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कविता

कायांतरण
सर्वेंद्र विक्रम


लगता था वे सीधे उठकर आ गए थे अपने लोक से
हल-हेंगा कटिया दँवरी ओसौनी स्थगित कर अवकाश पर हों
थोड़ी देर सुस्ता रहें हों
कार्यक्रम से पहले खैनी बीड़ी करते गमछे से हवा करते

बिना किसी तेज रोशनी मंच-सज्जा और तामझाम के
उठाने लगे धुन, लय-ताल के सुरीले बोल बनाव में
साथियों को ललकारते जोश दिलाते

उनकी किसी भंगिमा पर मुस्करा पड़ते
अपना रचा गाते हुए
लकड़ी लोहे चमड़े झुनझुने जैसी चीज से
ध्वनि की दुनिया रचते चले जाते हैं एक दूसरे लोक में
अजब तरह से हो जाता है उनका कायांतरण

इन सुरों की पगडंडी टेढ़ीमेढ़ी है
इसे उन जैसों ने खुद बनाया है समय की पीठ पर
उनका गाना थोड़ा ऊबड़ खाबड़ सा है उनके हालात की तरह
सुनते हुए डर लगा रहता कि कहीं वे तार पर सुर से गिर न जाएँ
हालाँकि वे जैसे तैसे संतुलन बनाए रख पाते हैं
जैसे जीवन में

भले ही उन पर कुछ लिखा न जाए
प्रस्तुति के ठीक बाद वे आशा तो करते होंगे
उनके काम का ठीक ठीक मूल्यांकन होगा
वे माने जाएँगे कलाकार

हालाँकि उनका न कोई विज्ञापन न प्रायोजक
हमने गुजरते हुए इसे देखा सुना
और हम चाहें तो बिना ताली बजाए बिना कुछ दिए
नजर बचाकर चुपचाप आगे बढ़ जाएँ

और दिल लगाकर की गई एक असाधारण प्रस्तुति को
बदल दें उपेक्षा के अनवरत प्रसंग में


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