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कविता

एकालाप
आत्माराम शर्मा


ज़िंदा है अभी
शरीर के भीतर
एक और शरीर
जो रोकता है
टोकता है

कटु-वचन बोलकर
भर उठता
ग्लानि से

अपकर्म करके
करता है

पश्चाताप

पर-दुख-कातरता
अब भी है
शेष

मेरे-तेरे का भेद
नहीं है
स्वीकार

हालाँकि
उसका जीवन
कम है
निराश मत होओ
क्योंकि
मृत्यु-शैय्या पर
पड़ा रोगी
अभी मरा नहीं है
और आशा की डोर
अभी टूटी नहीं है


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