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कविता

नुमाइंदे
सर्वेंद्र विक्रम


उनके पास न ढब था न ढंग
और उनमें भी, ज्यादातर औरतें

वे इकट्ठा थे उनमें पीड़ा थी गुस्सा था
ले ली गई थीं उनकी जमीनें
धकेल कर किनारे कर दिया गया था उन्हें
एकदम जीवन से बाहर

एक अत्यंत प्राचीन कही जाने वाली सभ्यता
जिसके अपने बीज बचा कर रखे स्त्रियों ने,
अगली ऋतुओं में बोए जाने के लिए
ताकि अपना बोया उगाया खा सकें अपने
बची रह सके अपनी प्रतिरोध क्षमता
नई नई बीमारियों से लड़ने की ताकत

बदले जा रहे थे नियम कानून बदल रहा था चलन
देश कंपनियों जैसी हरकतें कर रहे थे
कोशिशें चल रही थी बीजों पर कब्जा जमाने की
लगभग तय हो गया था, मसौदे लिखे जा रहे थे
जो नहीं चुका पाएगा बीजों का दाम
उसे कीमत अदा करनी होगी देकर अपनी जान

जिंदा रहने के लिए खाना भी जरूरी था
और खाने के लिए उगाना और उगाने के लिए बीज,
वे इस सबसे निरंतर जूझ रहे थे
उन्हें हक था पर सुना नहीं गया
उन पर बरसने लगीं गोलियाँ

फैसला लेने वालों की क्या मजबूरी थी
अपनी बात कहने आए निहत्थे अपने लोगों को
इस तरह मार रहे थे,

पता नहीं कौन से बीज बोए गए थे
कि ऐसा काटना पड़ रहा था ।
नुमाइंदे पता नहीं किसकी तरफ थे
 


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