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कविता

पानी
सर्वेंद्र विक्रम


चले तो माथे पर उड़ रही थी धूल
सूखे हुए ताल पोखरे नहरें अभिशप्त
रास्ते भर कहीं नहीं था पानी
पानी स्टेशनों पर भी नहीं था अभागे थे नल

लेकिन पानी तो बहुत था, बताते हैं कागज-पत्रों में
इतना था कि कहीं कहीं बाढ़ सी आई हुई थी

फोटो भी गवाह थे हरी घास पर लान में
रेन-डांस का मजा लूट रहे थे नौजवान

फिर पानी यहाँ क्यों नहीं था
रूठकर कहाँ चला गया क्यों नहीं आया
बतानेवालों ने बताया आसमान में किसी काली चादर
चूल्हे में जलाई जाती लकड़ी मोटरों के धुएँ और जंगल के बारे में
वातावरण की बढ़ती गर्मी के बारे में

गाड़ी चली तो किसी किस्से की बात चल पड़ी
जिसमें एक प्यासी चिड़िया ने जूठा कर दिया था पानी
राजा के पीने लायक नहीं रहा,
आम राय थी कि चिड़िया ही है सजा की हकदार
दुखहरन देख रहे थे

रास्ते भर सकपकाए से डरे डरे रहे
पानी कहीं और चला गया इसके लिए सिर्फ वही दोषी हों

पानी नहीं आया इस बार तय समय पर
नुकसान का अंदाजा लगाने आँखों देखने
बड़े हाकिम-हुक्काम दौरे पर थे
पानी के बारे में निर्णायक भाषा में वही कह सकते थे
उन्होंने तय किया कि घोषित किया जाए पानी नहीं है
अब तय करना था घोषणा का प्रारूप और सटीक अवसर,

दुखहरन भी चले थे लेकर थोड़ा सा सत्तू नमक
सरल सी उम्मीद और पानी पर भरोसा
कहीं न कहीं तो होगा ही मिल जाएगा जरूरत भर,
मन में थीं पानी की अनेक अनेक स्मृतियाँ
पुरइन के पत्ते पर बूँद जैसा काँपना
कहानियोंवाली 'गंगी' और 'ठाकुर का कुआँ'
मार फौजदारी और जेहल जेलखाना,
चचिया ससुर का बयान

लखनऊ टेशन पर टिमटिमाती आवाजें : 'हिंदू पानी' 'मुसलमान पानी' :
सुना, महात्माजी ने भी किया है जिकिर जब वे पधारे थे राजधानी

गते अषाढ़ जाते सावन जा रहे थे दुखहरन घरबार छोड़
सपने में भी न सोचा था कि एक दिन साथ छोड़ देगा पानी
कि एक दिन पानी भी बिकेगा
लेकिन बिक रहा था और कोई मोलभाव नहीं


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