डाउनलोड मुद्रण

अ+   अ-

आलोचना

वे मारे गए पर हत्यारा कोई नहीं
पंकज पराशर


अरुण कमल की कविताओं पर कुछ नोट्स

महाप्राण निराला ने लिखा है - 'मरा हूँ हजार मरण / पाई तब चरण-शरण'। मनुष्य एक बार पैदा होता है और एक ही बार मरता है, लेकिन इस कविता में निराला हजार मरण की बात करते हैं! एक सच्चा और बड़ा कवि अपनी हर नई रचना के साथ एक नया जन्म लेता है, स्वयं को नए सिरे से बनाता है, काटता-छाँटता है और आत्मसंघर्ष की आग में अपनी रचनात्मकता को निरंतर माँजता है। सुप्रसिद्ध कवि अरुण कमल की सन् 1998 के बाद प्रकाशित हुई कविताओं को गौर से देखें, तो हजार मरण की तरह अपनी हर कविता में वे बिल्कुल नए और अलग अरुण कमल नजर आते हैं, जिनकी पिछली कविताओं के स्वर, तेवर और ट्रेंड से उनकी अगली कविताओं का मिलान नहीं किया जा सकता। जिनकी किसी एक कविता के सिग्नेचर ट्यून से दूसरी कविता को नहीं मिलाया जा सकता! मरा हूँ हजार मरण की तरह इधर प्रकाशित अपनी हर कविता में अरुण कमल बिल्कुल नए तेवर और नए स्वर में अपनी बात कहते हुए नजर आते हैं।

आज जहाँ एक तरफ समाज में घोर आत्मकेंद्रीयता बढ़ती जा रही है, कवि एक अनिवार्य प्रतिपक्षी की भूमिका में सबकी ओर से बोलने को अपना कर्तव्य समझता है। अरुण कमल की कविता को पढ़ते हुए यह स्पष्ट तौर पर जाहिर होता है कि जिसकी ओर से कोई नहीं बोलेगा, उसकी ओर से और कोई बोले या न बोले, कवि बोलेगा। जिसके साथ खड़े होने की हिम्मत कोई नहीं करेगा, उसके साथ कवि खड़ा होगा। इस विश्वास को पुख्ता करती है 'शुक्रवार' की साहित्य वार्षिकी (2014) में प्रकाशित अरुण कमल की नई कविता 'कविता-2013'। इस कविता को पढ़कर पहले मैं थोड़ा हैरान हुआ और सोचा कि क्या ये वही अरुण कमल हैं जिनका नाम आते ही जहन में एक बार को उनकी यह काव्य-पंक्ति 'अपना क्या है इस जीवन में सब कुछ लिया उधार / सारा लोहा उन लोगों का अपनी केवल धार' जरूर कौंधती है? गहरे संतोष और प्रसन्नता की बात यह है कि इस कविता में उन्होंने अपने को तकरीबन आमूल-चूल परिवर्तित किया है। उनके सात्विक आक्रोश और मुखरता को देखकर यह विश्वास और पुख्ता होता है कि इतिहास में वही कविता अपनी सार्थकता प्रमाणित करने में सफल होती है, जो अनिवार्य रूप से सत्ता के प्रतिपक्ष में होती है।

उदारीकरण के बाद की हिंदी कविता को देखें तो यह देखकर थोड़ी निराशा होती है कि नई पीढ़ी के कवियों में वैचारिक आग्रह की कमी के साथ-साथ अपने समय की समस्याओं की पहचान के मामले में भी एक प्रकार की अस्पष्टता दृष्टिगोचर होती है। मार्मिकता के धरातल पर भी नए कवियों की रचनाएँ हृदय को आलोड़ित कर पाने में उतनी सक्षम नहीं लगतीं, जबकि इसके उलट अस्सी-नब्बे के दशक में आए कवियों ने अपनी रचनाओं से हिंदी कविता की विश्वसनीयता और तेवर के प्रति क्षरित होते हुए विश्वास को परिपुष्ट किया है। इस कविता में अरुण कमल जहाँ एक ओर समाज की मरती हुई संवेदना और न्याय के तमाशे को बेनकाब करते हैं, वहीं अपनी जन पक्षधरता, जन संबद्धता और मुखर प्रतिरोधी तेवर के कारण कविता की भूमि और भूमिका को लेकर भी आश्वस्त करते हैं। समकालीन हिंदी कविता में सक्रिय युवा कवियों की कविताओं को देखें तो किसी पक्ष के बारे में कुछ पता नहीं चलता।

***

'कविता-2013' में अरुण कमल कहते हैं -

              वे मारे गए / कहीं कोई खून नहीं
              वे मारे गए / कहीं कोई चिह्न नहीं
              वे मारे गए पर कोई हत्यारा नहीं।

हत्यारे एक-एक कर छूट गए। न्याय व्यवस्था की धीमी प्रक्रिया में हत्या के निशान मिटते गए और अनेक लोगों के नरमेध की स्मृतियाँ भी धुँधली पड़ती गईं और अंत में जब 'न्याय' मिला तो पता चला हत्यारा कोई नहीं! यह चीज हल्लाकू मीडिया और चालाक सरकारों को भले परेशान न करे, लेकिन एक कवि को परेशान करती है। परिस्थिति चाहे कैसी भी हो, संसार सो जाता है परंतु कवि नहीं सो पाता। संसार तो सुखिया है, वह खा-पीकर सो जाता है, लेकिन एक कवि की नियति है दुखिया होना - जागना और रोना। सत्ता के अहंकार और अत्याचार के भय से और लोग भले चुप रह जाएँ, कवि नहीं चुप रह सकता - बशर्ते कि वह सही मायने में कवि हो। कोई कवि केवल अपना प्रवक्ता नहीं होता, वैसे तो वह किसी का भी प्रवक्ता नहीं होता, लेकिन उसमें समस्त जन एवं समस्त जीव लोक एवं ब्रह्मांड अपने लिए स्थान पा लेते हैं - अरुण कमल की पिछले दशक में प्रकाशित कविताएँ इस बात की तस्दीक करती हैं। अन्याय और अनाचार को संसार भले चुपचाप देख ले, कवि नहीं देख सकता -

       उन्हें घरों से खींचा गया खेतों से खदेड़ा गया
           उन्हें नींद में मारा गया
           एक बस्ती बसी थी उजड़े मजदूरों से
           वो गाँव फिर से उजाड़ा गया
           बची रह गईं धुएँ से स्याह ईंटें कुछ पुआल कुछ खूँटें
           पर एक बूँद खून नहीं

इस दृश्य को तत्कालीन सत्ता ने देखा, लोकतंत्र के प्रहरियों और पूरी दुनिया ने देखा, लेकिन विडंबना देखिए कि इन हत्याओं का कोई हत्यारा सिद्ध नहीं हुआ! आज जन-स्मृतियों में भी उन अभागों की स्मृतियाँ धुँधली पड़ गई हैं, लेकिन कवि के मस्तिष्क में उस अन्याय की छवि उसी प्रकार खचित है। उसके दिमाग में उस लोमहर्षक घटना की याद उसी तरह ताजा हैं, इसलिए एक सच्चे कवि की नियति ही है दुखिया दास कबीर की तरह जागना और रोना! अपनी 'सेवक' कविता में वे उसी जगने और रोने की नियति के स्वीकार के बारे में कहते हैं -

   पता नहीं कितनी हजार रातों से जग रहा हूँ
       जरा और मरण के इतने पास
       एक बार तो एक आदमी ने मुझे ऐसे जकड़ लिया था जैसे
       वह डूब रहा हो और मुझे भी खींच लेगा भँवर में।

(मैं वो शंख महाशंख, पृ. 17)

तमाम तकलीफ़ों और समस्याओं का हल कवि के पास नहीं होता, लेकिन डूबते को जैसे तिनके का सहारा भी बड़ा सहारा लगता है, उसी तरह वह आदमी कवि को जकड़ लेता है - बकौल कवि जैसे वह डूब रहा हो।

   धीरे-धीरे ऐसा समय आता है
       जब सारे रास्ते पानी में डूब जाते हैं
       जब तुम्हारा सोचा कुछ नहीं होता
       बस अंधड़ होता है।'

(वही)

 

तब कवि के लिए एक ही कोठरी बचती है पूरे शहर में और वह भी श्मशान के पास। जहाँ कितनी हजार रातों से जगा हुआ कवि जो जरा-मरण को बेहद करीब से देखकर दुखिया दास कबीर की तरह जागने और रोने के लिए लगभग अभिशप्त है।

***

बिहार में सामाजिक न्याय की सरकारों के जमाने में जातिवाद के जहर, सामंती मानसिकता के लोगों को प्राप्त राजनीतिक संरक्षण और न्याय के तमाशों के बीच हुए नरसंहारों में सालों बाद भी कातिलों का कुछ न बिगड़ा। गरीब, मजलूम लोग आधी रात की नींद में गाजर-मूली की तरह बाल-बच्चों समेत काट दिए गए, उनके घर जला दिए गए। कुछ दिनों तक उनकी मौत अखबारों की सुर्खियाँ जरूर बनीं, लेकिन सत्ता की शैली और कारकर्दगी पर इस चीज का कोई फर्क नहीं पड़ा। उनके परिजन अदालतों, मुंसिफों और वकीलों के चक्कर लगाते रहे और अंत में न्याय-क्रीड़ा का नतीजा यह निकला कि हत्यारा कोई नहीं साबित हुआ! इससे भी दुखद यह है कि आज के समय में सच को सच और झूठ को झूठ कहने का चलन लगातार कम होता जा रहा है। अस्पष्टता और ढुलमुलपन संक्रामक रोग की तरह समाज में फैलता चला जा रहा है। साफ और स्पष्ट कहने से कन्नी काटने की प्रवृत्ति समाज में बढ़ती जा रही है। इसलिए यह अकारण नहीं है कि प्रोफेसर मैनेजर पांडेय कहते हैं, 'सुविधा में जीने वाले ही दुविधा की भाषा बोलते हैं।' हाथ उठा रहे और काँख भी ढँका रहे में सुविधा यह रहती है कि समय और अवसर देखकर अपने अधउठे हाथ की लाभानुकूलित व्याख्या की जा सकती है। जिसका नतीजा आज यह है कि अराजक और असामाजिक तत्वों के हौसले बुलंद हैं और सज्जनों की दुर्गति हो रही है। अरुण कमल कहते हैं -

'अगर केवल सब लोग थूक देते एक साथ
    तो गुंडा वहीं डूब जाता
    यही तो कहते रहे कवि मान बहादुर जीवन भर
    पर कितना कम थूक है अब इस देश के कंठ में।'

(मैं वो शंख महाशंख, पृ.53)

***

'कविता-2013' बिहार में घटित नरसंहार पर आए फैसले से शुरू अवश्य होती है, लेकिन इसकी स्थानीयता आगे चलकर वैश्विकता में परिवर्तित हो जाती है। एक सवाल से फिर अनेक और दूसरे सवाल खड़े हो जाते हैं -|

       'जो तुम्हारे लिए धरती माता है
       वह उसके लिए सोना है यूरेनियम
       वे इस तरह उठाते हैं हमें जैसे
       कूड़ागाड़ी उठाती है कचरा
       और उस गड्ढे में फेंकते हैं जहाँ
       बनेगा देश का सबसे बड़ा मॉल।'

आज के विकास का पैमाना हो गया है - मॉल, बड़ी-बड़ी आलीशान इमारतें, विशेष आर्थिक क्षेत्र इत्यादि। यही है विकास और यही है विकसित होने का पैमाना। इसके विरोध में जो कोई बोलता है, विरोध करता है वह विकास विरोधी है। निवर्तमान अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमले के बाद कहा था कि जो हमारे साथ नहीं है वह हमारा विरोधी है। अब यह भाषा तीसरी दुनिया के मुल्कों की राजनीति में भी आम हो गई है - जो लोग मॉल संस्कृति के विरोध में हैं, वे विकास के विरोधी हैं। इसी कविता में दूसरे स्थान पर अरुण कमल कहते हैं -

         'जहाँ आदमी फेंक दिया जाता है रात के जूठन की तरह
         जहाँ बिक रही है स्वर्णरेखा जहाँ बिक रहा सुमेरु
         जहाँ बिक रहे तीर्थों के जल और दर्शन की पंक्तियाँ।'

निजी और बहुराष्ट्रीय कंपनियों की हर सुख-सुविधा का ख्याल रखने वाली सरकारों की नजर में आम लोगों की हैसियत 'रात के जूठन' से अधिक नहीं है। जबकि पूँजीपतियों के लिए प्रकृति के हर अंग की सौदेबाजी की जा रही है। नदी, पहाड़, खदान, समुद्र सारी चीजें पूँजीपतियों के दोहन के लिए सेंत-मेंत में दिया जा रहा है। सरकारें जिस तरह विरोधियों को ताकत के दम पर दमित करती है, विकास के मार्ग में विरोधी होने पर विस्थापित करती हैं, उसकी वजह से लोगों में आक्रोश बढ़ता जा रहा है। तभी तो कवि आक्रोशित होकर प्रश्न करते हैं -

'पूछो उनसे जो हाथ में झाड़ू लिए घूम रहे हैं राजपथों पर
     पूछो - पूँजीवाद से बड़ा कूड़ा और क्या है माँ-पृथ्वी पर
     दुनिया को साफ करने के लिए एक मेहतर नहीं
     हाथ चाहिए करोड़ों-करोड़।'

इन स्थितियों के लिए निश्चित रूप से पूँजीवाद जिम्मेदार है, लेकिन आज पूँजीवाद के पास जितनी शक्ति और जितनी सत्ताओं (राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और धार्मिक सत्ता) पर इसकी पकड़ है उसके कारण खुली हुई मुट्ठी की तरह बिखरे करोड़ों-करोड़ मेहतर भी इसे बुहारकर नहीं फेंक सकते। क्रांति मध्यवर्ग के सहयोग के बिना संभव नहीं है और वर्तमान में भारत का मध्यवर्ग निजी स्वार्थों और लाभ-लोभ में इस कदर उलझा हुआ है कि उससे किसी तरह के क्रांति में सहयोग या शामिल होने की उम्मीद करना फिलहाल बेमानी है। निम्न आयवर्ग के श्रमिक वर्ग के लोगों की संख्या अधिक होने के बावजूद वे बिखरे हुए हैं - काम-धंधों को बंद करके वे बहुत दिनों तक जीवित नहीं रह सकते। इसलिए करोड़ो-करोड़ हाथ होने के बाद भी पूँजीवाद रूपी कचरे को बुहारकर फेंक पाना फिलहाल एक रोमानी खयाल-भर है! पर कवि के पास एक यूटोपिया तो है, बेहतर और सुंदर का स्वप्न तो है!

***

इधर की कविताओं में जैसे पक्षधरता और वैचारिक आग्रहशीलता में कमी आई है, उसी तरह प्रश्नपरक प्रवृत्ति में भी कमी आई है। हालाँकि सत्ता को कभी प्रश्नपरकता पसंद नहीं रही, लेकिन कवियों ने प्रश्न खड़े करके हमेशा सत्ता के समक्ष एक प्रकार की असुविधाजनक स्थिति पैदा की। आजकल की कविताओं से जिस तरह प्रश्नपरकता गायब हो रही है, उससे सत्ता के लिए सहजता बढ़ी है और कवियों के लिए अलंकृत होने और सत्ता से 'खिलअत' प्राप्त करने के अवसरों में भी अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। यह अकारण नहीं है कि पिछले वर्षों में जिस अनुपात में हिंदी कविता की विश्वसनीयता निरंतर क्षरित हुई है, उसी अनुपात में पुरस्कारों और सम्मानों की संख्या में अभिवृद्धि हुई है। कविता हाशिए पर धकेली जा रही हैं और कवि केंद्र में आते जा रहे हैं। सब कुछ को पाने और सबको साधने की कलाबाजी के कारण वर्तमान कविता से मार्मिकता गायब होती जा रही है और कृत्रिम बौद्धिकता के दबाव और अतिशय गद्यात्मकता के कारण अपठनीयता भी बढ़ती जा रही है। इस परिदृश्य समानांतर अरुण कमल अपनी कविताओं में नए समय की चुनौतियों को लेकर न केवल नए-नए सवाल खड़े करते हैं, बल्कि 'पुराना सवाल' उठाने से भी गुरेज नहीं करते -

    'इस तरह एक-एक करके घर उजड़े गाँव उजड़े
        और नगर महानगर बने
        पर कोई नहीं बोलता ऐसा हुआ क्यों
        अब कोई नहीं पूछता यह दुनिया ऐसी क्यों है
        बेबस कंगालों और बर्बर अमीरों में बँटी हुई।'

(मैं वो शंख महाशंख, पृ.56)

एक तरफ जहाँ चुनी हुई चुप्पी ओढ़े लोग हैं, वहीं दूसरी तरफ अरुण कमल की तीव्र मुखरता देखिए -

'नहीं यह चुप बैठने का समय नहीं
     सँभालो अपने टूटे बिखरे औजार
     हमारे हथियार कमजोर हैं पर पक्ष मजबूत
     चारों तरफ से फिर उठ रही है वो पुकार
     नए कंठों से
     नहीं आत्महत्या नहीं ओ विदर्भ तेलंगाना के किसानो
     उठो और छुरी की धार को उलट दो
     धर्मों जातियों बोलियों में बँटे लोगो
     देखो कि सबके कपड़े फटे हैं
     सब बेकार बेहाल हैं
     सबके घाव हैं गहरे।'

(वही, पृ.57)

इन चुनी हुई चुप्पी के उलट कवि की यह मुखरता वैचारिकता और जन संबद्धता के कारण संभव होती है। ऐसा नहीं है कि अन्याय और अनाचार के विरुद्ध कवि को हरदम चीखना-चिल्लाना ही अच्छा लगता है और अमन-चैन से रहना उसके स्वभाव में नहीं है। वे तो बकायदा 'संधि-पत्र' पेश करते हुए कहते हैं कि यदि तुम दमन और अत्याचार बंद कर दो मैं भी चुप्पी के संधि-पत्र पर हस्ताक्षर करने को तैयार हूँ -

'वे चाहते हैं मैं होंठ सी कर रहूँ
    पर दहलता है मेरा दिल भुनता है कलेजा
    काँपती है आत्मा, जली खाल उतरी देह सी -
    तुम्हारी साँस भी मुझे दुख देती है।
    तुम भी रोको आक्रमण, मैं भी चुप हो जाऊँगा
    यह रहा संधि-पत्र।'

(वही, पृ.74)

***

बहुराष्ट्रीय ब्रिटिश तेल कंपनी 'शेल' का विरोध करने पर नाईजीरिया की तत्कालीन सनि अबाचा सरकार ने किस तरह वहाँ के क्रांतिकारी कवि केन सारो वीवा को दुनिया भर के विरोध के बावजूद फाँसी के फंदे पर लटकाया था, यह हमें मालूम है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों के एजेंट की तरह काम करने वाली असभ्य और बर्बर सरकारों की ऐसी करतूतों से अरुण कमल भी भली-भाँति वाकिफ हैं। वे दमन की इस संस्कृति और आज की सभ्यता की सचाई से वाकिफ हैं -

'हर बार इस सभ्यता को चाहिए नए खून की खुराक
    खाली हो रहे हैं जंगल के जंगल
    हर शहर हर बस्ती के पास एक शरणार्थी शिविर
   आज पूस की रात वह ठंड से काँप रही है
   अपनी देह की अंतिम ताप से बच्चे को सेंकती
   जिसने देह पर झेले अस्सी वार
   वह ताप रहा है बुझता है अलाव।'

पूँजीवादी सभ्यता का विकास हमेशा खून, दमन और आमजन के विस्थापन से होता है। जिस तरह नाईजीरिया की सरकार ने बहुराष्ट्रीय कंपनी के लिए अपने ही नागरिकों के कत्ले-आम से गुरेज नहीं किया, उसी तरह तीसरी दुनिया के देशों की सरकारें भी अपने नागरिकों पर गोली चलाने, जेल में बंद करने और सदियों से बसे गाँवों को विस्थापित करने में जरा भी नहीं हिचकती है। देश में एक तरफ तो मॉलों और अट्टालिकाओं की बहार है, तो दूसरी ओर इन चमक-दमक के पीछे विशाल शरणार्थी शिविर में बदलते जा रहे देश का भयावह यथार्थ भी है।

धार्मिक दंगों की भेंट चढ़ चुके लोगों के परिजन ही शिविरों में नहीं रह रहे हैं, विशाल बांधों, खदानों, कंपनियों आदि के लिए अपनी जमीन, जल और गाँव-घर गँवा चुके लोग भी एक शिविर के ही वासी हैं। जिनकी कहीं कोई सुनवाई नहीं है, जिनके लिए कहीं कोई न्याय-व्यवस्था नहीं है। पलायन सिर्फ देहात से ही नहीं हो रहा है, जंगल से भी हो रहा है और शहर एक विशाल झोपड़-पट्टी और शरणार्थी शिविर में तब्दील होते जा रहे हैं। विकास के नारों और पैमानों में इनके वास्तविक विकास और समायोजन के लिए कोई योजना, कोई स्थान और कोई संवेदना नहीं है। इसलिए वे नगर-नगर और डगर-डगर असहाय, लाचार घूम रहे हैं। पूँजीपतियों लिए बड़ी-बड़ी अदालतें हैं, बड़े वकीलों को देने के लिए पैसे हैं, लेकिन गरीब और बेघर लोगों के पास किसी को देने के लिए कुछ नहीं है -

'जो खुद उपवास पर है वह दूसरों को अन्न क्या देगा
    और यह सारी लड़ाई अन्न की लड़ाई थी
   यह लड़ाई थी धान के खेतों और बालियों की लड़ाई
   भरे थे अन्न से कोठार गोदाम और मंडियाँ
  और भूखे थे जन।'

भूखे और परेशान लोगों को संयम और लोकतंत्र का पाठ पढ़ाकर सरकारें चाहती हैं कि वह हमारी हर आज्ञा को शिरोधार्य करे, हुक्म-उदूली न करे - लेकिन जब असमानता अपने चरम पर पहुँच जाती है तो फिर तमाम बंधन धरे के धरे रह जाते हैं। गरीबों और मजलूमों के शोषण और दमन को देखकर कभी अल्लामा इकबाल तक को आक्रोशित होकर कहना पड़ा था - 'जिस खेत से दहकां को मयस्सर न हो रोज़ी / उस खेत के हर खोशा-ए-गंदुम को जला दो।'

***

आजादी के बाद लागू हुए जिस तंत्र को आज 'लोकतंत्र' कहा जा रहा है, उसमें गरीबों को कहीं न्याय नहीं मिल रहा, उसकी आकुल पुकार की कहीं कोई सुनवाई नहीं हो रही। आज एक स्थान पर जो गरीबों के दमन की गाथा है, वह संसार भर के गरीबों और मजलूमों के दमन की सचाई बन गई है। कोर्ट-कचहरी में न्याय के लिए भटकते लोगों में न्याय की आस छीजती जाती है और मन के भीतर निराशा और अवसाद घर करता जाता है। बरसों-बरस तक लोग अदालतों के चक्कर काटते रहते हैं, जवानी से बुढ़ापा आ जाता तब जाकर कहीं फैसले की बारी आती है। और फैसला भी कैसा कि सामूहिक नरमेधों का कोई कातिल नहीं, कोई हत्यारा नहीं! अदालतों में मुकदमों की भीड़ बढ़ती जा रही है और न्यायाधीशों को ग्रीष्मावकाश और शीतावकाश के अतिरिक्त और तरह-तरह के अवकाश चाहिए। इन स्थितियों को देखकर कवि के मन में जो आक्रोश फूटता है वह देखिए -

'फैसला सुनाते-सुनाते उठता है न्यायाधीश
    यह उसके लंच का वक्त है
    उसे अपनी रखैल से मिलना है
    छह बजकर दस मिनट पर
    जल्दी करो जल्दी नहीं है कोई भी गवाह
    जल्द नहीं है कोई भी सबूत।'

अदालतों का अपना तरीका है, अपनी पद्धति है। वह तथ्यों और साक्ष्यों के मद्देनजर फैसला सुनाती है, परिस्थितियों और संवेदना के आधार पर फैसले नहीं होते। यह चीजें और ढर्रा एक कवि को परेशान करती है और उसका आक्रोश फूट पड़ता है। इसलिए अरुण कमल साफ शब्दों में विरोध की वर्ग-चेतना को भी रेखांकित करने ने नहीं चूकते -

'बोलना आसान है देवयानी के पक्ष में
     इस गरीब के पक्ष में तो बोलकर देखो
     बोलना आसान है ओबामा के खिलाफ
    इस जमींदार ठेकेदार इजारेदार के खिलाफ
    जबान तो खोलो'।

लोग बातें तो बहुत बड़ी-बड़ी और क्रांतिकारी करते हैं, मीडिया में भी बड़े-बड़े लोगों के खिलाफ खबरें दिखाकर क्रांतिकारिता पेश की जाती हैं, लेकिन बात जब जमीनी संघर्ष की आती है तो लोग बगलें झाँकने लगते हैं। इसमें तत्काल पिट जाने, अपमानित होने और हार जाने का साक्षात भय सामने होता है, इसलिए ऐसे शत्रु के विरुद्ध संघर्ष करने की बात की जाती है जो सामने नहीं होता। लेकिन अरुण कमल साफ शब्दों में कहते हैं -

   'हम हारने से नहीं डरते
       डरते हैं चुप बैठने से
       जरूरी है लड़ना और खड़े रहना दूब-सा जैसे क्यूबा
      पूछो बहुराष्ट्रीय कंपनियों से पूछो
      कहाँ है पृथ्वी पर वह देश
      जहाँ एक भी विज्ञापन नहीं धरती-आकाश के बीच
      जहाँ आदमी बस इस तरह रहता है जैसे अपने घर में।'

भारतीय मध्यवर्ग की चिंता संघर्ष की राह में हार का भय और असीम भोगाकांक्षा में खलल भले हो, लेकिन कवि संघर्ष में हार से नहीं डरते। असली चिंता है लोग हार के भय से संघर्ष नहीं करते, अन्याय और अनाचार के विरुद्ध आवाज बुलंद करने से बचते हैं। इसलिए कवि साफ-साफ कहते हैं कि हम चुप बैठने से डरते हैं। यह एक वास्तविक तथ्य है कि आज दुनिया में शायद कोई भी ऐसा देश नहीं होगा जो विज्ञापनरहित देश हो! आलम यह है कि इन कंपनियों के विज्ञापन से पट चुकी पृथ्वी इन बहुराष्ट्रीय कंपनियों के विशाल चरागाह में बदल चुकी है।

***

अरुण कमल ने इधर कुछ शहरों के लेकर भी बेहद मार्मिक और उम्दा कविताएँ लिखी हैं, जिसे ठीक से लक्षित किया जाना चाहिए। बिहार के शहर 'गया' बारे में वे लिखते हैं -

'रैयतों के पसीने से सनी हैं शाम की सराय की सड़कें
     दूर विशाल तालाब में पानी अंतिम ज्योति आँख की
     इतने तर्पण के बाद कौन पितर हैं वे जो तृप्त नहीं
     वे कौन से पितर जो उलट उलट लौटते हैं
     इसी धधकती धरा पर
     ढूँढ़ते अपना पिंड चूल्हों की राख में।'

(मैं वो शंख महाशंख, पृ.28)

अपने पितरों, पूर्वजों के लिए स्वर्गाकांक्षी परिजन इस शहर में उन्हें पिंडदान देते हैं, तर्पण करते हैं - जिस गया में अपने पितरों को पिंडदान करने की साध लिए 'गोदान' का होरी भी मर गया। बिहार के अन्य भागों के मुकाबले गया में बहुत अधिक गर्मी पड़ती है, पानी का अभाव रहता है। उस धधकती धरा गया में ऐसा क्या है कि तमाम पितर यहीं अपना पिंड लेने आते हैं? एक चीज और ध्यान देने लायक है कि अरुण कमल की इधर की कविताओं में सुनसान सड़क, सन्नाटा, अकेलापन, उदासी आदि की मौजूदगी तकरीबन हर कविता में दिखाई देती है। वर्तमान समाज तकनीकी रूप से तो पहले की तुलना में अधिक जुड़ा हुआ है, लेकिन आत्मिक रूप से लोगों के बीच वह जुड़ाव अब नहीं रहा। दूसरी बात, सत्ता का अनिवार्य प्रतिपक्षी होने के कारण भी अकेले पड़ जाने के लिए भी कवि अभिशप्त है।

'गया' कविता में वे कहते हैं-'सुनसान लंबी सड़क पर अकेला चला जा रहा एक बच्चा/ और उसे घेरती हैं प्रेतात्माएँ हजारों साल पुरानी जर्जर।'(वही) सुनसान लंबी सड़क का चित्र मन में एक उदासी और दुःख का भाव पैदा करता है। वहीं दूसरी ओर जर्जर प्रेतात्माओं का एक बच्चे को घेरना अंततः उसी अन्याय की तरफ इशारा करता है, जो लोग असमय ही मर गए - अन्नाभाव में या इलाज के बिना धनाभाव में। या किसी बर्बर और अमानवीय सामंती हथियारबंद गिरोहों के हाथों मारे गए। इस कविता में हजारों साल पुरानी प्रेतात्माओं का जिक्र हजारों साल से चली आ रही शोषण-उत्पीड़न और दमन की उस व्यवस्था की ओर इशारा करता है, जहाँ हजारों साल से भटकती हुई अतृप्त और दमित प्रेतात्माएँ अकेले जा रहे बच्चे को घेरती हैं। इसी तरह 'मोतिहारी' कविता में भी एक उदासी तारी रहती है -

        'एक शहर जो रहस्य है अंतहीन
           अधूरी पढ़ी एक किताब जहाँ एक पन्ने पर
           तुमने रखी थी कभी एक सींक
          फिर कभी लौटोगे वहाँ वैसी ही किसी शाम?'

(वही, पृ.29)

एक शहर से पलायन के बाद उसकी याद एक टीस की तरह उठती है, लेकिन यह शहर है जो कि अंतरहीन रहस्य में रूपांतरित हो चुका है। प्रश्न यह है कि यह रहस्य क्या है जहाँ किसी 'वैसी ही शाम' को लौटने के बारे में प्रश्न किया गया है? यह 'वैसी ही शाम' यादों की उस श्रृंखला की ओर इशारा है, जिसके पीछे अनेक कहानियाँ हैं और जो कविता में याद-सी आ के रह गई हैं!

***

अरुण कमल की इधर कविताएँ इस बात का साक्ष्य हैं कि कविता की भूमिका और सार्थकता को लेकर उनके भीतर आत्मसंघर्ष बेहद तीव्र हुआ है। वे लगातार अपनी कविताओं की जमीन बदल रहे हैं, शैली और शिल्प में तोड़-फोड़ करते हुए एक मूर्ति गढ़ते हैं, फिर उसे ढहा देते हैं। अपनी रचना को लेकर एक असंतोष, एक तनाव और विशाल नक्कारखाने में अपनी आवाज को तूती की आवाज में रूपांतरित होते जाने के कारण उनके मन में सत्ताओं और व्यवस्था के प्रति आक्रोश बढ़ता जा रहा है। जिस उम्र में 'जनता का आदमी' कविता के नाम पर महज कलाबाजियाँ कर रहा है, उस उम्र में अरुण कमल अपने स्वर और तेवर के कारण कविता की सार्थकता को लेकर हिंदी काव्य-परिदृश्य में आश्वस्ति का भाव पैदा करते हैं। उन्हें आचार्यों और सभासदों की नजर में 'अभागा' कहलाना मंजूर है, मगर कविता का अवमूल्यन नहीं -

'क्या करता वहाँ जाकर उन आचार्यों सभासदों के बीच

जिनके लिए काव्य बस डकार है अफारे की।'

(मैं वो शंख महाशंख, पृ.106)।

जिनकी नजर में कविता की वकत महज अफारे की डकार जितनी हो, वहाँ जाकर कविता अवमूल्यन और अपना अपमान भला किस कवि को ग्राह्य होगा! इत्यलम्।


End Text   End Text    End Text

हिंदी समय में पंकज पराशर की रचनाएँ