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कविता

हाल-मुकाम
सर्वेंद्र विक्रम


सीमांत पर उनका डेरा पड़ते ही बढ़ जाती है
मुर्गियों और जवान छोकरियों में लोगों की दिलचस्पी
साँपों निर्जीव कठपुतलियों के नाच नटों के कमाल में क्या धरा
वृत्तांतों में चले गए हैं चक्की सिलबट्टा पत्थर तराशने का हुनर

मुगलों के हाथों पतन पर छोड़ दिया उन्होंने चित्तौड़गढ़
शेष रही कुल की कथा भर
आजीवन बनाते रह सकते थे खेती के औजार गड़ुलिया लुहार
लेकिन आत्महत्या कर रह थे किसान पेटेंट की परिधि में बीज
बहुराष्ट्रीय कंपनियों के कब्जे में जाता दिख रहा था पानी

चमड़े की पट्टी के सहारे सारी रात कथा गढ़ते रह सकते थे भोपा
लेकिन दूसरे बहानों बीतने लगी थीं सबकी रातें

जाति से परिभाषित किए गए अपराधी और अपराध उपनिवेश में
इस पृष्ठभूमि से तय हुआ उनका भविष्य गणतंत्र में
उन यायावरों का जिक्र नहीं आया आँकड़ों की भरमार में,
मुकुट के खेल में जीत-हार में

ऐसे लोगों के बारे में कहा जाता था
घूमते फिरते तलाशते रहते हैं अपनी सेवाओं के लिए बाजार

उत्पादन के आधुनिक तरीकों ने बेदखल कर दिया था उन्हें
नहीं मिल रहे थे पारंपरिक हुनर के खरीदार
जैसे खेल ही नहीं जीवन में भी चल रहे हों तनी रस्सी पर
दिखते हैं पीठ पर लादे अपना घर कहीं नहीं के रास्ते पर

टूटा हुआ झुनझुना चिलम के टुकड़े
पतीली से छिटका कोई दाना पकाई हुई मिट्टी का पहिया
जैसे कुछ अवशेष पाए जाएँगे अगली किसी सदी में
पुरातत्वविद आकर बताएँगे
कुछ लोगों के पास नहीं था रहने का कोई मुस्तकिल हाल-मुकाम
नदियों के किनारे आबाद सभ्यता के उस काल में


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