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कविता

परिचय
सर्वेंद्र विक्रम


हफ्ता भर पहले एक पूजा घर में
वे मिले अब
पेड़ों के नीचे बेंच पर बैठे थे
शायद एक दूसरे को जानने की आशा में

स्त्री जैसे संदेह में डूबी दिखाई देती
बार बार एक ही जगह अटक जाती
अब जीवन का कोई मतलब नहीं रहा जैसा कुछ कहती हुई
वह कह रहा था उस दिन हमले में अपनी लाठी गँवा दी जैसा कुछ

यह कहानी भी हो सकती है,
सब कुछ तेजी से बदल रहा है
इसे किसी तरह स्वीकार करने
लगातार कुछ खोते जाने और उसे खोजने की

शायद कई स्तरों पर चलती होगी यह खोज

उस जर्जर घर में, भूरे बालों वाली एक लड़की
उस दिन आन पड़ी थी जो कुछ समेटे आँधी में अकेले
एक आहट पर ही दरवाजा खोल दिया था उसने
कहाँ होगी

पार्क में इस वक्त बेंच पर बैठी वह स्त्री
उसे खोजने निकल जाती है अक्सर सपनों में
वह कुछ चीजों, घटनाओं का मतलब समझना चाहती है
शायद पाना चाहती है इस तरह अपने आपको

थेाड़ी देर के लिए मान लें कि वे चरित्र हैं
और हम उनकी आँखों से देख रहे हैं
हम उनकी आँखों से जितना देख पाएँ
उससे प्रोत्साहन मिलेगा कि हम उससे कुछ ज्यादा देखें

फिलहाल पेड़ों के नीचे बेंच पर एक दूसरे को जानने की आशा में
दुख मनाने अफसोस करने का समय नहीं है
उनके मन में कोई विचार जन्मा है शायद
जिसे पाल पोस कर अभी आकार देना है


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