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कविता

वे भी
सर्वेंद्र विक्रम


लयताल में छुक छुक थिरकने की बजाय
ताकत का वह पुतला छोटी सी दुनिया समेत
एकदम से गति में बदल रहा था
उसे पकड़ने की कोशिश में भाग रहे थे वे
लोग देख रहे थे वे चढ़ जाएँगे या छूट जाएँगे प्लेटफार्म पर

वह पगड़ी पहनने वालों का वंशज नहीं था
इस भागने में फिसल गया सिर से बिड़वा
पीछे पीछे झोले भर गृहस्थी के साथ वह
मना करने पर भी पीछे मुड़ी उठाने
यह एक अँगोछे भर का मामला नहीं था शायद

संतुलन भी अजब खेल है
लाख जतन के बावजूद बिगड़ा ही रहता है
और उसे बिठाने की जद्दोजहद चलती रहती है

कहना कठिन है, इसकी शुरुआत कब और कहाँ से हुई ?

वहाँ रेल की पटरियों और आबादी के दरमियान
गाड़ी की आहट पर थरथराने लगता एक ताल आधी रात
अँधेरे में दूर से उभरती रोशनी पीढ़ियों पुराना सपना दिखाती
वे भी जा सकते हैं एक दिन उस सुने हुए स्वर्ग
बादलों में सीढ़ी लगाकर
सारी खटर खट्ट खटर खट्ट खिटिर खिट से ऊपर
साथ में एक टुकड़ा खेत आशा निराशा की फसल
थोड़ा सा हरा और थोड़ी सी छाँह
थोड़ी सी नौटंकी और रामलीला
थोड़ा सा ताजिया, कोई धुन, थोड़ा सा ताल

तिल भर जगह में बैठे और बैठने भर जगह में सोए वे
अपनी उन प्रिय ध्वनियों की नकल उतारना चाहते हैं,
सपने में सुनाई नहीं देती आवाज


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