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कविता

इधर उधर
सर्वेंद्र विक्रम


मोटे तौर पर सब कुछ बँटा हुआ था
घर में दो हिस्से हैं सब पर जाहिर था
मजेदार बात यह थी कि इसमें जो लोग रह रहे थे
घर उनका नहीं था मालिक कोई और लोग थे

उधर साफ सुथरी जगह में थोड़े से लोग थे
इफरात जगह, खाने पीने, पहनने की चीजें
युक्तियाँ, औजार और मशीनें

इधर बहुत लोग, थोड़ी सी चीजें
आमदनी अठन्नी और खर्चा रुपय्या
जो कुछ गड़ा हुआ धन था
उसे खोदते बेचते खाते जाते और
उस तरफ प्यालों से छलकती जिंदगी को बस ताकते रहते
नाराजगी में कभी बम फोड़ देते
गुस्से में तोड़ देते उनकी खिड़कियों के काँच
फोड़ लेते कभी अपना सिर, सब खून खून हो जाता

उधर वाले इधर वालों पर अजब फंदा डालते
फंदे पर फंदा कि दिखकर भी दिखता नहीं था
हर बात के लिये कर्ज, हर तरह का कचरा
उसमें निवाला खोजते बच्चों के चीथड़े
कभी कभी उड़ कर जा गिरते अखबार के पन्नों पर्दों पर
लेकिन तब तक आ जाती लदकर नई खेप

सब जाहिर था लेकिन नजरअंदाज किया जाता
गुहार लगाने वालों की कोई सुनता नहीं था
कि उन्हें कैसे घर की जरूरत है कैसी है संकल्पना

इन सबसे अलग टीले पर बैठे जोड़ घटाना करते कुछ लोग
समय समय पर भविष्यवाणियाँ करते
मसलन इधर-उधर के बीच अंतर कम हो रहा है
बस थोड़ा एडजस्टमेंट की जरूरत है
तब तक कोक पिएँ, पिज्जा बर्गर खाएँ भरोसा रखें

डर था उधर का गुबंद गिरा न दें इधर वाले
तहस नहस न कर डालें उनकी हरियाली,
टीले पर बैठे लोग छेड़ देते अक्सर नई परिचर्चा
भलाई और लोकतंत्र और शांति के बारे में


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