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कविता

मेरा भी हाथ है शायद
सर्वेंद्र विक्रम


सगर्भ दिन थे
लिखी जा रही थी तारीख आधी रात
जिम्मेदार लोग
समय की पीठ पर उकेरने में लगे थे
एक विभाजक सुवर्ण रेखा जिसके पार
मौसम हो जाने वाला था एकदम सुहाना

वापस लौटते हुए साहब बहादुर ने
बख्शीश में दिया अपना कोट
अगली पीढ़ियों ने गढ़ी अलबेली कथा कोट की

विरासत में मिला था
रंग रोगन प्रेस पालिश की बदौलत जवान बना रहा
दिलों पर राज करता रहा
उसे चश्में और लाठी की जरूरत नहीं थी
ईश्वर जैसा दमकता गुलाब का फूल खोंसे हाथ हिलाता
सपने दिखाता बच्चों को दुलारता
गुहार में उठे हाथों को बादलों के पास से निहारता
उसने बड़े खेल शुरू किए, खड़े किए नए मॉडल
उसने तानाशाह की चाय का निमंत्रण ठुकराया

परिवार में ही बना रहा कोट
रूप बदलता दिप दिप करता
दिग्गजों को कूड़ेदान के हवाले करता
काली अँधेरी रातों में हँसने रोने बोलने पर पाबंदियाँ लगाता
जादुई नारे गढ़ता इकतरफा खेल को आगे बढ़ाता
लोहे के पंजों पर दस्ताने चढ़ाए जिद पर अड़ा हुआ

जो उसके विरोधी थे
ऐसा नहीं था कि वे जनतंत्र के बड़े पुरोधा थे,
यह बाद में खुलने वाला था अयोध्या और गुजरात में

पथ-संचलन में दल नायकों की बाँह पर फुरफुराता
ढहा देने की कसम खाती भीड़ के आगे आगे
अचूक तैयारी के साथ नारे लगवाता
परिवार के गुपचुप विस्तार के लिए विचार गढ़ता
किताबों में तंत्रमंत्र करवाता भाषा को धर्म पहनाता
मारने वालों का गठबंधन खड़ा करता

लोग तो निहत्थे ताक रहे थे ऐंठकर गिरे
तब पता चला गोलियाँ चल रही हैं,

उसने मृतकों की संख्या में समता की बात उठाई,
समुद्रतट पर छुट्टियाँ मनाते हुए
अनाप शनाप वक्तव्यों में मुस्कराता हुआ
वह लग रहा था राज के दिनों का खांटी कोट

अब जो खेल शुरू हुआ उसमें बाहर होते गए साधारण खिलाड़ी
खबरें छनकर ही सही नीचे पहुँच नहीं रही थीं
ढाँचों के लिए बचे थे आंदोलन
दावे पर दावे थे सब ठीक ठाक हो रहा है सब चमक रहा है
देश की अंटी में डॉलर भरपूर है

कंधों के पीछे से सुनाई देने लगी हँसी
सपनों में भी जैसे निरंतर मोलभाव
हर तरफ उसी का तराना, उसी की भाषा
रंगीन फव्वारों के बगल मिशन की कामयाबी पर खाता खिलाता
बाँहों में बाँहें डाले किसी सुरूर में

कई मौकों पर कोट ने कहा, उसे सुनाई कम देता है
अपनी शिकायत दूसरे ईश्वर के यहाँ दर्ज कराएँ

लिखने वालों ने चाहे जैसा जितना लिखा
वह किसी की व्यथा में शामिल नहीं हुआ
दम तोड़ने वालों के बर्दाश्त की हदें मापता
बैठा रहा परम शांति में निर्विकार

हवा में फिर तरह तरह की अनुगूँजें परम आश्वस्त था कोट
काम में जुटे हुए थे कारिंदे तोड़ फोड़ में माहिर कारीगर
भेड़ों और ऊन कातने बुनने वालों के अलावा
इसमें मेरा भी हाथ है शायद।


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