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कविता

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सर्वेंद्र विक्रम


उन्होंने सुना भर था नोआखाली
गांधी, नेहरू, जिन्ना, मगहर और कबीर
पढ़ नहीं सके वह इतिहास फिर भी
समझते थे उनका भी है उसमें साझा

गदर के शायद सौ साल बाद, उस रात
चना-चबेना बांध 'सियाल्दा एक्सप्रेस' के इंतजार में
बरकत अली के लिए रहा हो शायद
विचार से ज्यादा विकल्प का सवाल

बेगानी सी जगह थी कभी कहा नहीं
किस जतन सम्भव किया जीना
भूल गए जँचे हुए जुमले टिकाना
अपने जैसे दिखते हर दूसरे आदमी से
अचानक पूछ बैठते उसका पता ठिकाना

धीरे धीरे समझने लगे थे उधर क्या चल रहा है
ज्यादतियाँ, तोड़फोड़, गोलबंद लोगों की मुहिम और निशाना
हर बार लगता था कि हो गया, चलो खत्म हुआ

लेकिन फिर हो जाता, यहाँ वहाँ होता ही रहता

जानबूझकर किसी टंटे में नहीं पड़े, हद में रहे
अनहोनी के डर से काँपते, दुआ पढ़ते
फकत एक शिकायत है कि भूख मर गई है
अब कुछ अच्छा नहीं लगता,
हर जेरो बम1 से बेजार बुदबुदाते लयबद्ध संगति में हाथ हिलाते
बैठे ताकते रहते हैं मलका का मुजस्समा2,
भिक्षुणियों की नीले पाड़वाली सफेद साड़ी, हाबड़ा पुल
बड़ा होता जाता लोहे का फाटक रोज ब रोज

रहते रहते बोलते बोलते कितने बदल गए हैं वे
देखकर शक नहीं होगा उनकी भासा के बारे में
अचानक चली आती है किसी पत्ती की महक
और चिड़ियों को पुकारने लगते हैं अवधी में

शायद विनम्रता में झुक गए हैं वे
कंधों पर मातम और ताजिये, फगुआ और कबीर
सहजन का फूला हुआ पेड़ जली हुई कुनरू की बेल,
एक बकरी जिसे बच्चों समेत ले गया कोई एक दिन
कौन जाने स्मृतियाँ उन्हें थामे रहती हैं या वह जलमभूमी

मद्धिम पड़ जाती है चीख पुकार
मंद पड़ जाता है दिन, ट्रामें मौन
तमाखू की तरह पीते हैं तब
महुए के पत्ते में सहेज कर लपेटे, सिझाए हुए दुख
पहले ही कश में छा जाती है धुंध, सब खल्त-मल्त3
दिखता नहीं हँसिया सा चाँद, तारों भरा आसमान
करवट बदलते हैं, घूम कर 'फिर सामने आ जाता है
दस्ते शफक़त4 और एक पुराना पोस्काट
कहाँ से चला था धुँधला गए हैं निशान

नींद में खुल जाता है एक पुराना पानदान

काँपती रहती है खैर-अंदेश एक बूढ़ी औरत
      'बेइस्मही सुब्हान अल्लाह
     अज़ीजम बरखुरदार सल्लमहू
     दिली दुआएँ और नेक तमन्नाएँ
     दीगर अहवाल ये है कि ...'

साँस रोके लेटे रहते हैं
गोया हिलने डुलने से बिखर जाएँगे रेज़ा रेज़ा
पता नहीं सजा थी या जज़ा5
न चिट्ठी खत्म होती है न रात
 
1. जेरो बम : उतार-चढ़ाव
2. मुजस्समा : मूर्ति
3. खल्त मल्त : गड्ड मड्ड
4. दस्ते शफकत : वात्सल्य भरा हाथ
5. जज़ा : पुरस्कार


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