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कविता

वंशावली
सर्वेंद्र विक्रम


उन्हें जो कुछ मिलता स्वीकार कर लेतीं
उन्हें देखकर इत्मीनान हो जाता कि
खुद को या किसी को भी नुकसान नहीं पहुँचाएँगी

उनके प्रति जब कभी प्यार जताया जाता
वे भावुक होकर बस रो पड़तीं
थोड़ी-सी तारीफ या दस की पत्ती के बदले
खुश दिखतीं

कलाई में बाँधे रहतीं एक धागा
जिसका कोई सिरा लटकता रहता
रात और दिन के किसी किस्से में
बीच में जहाँ छोड़ा था
मौका पाते ही वहीं से उठा लेतीं
और एक दूसरे को सुनाने लगतीं

उनकी वंशावली में एक पेड़ भी था
जिस पर सात पीढ़ियाँ ताल में घुसने से पहले
उतार कर रख देतीं अपनी खाल
उनमें से कोई सिरफिरी
कभी औचक पूछ लेती सवाल,
उन खालों को किसी ने जला क्यों नहीं दिया ?
और वे सचमुच जैसी हैं
वैसी की वैसी वापस लौटतीं सबके सामने


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