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कविता

इतनी सी कथा
सर्वेंद्र विक्रम


वह स्टेशन के बाहर खड़ी थी आधी रात
घर लौटने के इंतजार में
अचानक हवा चली विषैली
लिखा जाने लगा त्रासदी का एक और अध्याय

प्रश्न यह नहीं था कि वह वापस कैसे लौटेगी,
सही सलामत लौटेगी इतिहास को पारकर ?
खुल जाएगा किवाड़ ?
बेचैन दस्तकों और दरवाजा खुलने के युग के बीच
किन सवालों से जूझेगी ?
जो जली सी गंध आएगी
सोचेगी क्षमा और प्रेम और करुणा के बारे में
गुस्से में तोहमतें लगाएँगीं ?

जो कुछ हुआ
वह उसका साक्ष्य है या विषय
इस बारे में पता नहीं धर्मसंसद के निष्कर्ष

पीढ़ियों के सामने
कुल जमा इतनी-सी थी यह कथा :
ईसापूर्व छठी शती के एक भिख्खु,
नवजागरण काल के प्रचारक,
और सफाई अभियान से बच निकले किशोर,
तीनों के सामने सवाल था
ज्ञान के निरीह उजास से बाहर आकर
चुनौती बनने और खड़े होने का


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