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कविता

धारी पेंटर
सर्वेंद्र विक्रम


वे भरसक कोशिश करते हैं
दुनिया को कामकाजी निगाह से देखें
जो कुछ जैसा है वैसा ही दिखाएँ
फिर भी चले आते हैं अप्रत्याशित विवरण और चुभते हैं

ग्राहकों के इंतजार में वेश्याएँ और मजदूर

बमों से चिथड़ा बच्चे जले हुए दरवाजे
आदमकद चित्रों में उभर आता है सिर की जगह ढाँचा
(मजाक में या गहरी सूझ में, कौन जाने)
पीछे से हथियार बंद लोगों का अंतहीन सिलसिला
पेंट की हुई होर्डिंग के किसी कोने से
निकल आते हैं घोड़ा टपटपाते चीरते फाड़ते नायक

बचपन के गहरे हरे आलोक में उगने वाली चीजों में दिलचस्पी थी
अँखुए पत्तों शाखाओं और वृक्षों में यकीन था

सोचते हैं, बुरे सपनों सा दौर खत्म हो जाएगा
सरल हो जाएँगी चीजें अंत हो जाएगा दुखों का
तय नहीं कर पाते, क्या करें ? जो हो रहा है होने दें ?
पोस्टर बनाएँ ? जुलूस में पीछे-पीछे जाएँ ?

कोई डिब्बा लुढ़क गया है शायद
फैल गया है फर्श पर दीवारों पर सड़कों पर खूनी लाल रंग
सपने में पास खड़ी एक स्त्री पूछती है, उन्हें कुछ चाहिए ?
निकलती है गों गों, गों गों


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हिंदी समय में सर्वेंद्र विक्रम की रचनाएँ