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कविता

बाबूलाल प्रेसवाले
सर्वेंद्र विक्रम


पी लेने के बाद खुल जाती हैं उनकी आँखें
कपड़ों की गठरी के बगल चालू हो जाता है विमर्श
कोयलों पर पड़ती रहती है राख

पुराने बुरे दिन फिर से परेशान करने लगेंगे
घरवाली प्रेस करती रहती है
साड़ियों लहँगों से निकल सिलवटें चली जाती हैं
पानी खाए हाथों में माथे में जीवन में रिश्तों में

पर्दे पर देखती है तो लगता है जीवन में कुछ बन नहीं पाई
इसकी वजह उसकी फीकी त्वचा, नाक, टाँगें, छातियाँ और नितंब है
काश कोई होता छूकर उसका भी शेप बदल देता
पैमाइश के पैमानों पर देखे जाने लायक बना देता सेक्सी

चाहती है हाथ की उभरी नसें प्रेस कर
सिलवटें निकाल त्वचा को चिकना बना ले
उससे भी निकलने लगे भाप और ताजेपन की सुगंध
डरती भी है हाथ वैसे हो गए तो खाएगी क्या, खिलाएगी क्या ?

सोचती है प्रेस कर मिटा डाले पेट पर जन्मों के निशान
फिर यह सोचकर बदल जाता है विचार
कि उन तीनों के भी निशान मिट जाएँगे
जो मना नहीं सके अपना पहला जन्मदिन

उसे शंका होती है अपने निश्चय के बारे में
जब उसका शरीर ही उसका नहीं है तो

किसी जतन जीवन से सिलवटें निकाल
ऐसा कर डालने वैसा कर डालने, बड़बड़ाती है, पता नहीं किस पर

अच्छे से प्रेस कर चमकाए हुए अपने सर्वोत्तम पहनावे में
वह निकल पड़ी है सपने में
सारे ऊबड़ खाबड़ को एक विशाल प्रेस से बराबर करती
उपनिवेश से बाहर
महसूस कर रही है उसमें भी है चुनने की क्षमता
अपने निर्णय से गलत साबित कर देगी अपने बारे में धारणाएँ


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