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कविता

धारी की स्त्रियाँ
सर्वेंद्र विक्रम


बनाते हुए आकृतियों में वे भर देते हैं थोड़ी गति आवाजें और रंग
शताब्दियों पुराने हावभाव मुद्राएँ और महीन मजाक

आखेट पर निकले पुरुषों के पीछे
भाषा का आविष्कार करती बहुत कुछ बुनती
कभी ऊब और एकरसता में डूबी

रस्सी पर साइकिल चलाती करतब दिखाती संतुलन साधती
शेर के जबड़ों के बगल मुस्कराती विनम्र नजर आती हैं
कहना मुश्किल है वे स्त्रियाँ घर में हैं या सर्कस में

कैनवास पर धारी कलछुल तवे चिमटे जैसी सुसंस्कृत चीजों को
कुछ ऐसी नजरों से छूते हैं कि वे नजर आने लगती हैं कुछ और
कलछुल नजर आने लगता एक विराट मुग्दर
आततायी का काम तमाम कर देने को तत्पर

दुबली पतली अकालग्रस्त स्त्रियों के बीच वे बनाते हैं
भरी भरी पीन स्तनों विशाल नितंबों वाली स्त्री,
मुकम्मल बयान माने जाने के बजाय
उठा दिया गया श्लील अश्लील का सवाल
वे उसे घाट पर दिखाते हैं भीगी हुई ध्यान में डूबी हुई सी
देना चाहते हैं उसे आध्यात्मिक स्पर्श
प्रामाणिक नहीं मानी गई उनकी स्त्री
प्रतिशत और अनुपात में

पीछे से नहीं झाँकती उनकी औरतें
दिखती हैं खड़ी एकदम सामने मजबूत और कड़ियल
पकी मिट्टी सी नजर आने वाली
कैनवास से उतरकर एकदम से
हाट बाजार खेत खलिहान चली जाने वाली
ईंट गारा ढोने लोहा लंगड़ चूरने

वे स्त्री के पास नहीं गए पुश्तैनी हेकड़ी के साथ,
हिंसक नहीं हो सके बचाए रखी मन में थोड़ी सी करुणा

उनके काम में सीढ़ियों की खास जगह है
चिड़िया की तरह बैठी स्त्री पेंट करने के बाद
धारी खोल देते हैं किसी कोने एकाध खिड़की
शायद मन में रही हो खिड़की दरवाजे भर दिखती
स्वप्न सरीखी स्त्री की दुनिया

धारी की स्त्रियाँ पूछती रहती हैं कुछ न कुछ
लिपियों के जन्म से पहले वाली भाषा में


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