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कविता

खिड़की
सर्वेंद्र विक्रम


जितनी बार बंद की जाती वे फिर खोल देते
चेतावनियों से बेअसर वे हँसते थे ताल दे
जैसे प्रतिबंधों को धता बता ठेंगा दिखा रहे हों तानाशाह को

डर था बिगड़ जाएगा डिब्बे के अंदर ताप का अनुकूलन
लू के थेपेड़े सोख लेंगे कोमल चेहरों की नमी
उड़ते हुए आ जाएँगे कपास और सरई के फूलों के रेशे
आँख में किरकिरी
पत्तों का खेल बिगाड़ देगी हवा
खिड़की के उस तरफ
नंगे पाँव नंगे सिर पसलियाँ चमकाते लोग
किस ग्रह के प्राणी हैं भला, अंदर घुस आएँगे सब गंदा कर देंगे !

कब से बंद थीं खिड़कियाँ पता ही नहीं था वे वहाँ हैं भी
और उन्हें खोले जाने की जरूरत है
मना करने के बावजूद गनीमत है
बच्चे मान नहीं रहे हैं।


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