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कविता

हमारा शहर
सर्वेंद्र विक्रम


जब दिल्ली के हालात बिगड़ने शुरू हुए तो
शिल्पियों, कलाकारों और शायरों ने इस शहर का रुख किया
और शहर ने उन्हें पनाह दी शोहरत भी

जब देहातों के हालात बिगड़ने लगे
तब भी इस शहर ने लोगों को आसरा दिया
याचकों को चुनने की स्वतंत्रता नहीं थी

यह उन गिने चुने शहरों में था
जहाँ सन् 47 में बचा रहा जातीय भाईचारा

नवाब के मटियाबुर्ज चले जाने

यानि 1857 के लगभग डेढ़ सौ साल बाद शहर के कई चेहरे दिखाई देते
शहर और देहात, अवधी और उर्दू, रैयत और तालुकदार
शु़द्धि और संगठन, तबलीक और तंजीम,
मर्सिया और कव्वाली, टप्पा और खयाल, वेश्याएँ और दलाल और बीच के लोग

धातु, सीमेंट और पत्थर में बदलता हुआ शहर
सामने से चमचमा रहा था
और पिछवाड़ा उतना ही बजबजाता हुआ
फिर भी लगता कि रहने लायक सिर्फ यही जगह है
यहीं है जिंदगी का असली मजा यहीं है संभावनाएँ
जितने सपने देखने वाले शहर की उतनी ही व्याख्याएँ
स्त्रियों को लगता था उनका भी योगदान है
शहर के अर्थशास्त्र में
लेकिन दिन के अंत में वे बन जाती थी निरी स्त्रियाँ

एक हत्या के बाद शहर की छवि
अचानक जिस तरह टूटी सन् 84 में
तब लगा कि इस जगह को जितना जानता हूँ
उतनी ही अपरिचित है
हम शायद सिर्फ ढोंग ही कर रहे थे कि हम इसे जानते हैं
अलग अलग आदतें अलग अलग विश्वास और आब्सेशन
धमाकों हादसों और मौतों के अलावा जहाँ ज्यादातर
बाहर की दुनिया से अनजान बने रहते हैं हम
उस दुनिया को समझने का दावा नहीं बहाना ही कर सकते थे

काली पड़ती नदी को अब कोई पूछता नहीं मुर्दों के सिवा
अब भी कहीं कहीं दिख जाते हैं घोड़े कबूतर गौरैया और पेड़
शहर की भलाई और कमाई से दूर लाखों लोग
हर रोज पार करना चाहते हैं इसे

कितनी बार रौंदे जाने के बाद भी हर बार
कैसे खड़ा हो जाता है यह शहर
जैसे जिंदगी की बेहद कठिन परिस्थिति में पड़ा हुआ कोई चरित्र हो

जो इस बात को समझना चाह रहा हो
कि मानवीय होने का क्या अर्थ है

यह भी कभी पूरा नहीं होता
और शहरों की ही तरह


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