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कविता

गाँठ
सर्वेंद्र विक्रम


सब तो चिरकर भठ्ठियों के हवाले हुआ बच गई गाँठ
कुल्हाड़ियाँ बिगाड़ नहीं पाईं कुछ खास

गाँठ में नजर आता रहा
लोककथाओं से चलकर आया हुआ,
ठुड्डी पर दाढ़ी वाला लंबोतरा चेहरा
बताने लगे पुरनियें जोतबहियों के हवाले से
उसका भी नाम दर्ज है खानदान के शजरे में

कैमूर की पहाड़ियों में लेटे हैं सगे संबंधी
खनिजों की तरह निकाले जा रहे हैं बेहिसाब
पाए गए हैं उसके वलय
हू-ब-हू मेल खाते फासिल पार्क के जीवाश्मों में

बारिश का पानी जब इकट्ठा दिखा उसकी नाभि में
बच्चे चिल्लाए, यह तो मुँह है
फिर सिले हुए से क्यों हैं इसके होंठ
बतियाते रहे उससे ऊँची आवाजों में पुकारते रहे
अजब-अजब नामों से उसे
अचरज की हद थी
वह भी हौले से मुस्कराया उनकी तरफ देखकर
जैसे भेद हो कोई बहुत गहरा छिपाया

जब कुहरा गिरा दिनों धूप नहीं दिखी असह हो गई गलन
ताप की जब कहीं से नहीं रही उम्मीद
निरावरण लोग आखिर उठकर उसके पास गए
धुआँ उठा गहरे आलाप की तरह फिर सुलगने लगा चेहरा
दहकने लगा क्रोध में समूचा लाल
डर लगा, इतनी आग !

आरामदेह कोनों से उचककर
सयानों ने सलाह दी दूर दूर रहना जरा बचकर
खतरनाक साबित हो सकती है इतनी आँच ऐसी आग
उसे घेरकर खड़े चेहरों में भर गई आभा
उन कठिन दिनों में भी बना रहा भरोसा
बैठ रहे बदलवन करते हुए किस्से खैनी और फटी बिवाइयाँ
गर्म राख में दबे आलुओं का इंतजार करते हुए
डर नहीं लगा खुले में सुन्न पड़ जाएँगी शिराएँ

कैसे तो जज्ब हुआ अंदर खौलता लावा
उसके जाने के दुख में जैसे स्याह पड़ गई धरती
धीरे धीरे राख हुआ जैसे सब सहज हुआ
वह महानायक नहीं था न कोई आत्मकथा न वसीयत
अलाँ फलाँ जगह छिड़की जाए उसकी राख,
स्त्रियाँ आईं और मुट्ठी मुट्ठी ले गईं
कैसे भी छुटानी थी रगड़ माँजकर कालिख
जलने से बचाने के लिए लगाना था बर्तनों में लेव
उड़ती रही राख जीवन से क्या क्या और कितना बुहारना

फूस और पुआल जैसा भक्क से जल जाने के बजाय
उसका धीरे धीरे सुलगना और लाल होना
अद्भुत है गुणसूत्रों की तरह उसके वंशजों को मिलना


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