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कविता

आरोप पत्र
सर्वेंद्र विक्रम


यह कि तुम साजिश में शामिल हो
साक्ष्य : तुम सपने में बड़बड़ाते हो
     किसी को पुकारते हो
     तुम्हारे पास से जो नक्शे बरामद हुए हैं
     उनमें गुप्त रास्तों और संकेतों का जिक्र है

यह कि तुम्हें परवाह नहीं है
साक्ष्य : तुमने शहर को विराट शौचालय में बदल दिया है
      चलते हो तो सिर झुकाए हुए
      खाते हो तो सिर झुकाए हुए
      रोते हो तो सिर झुकाए हुए

तुममें धातु की कमी है
साक्ष्य : काटे गए मारे गए जलाए गए
      तुम कभी खड़े नहीं हुए

तुम्हारे अलग विचार हैं
साक्ष्य :   तुम प्रार्थना सभा में शामिल नहीं हुए
          पवित्र जल छिड़का जा रहा था तुम आगे नहीं आए
          सब नाच रहे थे तो घुंघरुओं में एक आवाज कम थी

तुममें पैदाइशी नुक्स है
साक्ष्य :  इतना काम हुआ फिर भी तुम्हारा चेहरा जस का तस!
         मरने के दृश्यों में भी जान नहीं डाल सके शर्म की बात है
तुमने हमेशा निराश किया है
मालिक लोग खुश नहीं हैं


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