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यात्रावृत्त

पुरु की बगिया
स्वप्निल श्रीवास्तव


मेरे गाँव के ठीक पूरब दिशा में आम का बाग था, बाग में आम, महुया और जामुन के पेड़ थे। यह बाग में घर के सामने था। सुबह उठने के साथ बाग दिखाई देता था। परिंदों की आवाजे साफ सुनाई पड़ती थी। इन्‍हीं पेड़ों के झुरमुट से हम दिन का उगना देखते थे। सूर्य की रोशनी से पेड़ नहा उठते थ। यह दृश्‍य मेरी याद में ज्‍यों की त्‍यों दजै है। इस बाग के पेड़ इतने घने थे कि दिन में भी अंधेरा छाया रहता था। कालांतर में हम पूरब की बगिया को पुय की बगिया के नाम से पुकारने लगे।

हलवाहे सूरज डूबने के पहले इस बगिया को लाँघ जाते थे। देर होने पर दो तीन आदमी साथ जाते थे। किसी की अकेले जाने की हिम्‍मत नहीं होती थी। कुछ लोग बताते थे - इस बाग में शैतान रहते हैं जो लोगों को लपटिया जाते थे। लोग अंड-बंड अभुआते रहते थे। फिर सोखा आते थे। तमाम तरह की तांत्रिक क्रियायों के बाद ठीक होते थे। एक बार इस बाग में एक शैतान जाग गया था। वह लोगों को परेशान करने लगा।

एक बार मेरा हलवाहा शाम होने के बाद अपने गाँव लौट रहा था। उसने फराकत के पहले खैनी बनाई, जेसे खाने चला, शैतान ने उसे उठा कर पटक दिया और नकियाते हुए बोला - सारे अकेले सुर्ती खईबे हम्‍मे नाही देबे...

रामायन हलवाहा वही से सुअर की तरह चिल्‍लाने लगा - ए बाबू बचावा हम मरि गयली...।

साँझ के सन्‍नाटे में उसकी आवाज गाँव तक सुनाई देने लगी। गाँव में गोहार लगाई गई। लोग लाठी डंडा लेकर बाग की तरफ दौड़ पडे। रामायन बाग में बैल की तरह डकर रहा था। उसके मुह से फेन निकल रहा था। पोखरे से पानी लाकर उसके मुँह पर छीटा गया। तब वह जाकर होश में आया। बाग में अंधेरा छा गया था। फिर लुक्‍काड़ा जलाया गया। आसपास के गाँव के लोग जुट चुके थे। लोगों ने पूछा क्‍या हुआ था। पूरी कथा बताने में उसकी जुबान लड़बड़ा रही थी। उसने टुकड़े-टुकड़े में पूरी दास्‍ता बताई। वह काफी डरा हुआ था जैसे उसने अपना काल देख लिया हो।

दूसरे दिन पंचायत बुलाई गई और यह फैसला लिया गया कि सोखा बुलाकर इस शैतान को बाग से बाहर किया जाए। अगर कोई कदम नहीं उठाया गया तो गाँव-गिराँव वालो का जीना हराम हो जाएगा। रामायन बुखार में पड़ गया था। रात में उठकर वह बड़बड़ाता था। उसके घरवाले परेशान थे।

सोखा आए। उन्‍होंने शैतान को रामायन के सिर पर बुलाया और कहा... क्‍यों तुमने रामायन को पकड़ा? न से जवाब दिया... यह अकेले-अकेले सुर्ती खा रहा था।

फिर तुम कैसे रामायन का पिंड छोड़ते।

शैतान ने कहा मुझे एक छगड़ी (बकरी) और महुआ की शराब चाहिए तभी मैं इसके सिर से जाऊँगा।

शैतान ने यह शर्त भी रखी थी कि जब कोइ्र इस बाग सुर्ती बनाते हुए गुजरे तो एक बीरा (खुराक) सुर्ती गिरा दे।

शैतान की शर्त मान ली गई। रामायन धीरे-धीरे ठीक होने लगे।

हम लोग उसे घेर कर शैतान वाली कथा सुनते थे जिसे वे नमक-मिर्च लगाकर सुनाया करता था।

पूरु की बगिया में असंख्‍य चिड़ियाँ थी। वे सब अलग-अलग ढंग से गायन करती थी। उनके सारे सुरों को यदि एक में मिला दिया जाए तो बड़ी-बड़ी सुर लहरियाँ मात हो जाए। कोयला, बुलबुल, तोते, किलहट, पुदुखी, कठफोरनी, टिटिहरी और हारिल जैसी चिड़ियायों का यहाँ बसेरा था। वे शुबह शाम गाती थी और दोपहर में आराम करती थी। इन्‍ही परिंदों और पूरु के बगिया में मेरा बचपन गुजरा था।

बसंत और ग्रीष्‍म की लंबी दोपहरी वाले दिन मेरे जीवन के अविस्‍मणीय दिन थे। हम गर्मी से बचने के लिए बाग की शरण लेते थे। बचपन के खेल खेलते थे। हमने मित्रों को चुनाव जाति धर्म के आधार पर नहीं अपने पसंद के किया था।

बसंत में महुए के फूल खिलते थे। पूरा बाग खूशबू से भर जाता था। यह गंध सीवान को लाँघ जाती थी। महुसे फूल का आकार टाप्‍स की तरह होता था। बहुत सी लड़कियाँ उसे अपने कानों में फूल को जेवर की तरह पहनकर इठलाती थी। हम लोग डाँका (टोकरी) लेकर इन फूलों को बीनने आए थे। आने में जरा सी देर होने पर ये फूल लोग चुरा ले जाते थे।

बाग के थोड़ा आगे एक छोटा सा जंगल था जहाँ खरहे लोमड़ियाँ नेवले और गिलहरियाँ रहती थी। झुरमुट में चिड़ियाँ के घोसले थे। उसमें उनके बच्‍चे चहचहाते थे। उनके ठोढ लाल और पीले होते थे। वे अपने पंख फरुराते रहते थे जैसे कि उड़ना चाह रहे हो। इस जंगल में सैकड़ों रंग की तितिलियाँ थी। हम तितिलियों के पीछे अनवरत भागते रहते थे लेकिन वें पकड़ में नहीं आती थी। आज भी तितिलियों के पीछे भागने की आदत गई नहीं। जंगल की बीच एक महुया का विशाल वृक्ष था। इसके खोडर में तोते अपना घोसला बनाते थे। उनके घोसले तक पहुँचना आसान काम नहीं था। लेकिन पेड़चढवे (पेड़ पर चढ़ने वाले) आते थे और खोते से तोते के बच्‍चों को निकाल कर ले जाते थे। गाँव के लोग तोतो को पालते थे। उन्‍हें राम राम बोलना सिखाते थे।

इस जंगल के पास एक छोटा सा तालाब था। यहाँ हम नहाया करते थे। गर्मी के मोसम में घड़ियाल की तरह पानी में रेगते रहते थे। यहाँ सरपत का बड़ा जंगल था। असलिए वयाँ के बहुत सारे घोसले थे। उनकी बुनावट देखते बनती थी। इतना गझिन घोसला तो आदमी न‍हीं बुन सकता। तेज हवा में पेड़ की डालें गिर जाती थी लेकिन इन घोसलों पर कोई असर नहीं होता था। वे हवा में झुलते रहते थे। वयाँ पक्षियों का किलोल देखते ही बनता था। ये पक्षी मेंटिग सीजन में अपने जोड़े बनाते है। नर पक्षी मादा को लेभाने के लिए घोसला बनाता है। मादा को जब घोसला पसंद आता है वे घोसले में अपना परिवार बसाते हैं। अगर पसंद नहीं आया तो मादा उस घोसले में रहने से मना कर देती है। बयाँ पक्षियों के कालोनी में ऐसे कई घोंसले दिखाई देते है।

पक्षियों के बार में बहुत सी जानकारी दादी और माँ से मिलती थी। माँ बताती थी कि पक्षी मनुष्‍यों से ज्‍यादा समझदार होते है। तुम उनके लिए घोसला बना दो वे उसमें नहीं रहेगे। वे अपने बुने हुए घर में रहते है। आदमी दूसरे के बनाए हुए घर को हड़पता रहता है।

जब आमों के बौर आते थे। हम भी बौरा जाते थे। थोड़ी सी हवा बहती गंध का समुंदर लहराने लगता था। पेड़ों से बौर झर जाते थे। जो बौर बच जाते थे उसमें से टिकोरे निकलते थे। उनकी रखवाली के लिए हम बाग में झोपड़िया डाल देते थे। हमें प्रकृति से ज्‍यादा खतरा चोरों से था। वे आम के बड़ा होने का इंतजार नहीं करते थे। गांवों में ऐसे लोगों की टोली थी जो इस काम में लगे रहते थे। ये नराधम किस्‍म के लोग थे। कई बार पकड़े जाने पर मार खाते थे लेकिन अपनी अपनी आदत से बाज नहीं आते थे। इन दिनों पेड़ हमारे घर बन जाते थे। पेड़ पर हम ओल्‍हा पाती का खेल खेलते थे पेड़ों की डालियों पर दूर तक चढ़ते थे।

कुल मिलाकर हमारा काम आमों का बचाना था। इसके लिए देर रात तक जगना पड़ता था।

बारिश के बाद आम तेजी से पकने लगते थे। जरा सी हवा चलती वे भद्द-भद्द गिरने लगते थे। हम टोकरी लेकर उन्‍हें इकट्ठा करते थे। चोर रात में आम को चुराने का काम करते थे। उनसे बहुत चौकन्‍ना रहना पड़ता था। आम के दिनों में हम लोगों का मुख्‍य आहार आम होता था। आम के तमाम तरह के व्यंजन बनते थे। आम की खटाई सुखाई जाती थी। अमावट डाले जाते थे। पाहुन को स्‍वागत में आम पेश किए जाते थे। पूरा गाँव आम की गंध में सराबोर रहता था।

जैसे लोगों के नाम होते थे ठीक उसी तरह आम के पेड़ों के नाम होते थे। जैसे मिटऊवा, मलदहवा, नारंगिया, खटलुसवाँ। इन आमों के आकार और स्‍वाद अलग अलग होते थे। अब तो बाजार में एक ही तरह के आम होते है। उनके स्‍वाद में ज्‍यादा अंतर नहीं होता है। हमारे बाग में एक मिठऊवाँ नाम का आम का पेड़ था। उसका कच्‍चा आम इतना मीठा होता था कि उसे तोते चट कर जाते थे। हम लोगों को उसका कच्‍चा आम पसंद था। वह आम पकने तक नही बचता था। बचे हुए आम जब पकते थे, उसमें कीड़े जम जाते थे।

जैसे जैसे पेड़ो से आम कम होने लगते थे। हमारी उदासी बढने लगती थी। हमें सकूल का चेहरा दिखाई देने लगता था। हम अच्‍छी खबरों की दुनिया से एक अनचाही दुनिया में दाखिल होने जा रहे होते थे। जिंदगी का मौसम एक तरह से नही चलता। उसमें परिवर्तन होता रहता है। जीवन में हमेशा बसंत नही रहता पतझड़ भी आते है। अगर हमें उत्‍सव पसंद है तो हमे उत्‍सव के बाद अवसाद के लिए तैयार रहना चाहिए। हमें हर चीज की कीमत अदा करनी पड़ती है। इसमे जीने की कीमत शामिल है। अच्‍छे मौसम के लिए लंबा इंतजार करना पड़ता है।

धीरे धीरे आम के पेड़ों से आम कम होते जा रहे थे। बारिश के बाद पेड़ों पर लगे हुए आमों का पकना शुरू हो गया और 15 दिन के भीतर वे पेड़ों से गायब हो चुके थे। हमारी झोपड़ियों का उड़ना शुरू हो गया था। इसके साथ हमारे खेल लापता हो रहे थे। हम गहरी उदासी के चपेट में थे। हमारे पास अच्‍छे दिनों की यादें थी जिसे हम परेशान होने पर दोहराते थे।

पुरू की बगिया का यह स्‍वर्ण-काल होता था। बाकी दिनों चहल पहल रहती थी लेकिन इतनी जीवंतता नहीं होती थी। हाँ जाड़े के शुरू में वहाँ अपने उेरे के साथ बंजारे आ जाते थे। वे माह भर टिकते थे। उनके साथ उनके शिकारी कुत्‍ते होते थे। उनकी स्त्रियाँ बहुत खूबसूरत होती थी। उनकी लड़कियों की सौंदर्य की चर्चा दूर दूर तक होती थी। उनकी काया बहुत मजबूत होती थी। इसलिए उनसे प्रेम करना बहुत मुश्किल काम होता था। वे आक्रामक और जुझारू प्रकृति के होते है। वे किसी से नहीं डरते। वे आसपास के गाँवों में अपने खेल दिखाते थे। उनके कंठ सुरीले होते थे। गए रात वे लोकगीत गाते थे। लगता था कोई गंधर्व गा रहा हो। गीत गायन में उनकी स्त्रियाँ पारंगत होती थी। लोग उन्‍हें मांगलिक अवसर पर बुलाते थे। उन्‍हें बकायदा नेग देते थे। उनके हलके बटे हुए रहते थे। वे एक जगह टिकते (रूकते) नहीं थे। उनका झोला-डंडा तैयार रहता था।

वे सर्वभक्षी होते थे। सियार, लोमड़ी बन विलाव आदि खा जाते थे। इस काम में उनके शिकारी कुत्‍ते भरपूर मदद करते थे।

मेरे घर के पास कठंबास का घना जंगल था। उसमें लोमड़ियाँ और बनविलाव रहते थे। बंजारे भाले और शिकारी कुत्‍तों के साथ आते और भाले को कठबांस में घसाते। उसमें से बनविलाव भागते। कुत्‍ते उनका पीछा करते और उन्‍हे चीथ डालते। इस खेल में उनके कुत्‍ते अनुभवी हो चुके थे। शाम को उनके बटुले में गोश्‍त पकता। उसकी उत्‍तेजक गंध चारो ओर ब्‍याप्‍त हो जाती थी। बंजारे गोश्‍त खाने के पहले महुए की शराब पीते और मगन हो कर नाचते-गोते। हमे उनके इस मस्‍ती भरे जीवन को देखकर रश्‍क होता था। लेकिन हम अपनी-अपनी सीमाओं में कैद थे। यह सीमाएँ हमारी बनाई हुई थी। जिसका अतिक्रमण करने का साहस हमारे पास नहीं था।

गाँव के बड़े लोग बंजारों के डेरे के पास नही जाते थे। उनके साथ अछूतों जैसा व्‍यवहार करते थे। उन्‍हे वे सभ्‍य नहीं जंगली मानते थे। बंजारे अपनी परंपराओं में अडिग थे। यदि किसी ने उनकी लड़कियों से ईश्‍क लड़ाने की जुर्रत की तो शादी करना लाजीम हो जाता था। अन्‍यथा वे मरने-मारने पर उतारू हो जाते थे।

हम सब बच्‍चे इन सब रीतियों-कुरीतियों से दूर थे। सुबह से शाम तक उनके डेरे के पास मँडराते रहते थे। उनके मुर्गो की कूढूकू सुनते। खरगोशों को टहलते हए देखते। इसी तरह उनके कुत्‍ते के कौतुक अलग होते थे। उनके शिकारी आँखों में हिंसा तैरती रहती थी।

बंजारों के बच्‍चे हिरन-शावकों की तरह कुलाँचे भरते थे। हमारे बचपन इतने स्‍वछंद नही थे।

गाँव में अक्‍सर जाता हूँ। वहाँ मेरी नाँल गड़ी हुई है। किसी समय वहाँ भरा-पूरा संयुक्‍त परिवार था। खलिहान अनाज से भर जाते थे। खूब लोकगीत गाए जाते थे। किसी लड़की की शादी में पूरा गाँव ऊन आता था। लोगों में खूब भाई-चारा था। एक दूसरे के सुख-दुख के साथी थे। लेकिन मेरे देखते-देखते सब कुछ उजड़ता चला गया। जिस पुरू की बगिया में कोई शैतान नही रहता। सोखा की कोई जरूरत नहीं है। बचे हुए आम के पेड़ों में बौर नहीं आते उनके रखवाली के लिए झोपड़ियों की कोई जरूरत नहीं है। बंजारे न जाने कहाँ चले है। कोई कहता है कि बंजारों के लड़को ने अपना परंपरागत जीवन त्‍याग दिया है। कितना अजब है कि हमें अपने जीवन का शोकगीत लिखना पड़ रहा है। जब भी गाँव जाता हूँ एक विकट यातना से गुजरता हूँ। इस यातना में मेरी स्‍मृतियाँ छिपी हुई है इसलिए इनसे गुजरने के बाद मुझे जिस सुख की अनुभूति होती है, वह मेरे मूलधन का ब्याज है।


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हिंदी समय में स्वप्निल श्रीवास्तव की रचनाएँ