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कविता

धारी के बच्चे
सर्वेंद्र विक्रम


धारी का परिचय नहीं था परीकथाओं से लेकिन लगे रहे
चित्रों में परीकथाओं सा संदर्भ रचने में
वे बनाना चाहते हैं खूबसूरत चित्रकथाएँ
बच्चों के पास चीजें हों थोड़ी ही सही उनमें हँस सकने भर मजा हो
और कथाओं के घटित होने की संभावना

धारी बच्चों को बनाते हैं
तय नहीं कर पाते कि बनाएँ काले या सफेद
उनके बच्चे वेश्याओं और भिखारियों के साथ
सड़क पर, दुकानों के बाहर बेंच पर औंधे मुँह
चेहरे स्पष्ट नहीं दिखते चित्रों में

चालाकी भरी भाषा से दूर
बच्चे एक साथ रहते दिखते हैं कई दुनियाओं में
और दुनिया सिर्फ दो सिरों पर नहीं थी
बीच में थे और भी रंग और भी छायाएँ

उनके बच्चे हमेशा हड़बड़ी में दिखते हैं
गहरे अँधेरे रंगों में घिरे हुए

वे बचते हैं बच्चों की उपस्थिति में चीजों को धारदार या नुकीला बनाने से
दिखाते हैं गोल और मुलायम आसमान भी थोड़ा सा नर्मदिल
पेड़ों को भी थोड़ा और विनम्र
तब सिर्फ बच्चों का ही ख्याल नहीं रहता (जो खेल-खेल में लड़ते हैं)
बड़ों के बारे में भी कहना मुश्किल है कब क्या कर बैठें
जो भी हाथ लगेगा बना लेंगे हथियार !

वे बनाना चाहते हैं नीले भूरे घुड़सवार
जिनके साथ सैर का मजा ले सकें बच्चे
डर है टापों के नीचे न आ जाएँ

युद्ध में मार न दिए जाएँ

जैसे सब कुछ को घेर लेती है धूल भरी असाधारण चुप्पी
पेड़ों के साथ चुपचाप भीगते रहते हैं अग्निवर्षा में
दिन के अनगिन घावों से रिसता रहता है खून
बच्चों की आँखों में फिर भी झिलमिलाती है दुनिया
धारी का मन होता है उन्हें पकड़ा दें ब्रश जैसा चाहें बनाएँ,
कैनवास पर, कैनवास के बच्चों के काम में
तब दखल की नहीं होगी संभावना !


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