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कविता

गजलें
वसीम बरेलवी


 

1.   लहू न हो तो क़लम तरजुमा नहीं होता

2.  मिली हवाओं में उड़ने की वो सज़ा यारो

3.  ज़रा सा क़तरा कहीं आज गर उभरता है

4.  कौन-सी बात कहाँ, कैसे कही जाती है

5.  अपने चेहरे से जो ज़ाहिर है छुपायें कैसे

6.  अपने हर लफ़्ज़ का ख़ुद आईना हो जाऊँगा

7.  उसूलों पे जहाँ आँच आये टकराना जरूरी है

8.  कही सुनी पे बहुत एतबार करने लगे


लहू न हो तो क़लम तरजुमाँ नहीं होता

लहू न हो तो क़लम तरजुमाँ नहीं होता
हमारे दौर में आँसू   ज़ुबाँ नहीं   होता

जहाँ  रहेगा  वहीं  रौशनी    लुटायेगा
किसी चराग़ का अपना मकाँ नहीं होता

ये किस मक़ाम पे लाई है मेरी तनहाई
के मुझ से आज कोई बदगुमाँ नहीं होता

मैं उसको भूल गया हूँ ये कौन मानेगा
किसी चराग़ के बस में धुआँ नहीं होता

'वसीम' सदियों की आँखों से देखिए मुझ को
वो लफ़्ज़ हूँ जो कभी  दास्ताँ नहीं होता

 

मिली हवाओं में उड़ने की वो सज़ा यारो

मिली हवाओं में उड़ने की वो सज़ा यारो
के मैं ज़मीन के रिश्तों से कट गया यारो

वो बेख़याल मुसाफ़िर मैं रास्ता यारो
कहाँ था बस में मेरे उसको रोकना यारो

मेरे  क़लम  पे ज़माने  की  गर्द ऐसी थी
के अपने बारे में कुछ भी न लिख सका यारो

तमाम  शहर  ही  जिसकी तलाश में गुम था
मैं उसके  घर  का  पता किससे पूछता यारो

 

ज़रा सा क़तरा कहीं आज गर उभरता है

ज़रा सा क़तरा कहीं आज गर उभरता है
समन्दरों ही के लहजे में बात करता है

ख़ुली छतों के दिये कब के बुझ गये होते
कोई तो है जो हवाओं के पर कतरता है

शराफ़तों की यहाँ कोई अहमियत ही नहीं
किसी का कुछ न बिगाड़ो तो कौन डरता है

ज़मीं की कैसी विक़ालत हो फिर नहीं चलती
जब आसमां  से  कोई  फ़ैसला उतरता है

तुम आ गये हो तो फिर चाँदनी सी बातें हों
ज़मीं पे चाँद  कहाँ रोज़ रोज़ उतरता है

 

कौन-सी बात कहाँ, कैसे कही जाती है

कौन-सी बात कहाँ, कैसे कही जाती है
ये सलीक़ा हो तो हर बात सुनी जाती है

जैसा चाहा था तुझे, देख न पाए दुनिया
दिल में बस एक ये हसरत ही रही जाती है

एक बिगड़ी हुई औलाद भला क्या जाने
कैसे माँ-बाप के होंठों से हँसी जाती है

कर्ज़ का बोझ उठाए हुए चलने का अज़ाब
जैसे सर पर कोई दीवार गिरी जाती है

अपनी पहचान मिटा देना हो जैसे सब कुछ
जो नदी है वो समंदर से मिली जाती है

पूछना है तो ग़ज़ल वालों से पूछो जाकर
कैसे हर  बात  सलीक़े से कही जाती है

 

अपने चेहरे से जो ज़ाहिर है छुपायें कैसे

अपने चेहरे से जो ज़ाहिर है छुपायें कैसे
तेरी मर्ज़ी के मुताबिक नज़र आयें कैसे

घर सजाने का तस्सवुर तो बहुत बाद का है
पहले ये तय हो कि इस घर को बचायें कैसे

क़हक़हा  आँख  का  बरताव बदल देता है
हँसनेवाले  तुझे  आँसू  नज़र  आयें कैसे

कोई अपनी ही नज़र से तो हमें देखेगा
एक क़तरे को समन्दर नज़र आये कैसे

 

अपने हर लफ़्ज़ का ख़ुद आईना हो जाऊँगा

अपने हर लफ़्ज़ का ख़ुद आईना हो जाऊँगा
उसको छोटा कह के मैं कैसे बड़ा हो जाऊँगा

तुम गिराने में लगे थे तुमने सोचा भी नहीं
मैं गिरा तो मसअला बनकर खड़ा हो जाऊँगा

मुझको चलने दो अकेला है अभी मेरा सफ़र
रास्ता रोका गया तो क़ाफ़िला हो जाऊँगा

सारी दुनिया की नज़र में है मेरी अह्द-ए-वफ़ा
इक तेरे कहने से क्या मैं बेवफ़ा हो जाऊँगा

 

उसूलों पे जहाँ आँच आये टकराना जरूरी है

उसूलों पे जहाँ आँच आये टकराना ज़रूरी है
जो ज़िन्दा हों तो फिर ज़िन्दा नज़र आना ज़रूरी है

नई उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाये
कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है

थके हारे परिन्दे जब बसेरे के लिये लौटें
सलीक़ामन्द शाख़ों का लचक जाना ज़रूरी है

बहुत बेबाक आँखों में त'अल्लुक़ टिक नहीं पाता
मुहब्बत में कशिश रखने को शर्माना ज़रूरी है

सलीक़ा ही नहीं शायद उसे महसूस करने का
जो कहता है ख़ुदा है तो नज़र आना ज़रूरी है

मेरे होंठों पे अपनी प्यास रख दो और फिर सोचो
कि इसके बाद भी दुनिया में कुछ पाना ज़रूरी है

 

कही सुनी पे बहुत एतबार करने लगे

कही-सुनी पे बहुत एतबार करने लगे
मेरे ही लोग मुझे संगसार करने लगे

पुराने लोगों के दिल भी हैं ख़ुशबुओं की तरह
ज़रा किसी से मिले, एतबार करने लगे

नए ज़माने से आँखें नहीं मिला पाये
तो लोग गुज़रे ज़माने से प्यार करने लगे

कोई इशारा, दिलासा न कोई वादा मगर
जब आई शाम तेरा इंतज़ार करने लगे

हमारी सादामिजाज़ी की दाद दे कि तुझे
बगैर परखे तेरा एतबार करने लगे

 


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हिंदी समय में वसीम बरेलवी की रचनाएँ