेकिन जगह का खयाल कर सकपकाए से ताकने लगे
आदमकद आईने में यह किरचों भरा अक्स किसका है ?
मुखातिब कौन है ?
वे वहाँ क्यूँ हैं और वैसे क्यूँ हैं ?
आखिर वे कौन हैं ?

वे पूछ रहे थे शायद अपने आपसे
हिल रहे थे होंठ लेकिन सुनाई नहीं पड़ रहे थे शब्द
शायद जूझ रहे थे अपने तई
भाषा नहीं दुनिया चुन पाने की मुश्किल में

घबराकर क्षमा माँगती सी मुस्कराहट के साथ
उन्होंने बंडी नीचे खिसकाई जैसे मजलिस में हों
गले में झूलने लगा बेनाप का कुरता गोया खेत में बिजूका
और अंत में सँभालकर रखी सिर पर गांधी टोपी

मिनमिनाने लगे अपने सीने का फोटो देखने की जिद में,
गनीमत थी पकड़ में नहीं आईं वे चोटें, गाँठें, सूजन, लगातार रिसाव

इस फोटो में भी ज्यादातर सब स्याह था कहीं कहीं धुँधला सफेद
गनीमत थी खत्म हो गई आँखों की बीनाई चुक गई देखने की कूबत
उस लम्हे जैसे वे अपने साथ नहीं अपने खिलाफ थे
भूले हुए से खड़े रहे, क्या करें, क्या न करें, कहाँ जाना था ?
जब तब कान बजते रहते हैं, मारो काटो भागो बचाओ बचाओ
कभी सुराजियों की तकरीर
मन ही मन तय करते रहते हैं वसीयत का मजमून :
और हड्डियों से फासफोरस निकाल
बनाई जाएँ माचिस की तीलियाँ
जब अँधेरा पार करने लगे हदें
गुनाह है चुप बैठना।


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