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कविता

समझ
सर्वेंद्र विक्रम


कोशिश थी कि जो हैं उससे ज्यादा, या कुछ और दिखें
वह जितना था उससे कुछ कम ही था

उसे विस्तार से पता था दुनिया के महान नाटककार के बारे में
कई विचारक जबानी याद
नायकों प्रतिनायकों के बारे में तो बिना रुके बोल सकता था
लेकिन इस दौरान अपने बारे में शायद सब कुछ भूलता गया
उसे बताया गया, सब कुछ उसकी नाप के हिसाब से है
कम हो रही थी उसके लिए जगह शब्द और भी कई चीजें

कभी कभार धुँधलके में निकलता
दूध पिलाती कुतिया के पास ठिठका रहता :
पहचानता हूँ, पहचानता हूँ माँ

इन दिनों उसकी मुश्किल थोड़ी और बढ़ी हुई थी,
उसे देखा जा सकता था हर वक्त हाथों को धोते, बुदबुदाते
छूटता ही नही, यह किसका रक्त है
तेजी से बदल रही थी भाषा और उसकी भूमिका,
उसके देखते देखते उसकी दुनिया से
रंगों वाले शब्द भागते हुए बगल से गुजरे
सब सभी सबके लिए जैसे सर्वनाम भाषा से ही निकल गए
बातें सिर्फ प्रतिनिधियों के बारे में होतीं

सही गलत के बारे में बिना किसी दावे के
उसने चीजों को नाम देने शुरू किए
मसलन कमीज को कहता कवच और कविता को कोख
किसी तितली को कह देता कंचा,
रोटी को पत्ती कहते हुए उसके हवा में हिलने का इंतजार करता

दुर्घटना, युद्ध और त्रासदी के लिए सिर्फ एक शब्द रखा : तिजारत
लाशों को कहता तमगा और इतिहास को हत्या

कई चीजों की शिनाख्त को लेकर परेशान दिखता,
कहता, कर लूँगा करूँगा करूँगा
और नए नए शब्द निकलते आते, जैसे नंगे पेड़ों पर पत्ते
वह समझता कि वह ठीक वहाँ खड़ा है जहाँ से सब साफ साफ दिखता है,
दिगदिगंत गुँजाती अदृश्य भीड़ की आवाज गौर से सुनने की कोशिश करता

अजब थी उसकी अटपटी बातें
न गद्य में न पद्य में, न लय में न छंद में
फिर कैसे कर पाता था संवाद,
पता नहीं इस संकट के प्रति वह सचेत भी था या नहीं

जो कुछ समझाया जा रहा था, उस पर शक करता
जेब में छिपाए फिरता लोहे की मुंगरी
अछूत शब्दों लुप्त होते बीजों और
सब खुर्द-बुर्द करने वाली हिकमतों की खोज में
भूरे पड़ते दस्तावेजों की नकल पर झुका रहता
चिढ़ाती नजरों, फिकरों और फब्तियों से बेपरवाह

वह समझता है कि लगा है प्रतिसंसार रचने में
और उसके काम में धार है


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