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कविता

सुब्हे - फ़र्दा
सरदार जाफ़री


सुब्हे -फ़र्दा

(1)

इसी सरहद पे कल डूबा था सूरज होके दो टुकड़े
इसी सरहद पे कल ज़ख़्मी हुई थी सुब्हे-आज़ादी
यह सरहद ख़ून की, अश्कों की, आहों की, शरारों की
जहां बोई थी नफ़रत और तलवारें उगाई थीं
यहां महबूब आंखों के सितारे झिलमिलाये थे
यहां माशूक़ चेहरे आंसुओं से तिलमिलाये थे

यहाँ बेटों से मां, प्यारी बहन भाई से बिछड़ी थी
यह सरहद जो लहू पीती है और शोले उगलती है
हमारी ख़ाक के सीने पे नागन बन के चलती है
सजा कर जंग के हथियार मैदां में निकलती है
मैं इस सरहद पे कब से मुन्तज़िर हूं सुब्‍हे-फ़र्दा का

 

(2)

यह सरहद फूल की, ख़ूशबू की, रंगों की, बहारों की
धनक की तरह हंसती, नदियों की तरह बल खाती
वतन के आरिज़ों पर ज़ुल्फ़ के मानिन्द लहराती
महकती, जगमगाती, इक दुल्हन की मांग की सूरत
कि जो बालों को दो हिस्सों में तो तक़्सीम करती है
मगर सिंदूर की तलवार से, सन्दल की उंगली से

यह सरहद दिलबरों की, आशिकों की, बेक़रारों की
यह सरहद दोस्‍तों की, भाइयों की, ग़मग़ुसारों की ‍
सहर को आये ख़ुर्शीदे-दरख़्शां पासबां बनकर
निगहबानी हो शब को आस्मां के चांद तारों की
ज़मीं पामाल हो जाये भरे खेतों की यूरिश से
सिपाहे हमलावर हों दरख़्तों की क़तारों की
ख़ुदा महफ़ूज़ रक्खे ग़ैरों की निगाहों से
पड़ें नज़रें न इस पर ख़ूं के ताज़िर ताजदारों की
क़ुचल दें इसको फ़ौलादी क़दम भारी मशीनों के
करे यलग़ार इस पर ज़र्बे-कारी दस्त कारों की
उड़ें चिंगारियों के फूल पत्थर के कलेजे से
झुके तेग़ों की महराबों में गर्दन कोहसारों की
लबों की प्यास ढाले अपने साक़ी अपने पैमाने
चमक उठें मसर्रत से निगाहें सोगवारों की
महब्बत हुक्मिरां हो, हुस्ने क़ातिल, दिल मसीहा हो

चमन में आग बरसे शोला पैकर गुल अज़ारों के
वह दिन आये कि आंसू होके नफ़रत दिल से बह जाये
वह दिन आये यह सरहद बोसा-ए-लब बनके रह जाये

 

(3)

यह सरहद मनचलों की, दिलजलों की, जांनिसारों की
यह सरहद सरज़मीने-दिल के बांके शहसवारों की
यह सरहद कजकुलाहों की, यह सरहद कजअदाओं की
यह सरहद गुलशने-लाहौरो-दिल्ली की हवाओं की
यह सरहद अम्नो-आज़ादी के दिल अफ़रोज़ ख़्वाबों की
यह सरहद डूबते तारों, उभरते आफ़्ताबों की
यह सरहद ख़ूं में लिथड़े प्यार के ज़ख़्मी गुलाबों की
मैं इस सरहद पे कब से मुन्तज़िर हूं सुब्हे -फ़र्दा का

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1.हमला

2.फौजें

3.हमला

4.भारी चोटें

5.तिरछी टोपी वाले

 


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