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कविता

हे भाई गाड़ीवान
सर्वेंद्र विक्रम


ई जो आप बदल रहे हैं रंग रंग का गाना
अच्छा तो लग रहा है लेकिन आपका ध्यान रास्ते पर तो है न भाई गाड़ीवान ?

आपको मालूम तो है किधर जाना है चल तो वहीं रहे हैं जिधर जाना है ?
न गर्मी का अहसास है न सर्दी का लेकिन कैसी तो थकान है
कितने वर्षों से बैठे हैं कितना लंबा रस्ता है
झोपड़ों के मुहार पर बैठी औरतें घर बाजार गुमटियाँ और पेड़
सबमें एक वहीपन है सब कुछ वैसा ही दिख रहा है
ऐसा कोई चिह्न नहीं जिसे नया कह सकें

खंडहरों के अलावा और कुछ नहीं जिस पर हम गर्व कर सकें ?
क्या जातीय स्मृति में बचा रहेगा धरती का यही चेहरा
यह किधर ले आए यह कौन सा रस्ता है भाई गाड़ीवान
यह कौन सा स्थापत्य है जो दूरियाँ बढ़ा रहा है

सुना आपके भाई बिरादर भी गाड़ी चलाते हैं राजधानी में
आप कौनों गड़बड़ी तो नाहीं करेंगे भाई गाड़ीवान ?
यह भाड़े का नहीं, भरोसे का सवाल है
ध्यान कीजिए कैसे कैसे छूटी गाड़ी उनके कब्जे से
कभी आपके सपनों में बजता है सुराजियों वाला गाना ?
फाँसी के तख्तों से कौमी तराना

अब, जब निकल आई है गाड़ी हत्या और आत्महत्या के बीच से
दंगों और बँटवारे के बीच से गांधी और नेहरू के बीच से
खड़े खड़े एक ही जगह घुरघुराइए मत
हम सैलानी नहीं हैं जितना हमारी है उतनी ही आपकी भी है गाड़ी

तरह तरह का माल बेचते छोकरे धँसे चले आ रहे हैं
छाती पर सवार हो जाएँगे तो हिस्सा पुर्जा भी हाथ नहीं आएगा

आप कहते हैं तो मानना पड़ेगा कि हम आगे बढ़ रहे हैं
लेकिन कब पहुँचेंगे पता नहीं पहुँचेंगे भी कि नहीं
डर है कहीं कुछ हो गया तो हम पर ही फूटेगा ठीकरा
लोग कहेंगे, सँभाल कर रखने की तमीज नहीं थी

ड्राइवर की सीट पर आपको बिठाया गलती हुई
भरोसा करके ठगे तो नहीं गए भाई ?


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