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विमर्श

हिंदी उपन्यास की अल्पता पर कुछ ऊहापोह
मदन सोनी


क्या हमारे पास साहित्य की कोई ऐसी 'विधा' है जिसके माध्यम से हम 'आधुनिक' भारतीय मनुष्य की अवस्था को, समूची जटिलता, संश्लिष्टि और रंगतों में, सम्यक और मूर्त ढंग से अनुभव कर सकें जिसके माध्यम से हम 'आधुनिक' भारतीय मनुष्य की अस्तित्वपरक अवस्थिति का, अपने और अपने से इतर सत्ताओं के साथ उसके रिश्तों का, उसकी जीवनदृष्टि और विश्वदृष्टि का पता पा सकें ऐसी विधा जो इतिहास, प्रकृति या स्वयं इस मनुष्य द्वारा निर्मित परिस्थितियों और आकस्मिक संयोगों के बीच, जीवन के रणस्थल के ठीक बीचोंबीच, इस मनुष्य की साँसत या धर्मसंकट का, उसकी दुविधाओं, अंतर्विरोधों और विरोधाभासों का, संकेत दे सकती हो जिसके भीतर हम इस मनुष्य के चेतन और अवचेतन मानस तथा उसके दुर्निवार सांसारिक आकर्षणों और नैतिक अंतश्चेतना के बीच के द्वन्द्वों का, उसके संकल्पों और कृत्यों के बीच की दूरी का, उसकी सामर्थ्य और लाचारियों का, उसकी अनंत संभावनाओं और विफलताओं का, उसकी सत्यनिष्ठता, प्रेम और करुणा का, उसके झूठ, घृणा और हिंसा का, उसकी न्यायप्रियता और उसके अन्याय का, उसकी अकिंचनता और दंभ का जायजा ले सकें ऐसी विधा जिसमें यह सब सूक्ष्म विवरणों से भरी एक ऐसी विश्वसनीय जीवन-लीला में चरितार्थ हो जो सिर्फ हमारी तर्कबुद्धि को नहीं बल्कि उससे पहले हमारे ऐंद्रिक संवेदनों को स्पर्श करती हो ऐसी विधा जो, इस सब के साथ, इस मनुष्य की आत्मकल्पना की सामर्थ्य का भी परिचय देती हो

ये सारी अपेक्षाएँ अपनी समग्रता में जिस एक विधा की ओर इशारा करती हैं वह, जाहिर है, उपन्यास है। कम से कम पश्चिमी संस्कृति के भीतर तो निश्चय ही इन सवालों का एकमात्र तत्काल और सकारात्मक जवाब उपन्यास ही होगा। और यह जवाब वहाँ न सिर्फ पिछले कम से कम दो सौ वर्षों से निरंतर कायम है बल्कि वह अपनी अद्वितीयता में उत्तरोत्तर दृढ़ और पैना होता गया है। उपन्यास, साहित्य की एक विधा है लेकिन पश्चिम की संस्कृति के साथ उसके तादात्म्य का अहसास पश्चिम के मानस में कितना गहरा है, इसे हम वहाँ के एक लेखक (ई.एम. सिओरन) के उस रूपकात्मक कथन में लक्ष्य कर सकते हैं जहाँ वह यूरोपीय समाज को ''उपन्यास का समाज'' और यूरोपीय मनुष्य को ''उपन्यास की संतान'' कहता है (मिलान कुंदेरा द्वारा टेस्टामेंट बिट्रेड में उद्धरित)। पश्चिम के आधुनिक मानस के बारे में हमें जो अंतर्दृष्टि उसके चिंतकों के माध्यम से मिलती है वह निश्चय ही असाधारण है, लेकिन इससे कहीं अधिक असाधारण इस मानस के साथ हमारा वह बौद्धिक और संवेदनात्मक तादात्म्य है जो हमें पश्चिम का उपन्यास उपलब्ध कराता है। इसकी वजह निश्चय ही यह नहीं कि इस मानस में चिंतकों के मुकाबले उपन्यासकारों की पैठ अधिक है, वजह शायद दोनों की विधाओं के स्वभाव और सामर्थ्य के फर्क में है - उस जीवन-लीला का रिप्ले, जाहिर है, उपन्यास के विन्यास में ही संभव था जिसमें यह मानस अपनी तद्रूपता में और अपनी चरम संभावनाओं के साथ प्रगट हो सकता था; जिसमें यह मानस स्वयं उस दार्शनिक विमर्श में शिरकत कर सकता था जिसका वह, अन्यथा, महज एक विषय बनकर रह जा सकता था।

पश्चिम की आधुनिक सभ्यता के साथ उपन्यास का यह संबंध आकस्मिक नहीं है; उसमें एक सहज अनिवार्यता है। वह इस सभ्यता का निरा निरूपण या प्रतिबिंबन नहीं बल्कि उसका ही एक विक्षेप, एक लक्षण है; उसकी सम्यक आत्मकल्पना। स्वयं इस सभ्यता द्वारा रची गई उसकी अपनी एक एक लीलामय मीमांसा। सृष्टि के केंद्र से ईश्वर के विस्थापन की और उसके स्थान पर नृतत्त्व के सबसे प्रामाणिक रूप में व्यक्ति की प्राणप्रतिष्ठा की जो मूलगामी विस्फोटक घटना पश्चिम में हुई, पिछले कोई दो सौ वर्षों में उस विस्फोट की शृंखलाबद्ध प्रतिक्रियाओं का सबसे प्रामाणिक दृश्य पश्चिम के उपन्यास में ही उभरता है। इस विस्फोट के पहले तक पश्चिम की दुनिया दिव्य और इहलौकिक, पवित्र और अपवित्र, शुभ और अशुभ, उदात्त और अनुदात्त, न्याय और अन्याय, नायक और प्रतिनायक, साहस और कायरता आदि के जिन सफेद और स्याह रंगों में विभाजित थी, इस विस्फोट में वे रंग आपस में घुलकर एक धूसर रंगत में उभरते हैं, और वह रंगत ही मानो पश्चिम के उपन्यास का अंतःकरण है; यह रंगत ही उपन्यास के स्वत्व, उसके चरितनायक या उसमें निरूपित व्यक्ति की पहचान है।

और इस सिलसिले में जो चीज सबसे महत्त्वपूर्ण प्रतीत होती है वह स्वयं इस विधा में हुए सृजनात्मक विस्फोट की विलक्षण घटना है। पश्चिम की सृजनात्मकता मानो अपने उत्कर्ष की एक नई पराकाष्ठा के लिए इस विधा के अवतरण की प्रतीक्षा कर रही थी। पिछली दो सदियों के दौरान इस विधा में योरोप की लगभग तमाम भाषाओं में जो लेखन हुआ है (और जो आज भी जारी है), वह मानो ईश्वरीय सृष्टि-कल्पना के साथ बराबरी की टक्कर लेती मानवीय कल्पना का, या शायद स्वयं ईश्वरीय कल्पना के मनुष्यकृत विस्तार का लोमहर्षक दृष्टांत है - इस भेद के साथ कि यह विस्तार ईश्वरीय सृष्टि की महज एक छोटी-सी इकाई, यानी मनुष्य, और उसकी रची भौतिक दुनिया की अप्रमेय प्रतीत होती गहराइयों में घटित होता है। वह धार्मिक प्रज्ञा के लोप से रिक्त हुई जगह को भरती एक नई प्रज्ञा का आविष्कार है : औपन्यासिक प्रज्ञा।

आधुनिकता और उपन्यास के इस परस्पर अंगांगि-भाव-संबंध को दृष्टि में रखते हुए हम अगर वापस अपने शुरुआती सवाल पर लौटें, तो हमें, बजाय इसके कि 'क्या हमारे पास कोई ऐसी विधा है...' जैसा सवाल पूछने के, सीधे-सीधे पश्चिम के उपन्यास के मुकाबले अपने उपन्यास की सामर्थ्य के बारे में सवाल उठाना जरूरी लगता है। अगर हम पश्चिम की आधुनिकता में अपनी साझेदारी से इनकार नहीं कर सकते, जोकि, जाहिर है, हम नहीं कर सकते, तो हमें अपने उपन्यास की तुलनात्मक सामर्थ्य के प्रश्न का सामना इस स्वीकारोक्ति के साथ करना ही होगा कि उपन्यास हमारे लिए भी, अपनी आधुनिकता के संदर्भ में, स्वाभाविक ही, उतनी ही अनिवार्य विधा रही है। आखिर यह निरा संयोग नहीं है कि हमारे यहाँ भी आधुनिकता के आगमन और उपन्यास-लेखन की शुरुआत, दोनों समक्रमिक घटनाएँ रही हैं। इस विधा को अपनाने में हमने वैसी ही स्पृहा और त्वरा का परिचय दिया था जैसी आधुनिकता को अपनाने में दिया था। यह इसी अनिवार्यता, स्पृहा और त्वरा का एक लक्षण है कि उस आरंभिक दौर में हमने उपन्यास-लेखन में सिद्धि हासिल कर मौलिक कृतियाँ रचने तक प्रतीक्षा करने की बजाय पर्याप्त तेजी से पश्चिमी उपन्यासों के अनुवाद कर उस अंतराल को भरने की कोशिश की थी। और तब से अब तक इस विधा में हमने विपुल लेखन किया है।

लेकिन तब क्या कारण है कि तब से अब तक, यानी उपन्यास-लेखन की लगभग एक समूची सदी के बीत जाने के बावजूद और उपन्यासकारों तथा उपन्यासों की एक खासी बड़ी संख्या के बावजूद हमारा उपन्यास उन अपेक्षाओं को पूरा नहीं सका जिनका जिक्र हमने आरंभ में किया है - वे अपेक्षाएँ जो यह विधा अपने उस स्वरूप और स्वभाव से ही हमारे मन में, जगाती है जिनको हम इस विधा के मूल पश्चिमी अवतार में चरितार्थ होते देखते हैं पश्चिम का उपन्यास हमें मनुष्य-भाव और मानवीय सृष्टि की, आत्म और अन्य के साथ मनुष्य के संबंधों की, जिन अप्रमेय, अननुमेय, अप्रत्याशित गहराइयों में ले जाता है, उनमें जैसे हमारी कोई गति ही नहीं है। मनुष्य और मनुष्य-भाव, मनुष्य की मानसिक तथा भौतिक सृष्टि हमारे उपन्यास में ज्यादातर या तो अमूर्त बने रहते हैं या बहुत इकहरे ढंग से मूर्त होते हैं। हम पश्चिम के उपन्यास के सरोकारों के मुकाबले अपने उपन्यास के सरोकारों पर सवाल नही उठा रहे हैं, हमारा संशय इन सरोकारों को उनकी संश्लिष्टि और सूक्ष्मता में न उभार पाने को लेकर है; उनको निर्वैयक्तिक, प्रामाणिक और मर्मस्पर्शी न बना पाने को लेकर। उपन्यास हमारे पास तमाम मसलों पर हैं : गरीबी, मजदूरों-किसानों का शोषण और उनकी असहायता, हिंसक स्तर की जातीय-उपजातीय तथा सांप्रदायिक असहिष्णुता, अन्यान्य किस्म के पाखंड, काइयाँपन, षड्यंत्र, प्रेम, स्त्री-पुरुष तथा अन्य सामाजिक संबंध आदि। लेकिन इनमें से शायद ही कोई चीज अपनी अंदरूनी बारीक बुनावट में और वृहत्तर मानवीय अस्तित्व के कोऑर्डिनेट के रूप में किसी उपन्यास में उभर सकी होगी। शायद इसीलिए उसमें, सृजनात्मक उत्कर्ष की वैसी कोई स्थिति नहीं बन सकी जैसी वह पश्चिम में बनी, जिसका साक्ष्य हमें फ्लाबेयर, जेम्स जॉयस, प्रूस्त, काफ्का, टॉमस मान, विलियम फॉकनर, हेमिंग्वे आदि तथा, उधर, तॉल्स्तॉय और दॉस्तोएव्स्की के साथ आरंभ हुए महानतम रचनात्मकता के उस सिलसिले को देखकर मिलता है जो पिछली दो सदियों से आज तक निरंतर जारी है। स्पष्ट ही इस विफलता का कारण उपन्यास की विधा के साथ हमारे संबंध की प्रकृति में कहीं निहित है, जिसका अनुमान शायद इस बात से भी हो सकता है कि यह विफलता हमारी श्रेष्ठतम उपन्यासकार प्रतिभाओं (प्रेमचंद, जैनेंद्र, रेणु, हजारी प्रसाद द्विवेदी, कृष्ण बल्देव वैद, निर्मल वर्मा आदि) के कृतित्व के बावजूद उजागर नहीं होती, वह इस तथ्य से भी उजागर होती है कि अपने कवित्व में असाधारण उत्कर्ष हासिल करने वाली प्रतिभाएँ, जैसे कि मसलन प्रसाद और निराला, जब उपन्यास लिखने की कोशिश करते हैं, तो उनकी ये कृतियाँ स्वयं उनकी कविता के समक्ष भी निहायत ही कमजोर ठहरती हैं। ये 'आधुनिक' प्रतिभाएँ हैं, लेकिन जिस आधुनिकता को ये लेखक अपनी कविता में इतनी सहजता और लाघव के साथ साधते प्रतीत होते हैं, वही आधुनिकता जब एक संपूर्ण विधा (उपन्यास) की शक्ल में उनके सामने आती है, तो वे असहज और बोझिल साबित होते हैं।


क्या कारण है ?

   एक कारण तो, संभवतः, हमारे साहित्य में स्वयं इस प्रश्न का अभाव ही है। हमने इस प्रश्न को पूछना लगभग कभी भी जरूरी ही नहीं समझा। और शायद इसलिए कि उस विफलता को ही हमने कभी महसूस नहीं किया। उलटे हम चिंताजनक स्तर पर आत्मतुष्ट और आत्मस्फीति के शिकार बने रहे। मैनेजर पांडेय की पुस्तक 'उपन्यास और लोकतंत्र' ऐसी ही समस्याहीन, निस्संशय, आत्मतुष्ट और आत्मस्फीत 'आलोचना' का एक ताजा उदाहरण है (हालाँकि वह अकेला उदाहरण नहीं है; रमेशचंद्र शाह और नामवर सिंह जैसे गंभीर आलोचकों समेत कई लेखकों ने भारतीय उपन्यास पर लिखा है लेकिन किसी ने भी सृजनात्मकता के स्तर पर उसकी शिथिलता को लक्ष्य नहीं किया)। इस मामले में निर्मल वर्मा अकेले ऐसे अपवाद हैं जिन्होंने न सिर्फ इस विफलता को बहुत शिद्दत के साथ अनुभव किया बल्कि उसके एक बहुत महत्त्वपूर्ण कारण को भी रेखांकित किया : उपन्यास के जातीय फॉर्म के अन्वेषण का अभाव :
            हम भारतीय लेखक उस विधा के बारे में बहुत कम सोचते हैं, जिसे स्वयं अपने
            सृजन के लिए चुनते हैं। हमारे लिए 'विधा' महज माध्यम है, लक्ष्य कुछ और है;
            साहित्य, समाज दर्शन।

   ***


हमने अपने कथात्मक गद्य के लिए 'उपन्यास'-जैसी विधा को चुना, जो नितांत भिन्न सांस्कृतिक अनुभव-क्षेत्र में पनपी और विकसित हुई थी। यह कुछ ऐसा था कि हम एक ऐसे बने-बनाए मकान में रहने लगें जो दूसरों ने अपनी जरूरतों, संस्कारों स्मृतियों - एक शब्द में कहें तो अपनी 'जलवायु' के अनुसार बनाया था। हम न केवल उसमें रहने लगे, बल्कि कभी उसमें अपने अनुकूल परिवर्तन करने की जरूरत महसूस नहीं की। प्रेमचंद से लेकर अधुनातन उपन्यासकार ने कभी 'उपन्यास' की विधा पर शंका प्रगट नहीं की, अपने अनुभव के संदर्भ में उसका पुनर्परीक्षण तो दूर की बात थी।

         ***

भारत में अनेक उपन्यास लिखे गए हैं; हर साल लिखे जाते हैं-मनोवैज्ञानिक उपन्यास, यथार्थवादी उपन्यास, आंचलिक उपन्यास - लेकिन स्वयं उपन्यास की 'समस्या' पर विचार, उसके जातीय फॉर्म का अन्वेषण हमने नहीं के बराबर किया है। इस स्तर पर   उपन्यास की समस्या हमारी समूची संस्कृति के विश्लेषण से जुड़ी है।

संस्कृति, समय और भारतीय उपन्यास', शब्द और स्मृति, 1976

जहाँ तक विधा पर अविचार का प्रश्न है, इसे हम अपनी आलोचना में सहज ही लक्ष्य कर सकते हैं जहाँ न सिर्फ उपन्यास की विधा पर बल्कि किसी भी विधा पर, और उससे भी पहले स्वयं साहित्य पर, सत्तामीमांसात्मक किस्म के किसी भी स्तर के विमर्श का सर्वथा अभाव है। और यह अभाव सिर्फ आलोचना तक सीमित नहीं है, इसको स्वयं इन विधाओं में किए जाने वाले लेखन में लक्ष्य किया जा सकता है। इसके बावजूद कि पिछले दस-पंद्रह वर्षों के कुछ लेखन में, विशेष रूप से कविताओं और कहानियों में, इन विधाओं को जब-तब विषय बनाया जाता रहा है, ऐसा लगभग नहीं हुआ है जहाँ किसी रचना का अनुभव उस अनुभव को विन्यास प्रदान करती विधा के साथ जिरह, तनाव या संवाद का कोई रिश्ता बनाता हो। हम इन विधाओं को जैसे प्रदत्त मानकर चलते हैं, और अपने विमर्श को इनपर नहीं बल्कि इनमें केंद्रित करते हैं।

विधा और कृति के संबंध को, सामान्य तौर पर, एक सहज संबंध कहा जा सकता है जिसके लिए निर्मल वर्मा 'मकान' के जिस सुंदर और आत्मीय रूपक का स्मरण कराते हैं वह एकदम सटीक रूपक प्रतीत होता है; मकान जिसे व्यक्ति ''अपनी जरूरतों, संस्कारों, स्मृतियों - एक शब्द में कहें तो अपनी 'जलवायु' के अनुसार'' बनाता है। इसीलिए उस व्यक्ति का उस मकान के साथ एक सहज, समंजस, संगत और ऐसा आत्मीय संबंध बनता है कि हम उस मकान को उसका 'घर' कहते हैं। उसका इंटीरियर और एक्सटीरियर स्वयं उसमें रहने वाले व्यक्ति के अंतरंग और बहिरंग को प्रतिबिंबित करते हैं; उसके स्वभाव, संस्कारों, स्मृतियों, अभिरुचियों को, बल्कि शायद उसकी जीवन-दृष्टि और विश्वदृष्टि को, नैतिक दृष्टि और कल्पना-दृष्टि को भी। राम और रावण के या कौरवों और पांडवों के व्यक्तित्वों का जो रूप, मसलन, रामायण या महाभारत के भीतर उभरता है, उसकी कल्पना इन कृतियों के महाकाव्यात्मक विन्यास के बाहर नहीं की जा सकती। यह इन महाकाव्यों के विधात्मक स्वरूप में अनुकूलित वह 'जलवायु' ही है जिसके भीतर इन पात्रों की दिव्य या अपौरुषेय प्रतीत होती अंतर्बाह्य निर्मिति और आचरण अवकाश और संगति पाते हैं। हम इन पात्रों को इनकी तद्वत निर्मिति और आचरण के साथ, मसलन, किसी उपन्यास का पात्र नहीं बना सकते। यहाँ तक कि हम इन कृतियों को इनके गद्यात्मक अनुवादों में पढ़ते हुए भी उस अनुभव को अक्षुण्ण नहीं रख पाते जो इनके मूल छंदों में निहित है।

विधा और कृति के इस सहज संबंध के चलते किसी विधा के बारे में अतिरिक्त रूप से सजग होना, या लिखने की प्रक्रिया को वस्तुनिष्ठ बनाते हुए स्वयं उसको लेखन में शामिल करना, उन विधाओं के संदर्भ में शायद बहुत अनिवार्य न रह जाता हो जिनकी एक सुदीर्घ परिपाटी विकसित है, और जो हमें परंपरागत तौर पर मिली हुई हैं, जैसे कि, मसलन, कविता की विधा हमें मिली हुई है। यद्यपि यहाँ भी, हर कृति अपना वैशिष्ट्य महज अपने अनुभव की विशिष्टता के आधार पर ही नहीं अर्जित करती, बल्कि अपने उक्त अनुभव के अनुरूप संबंधित विधा को भी वैशिष्ट्य प्रदान करते हुए अर्जित करती है; हर कवि, कविता की प्रदत्त सामान्य विधा में लिखने के बावजूद, उस विधा को भी उतना ही अद्वितीय बनाता चलता है जितना अद्वितीय उसका अनुभव होता है। रचना की अद्वितीयता में उसकी विधागत अद्वितीयता शामिल है।

लेकिन यही अतिरिक्त सजगता उन विधाओं के संदर्भ में बहुत अनिवार्य हो उठती है जो हमें उस तरह परंपरागत रूप से मिली हुई नहीं हैं, या जिनकी हमारी अपनी कोई परिपाटी नहीं है, बल्कि जो एक सर्वथा अलग दुनिया में, अनुभव के एक नितांत भिन्न ढाँचे की अनुरूपता में विकसित हुई हैं, जैसे कि उपन्यास की विधा है। पश्चिमी संस्कृति के भीतर पिछली दो सदियों से भी ज्यादा समय की अवधि में यह विधा जिस जलवायु में ढलकर विकसित हुई है उसमें एक साथ कई तत्त्व शामिल हैं : ईसाई नैतिकी और इस नैतिकी के अवचेतन में दमित और इसलिए उसको जब-तब त्रस्त करती ग्रीक पेगन अंतश्चेतना; धर्मयुद्धों, विश्वयुद्धों, फासीवाद, नस्लवाद, साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद की प्रक्रियाओं में हुए नरसंहार; रेनेसाँ, एनलाइटनमेंट, और आधुनिकता, और इन आंदोलनों की प्रक्रिया में विकसित सेक्युलरिज्म, लोकतंत्र, स्वतंत्रता, समानता और व्यक्तिवैशिष्ट्य जैसे मूल्य। उपन्यास के संदर्भ में यह अतिरिक्त आत्मचेतना हमें इसलिए और भी अनिवार्य हो जाती है कि जिस दुनिया, यानी योरोप, में यह विधा विकसित हुई है स्वयं वहाँ भी वह न सिर्फ परंपरागत रूप से प्रदत्त विधा नहीं है, बल्कि अनुभव के जिस विशिष्ट ढाँचे, यानी आधुनिकता, के भीतर वह वहाँ विकसित हुई है, वह ढाँचा स्वयं पश्चिमी संस्कृति के पारंपरिक आधारों के प्रति एक विद्रोह की प्रक्रिया में निर्मित हुआ है। और इस अर्थ में एक खास तरह की अतिरिक्त आत्मचेतना स्वयं इस अनुभव के ढाँचे में निहित है - कुछ ऐसे प्रभावशाली ढंग से कि उसको इस अनुभव के एक पारिभाषिक पद के रूप में भी देखा जा सकता है। इस तरह, उपन्यास की विधा अपने मूल रूप में हमारे लिए कम से कम दो स्तरों पर विजातीय ठहरती है : एक, उस सांस्कृतिक स्तर पर जहाँ वह अपने संस्कारों में, अपने जीन्स में, सर्वथा विजातीय संस्कृति के तत्त्व लिए हुए है, और दूसरे, इसी सांस्कृतिक परंपरा के प्रति अपने उस विद्रोह के स्तर पर, जो स्वयं भी इसलिए विजातीय है क्योंकि उसका औचित्य इस सांस्कृतिक परंपरा के तत्त्वों - विशेष रूप से उसकी धर्म-दृष्टि - के बरक्स परिभाषित है।


लेकिन हमारे उपन्यास की समस्या शायद सिर्फ इस विधा पर विचार न करने, याकि उसके 'जातीय फॉर्म का अन्वेषण' न करने तक ही सीमित नहीं है। उसकी जड़ें कहीं अधिक गहरी प्रतीत होती हैं। मुश्किल सिर्फ यह नहीं है कि ''हम भारतीय लेखक उस विधा के बारे में बहुत कम सोचते हैं, जिसे स्वयं अपने सृजन के लिए चुनते हैं'', बल्कि मुश्किल, इससे पहले, शायद, यह है कि सिर्फ भारतीय लेखक ही नहीं बल्कि हम भारतीय मनुष्य मात्र उस विधा के बारे में और भी कम सोचते हैं जिसे हम स्वयं अपने जीवन के लिए चुनते हैं। हमारे उपन्यास की समस्या, विशेष रूप से, जीवन-विधा के बारे में विचार न करने की हमारी प्रवृत्ति का शायद सबसे अचूक, सबसे सटीक संकेतक है। विशेष रूप से इसलिए कि ये दोनों चीजें एक उभयनिष्ठ संदर्भ से जुड़ी हुई हैं, और वह संदर्भ है 'आधुनिकता'। उपन्यास की जिस विधा को हमने अपने सृजन के लिए चुना, हम एक बार फिर स्मरण करें, वह उसी आधुनिकता का एक विक्षेप है, जिसे हमने अपने जीवन की विधा के रूप में चुना। इसलिए एक बने-बनाए मकान में रहने लगने की जो बात उपन्यास के संदर्भ में कही गई है, वह दरअसल कहीं ज्यादा अभिधात्मक ढंग से, सबसे पहले इस आधुनिक सभ्यता और संस्कृति के संदर्भ में हम पर लागू होती है।

संसार के इतिहास में साभ्यतिक-सांस्कृतिक वरण की इससे बड़ी और विलक्षण शायद ही दूसरी कोई घटना होगी, जो हिंदुस्तान के संदर्भ में घटित हुई, जहाँ सभ्यता और संस्कृति के एक समूचे विजातीय मॉडल को अपनाते हुए उसमें करोड़ों की संख्या वाले एक विराट जनसमूह के राजनैतिक, सामाजिक (सांप्रदायिक, जातीय और वर्णपरक) और सांस्कृतिक स्तर के असंख्य विभाजनों, भेदों और विविधताओं को तथा विकेंद्रित, स्वायत्त और जब-तब अंतर्विरोधी और विरोधाभासी प्रतीत होती इकाइयों को, एक समरूप राष्ट्र-राज्य के रूप में संहत करने का प्रयत्न किया गया; उसका निबंधन, संस्थापन, संचालन और संवर्धन करने का प्रयत्न किया गया। यह मानों एक विराट एकल आख्यान के भीतर अपने में स्वायत्त, और अलग-अलग आख्याताओं द्वारा बयान की जाती असंख्य छोटी-छोटी कहानियों विनियोग था। 'पेगन' शब्द का प्रयोग हम प्रायः धार्मिक संदर्भ में किसी बहुदेववादी संस्कृति के संकेतक के तौर पर करते हैं। लेकिन हम अगर हिंदुस्तान के संदर्भ में इस शब्द का अर्थविस्तार करते हुए उसके माध्यम से उपर्युक्त तमाम राजनैतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक बहुलताओं को संकेतित करने की कोशिश करें, जोकि उसकी बहुदेववादी धर्मचेतना से ही अनुप्राणित हैं, तो आधुनिकता के उक्त एकल महाख्यान में इन बहुलताओं का विनियोजन एक मानी में हिंदुस्तान के डि-पेगनाइजेशन का विराट प्रयत्न साबित होता है। डि-पेगनाइजेशन दोहरे अर्थ में : उसको एक (-ईश्वर-) उन्मुख बनाने के अर्थ में भी और ईश्वर-निरपेक्ष या इहलौकिक (सेक्युलर) बनाने के अर्थ में भी - पश्चिमी आधुनिकता के विकास के दो क्रमिक सोपान : पहला सोपान ईसाइयत है, जो एक परम शक्तिशाली अस्मिता के अधीन तमाम भेदपरक पहचानों का उन्मूलन कर उनको समरूप बनाती है, और दूसरा सोपान आधुनिकता है, जो इस ईसाई नैतिकी को प्रश्नांकित करने के बावजूद अपने शक्तिशाली और दैवीकृत तंत्रों की स्थापना के लिए अनिवार्य समरूपताओं की खातिर उसी ईसाइयत की ऋणी है। प्रसंगवश, यह आकस्मिक नहीं कि जिन औपनिवेशिक वर्षों में हिंदुस्तान के आधुनिकीकरण की उक्त परियोजना जारी थी, उन्हीं वर्षों के दौरान हिंदुस्तान में धर्मप्रचार की अपनी कार्यसूची के साथ ईसाई मिशनरियाँ भी सक्रिय थीं। ऊपरी तौर पर विरोधाभासी प्रतीत होते ये दो सोपान, इस अर्थ में, आधुनिकता का ही एक ऐसा अंतर्विरोध रचते हैं जिसके चलते यह आधुनिकता हमेशा ईसाई आधुनिकता बनी रहने के लिए अभिशप्त प्रतीत होती है।

हमने जिसे 'वरण' की संज्ञा दी है, उसको 'आरोपण' के रूप में भी देखा जा सकता है, देखा जाता है। एक स्तर पर यह निश्चय ही आरोपण था, क्योंकि आधुनिकीकरण की यह परियोजना औपनिवेशिक व्यवस्था द्वारा आरोपित थी, और इसका औचित्य अँग्रेज शासकों, बौद्धिकों तथा मिशनरियों द्वारा पश्चिमी सभ्यता के अपने मानकों के आधार पर गढ़ी गई भारत की एक सर्वथा नकारात्मक स्याह छवि के परिप्रेक्ष्य में प्रतिपादित किया गया था। लेकिन इस संदर्भ में जब हम तत्कालीन भारतीय बौद्धिकों की भूमिका पर गौर करते हैं तो यह एक उत्सुक स्वीकार ही ज्यादा ठहरता है। क्योंकि यह भूमिका (पश्चिमी सभ्यता के विरोध के मामले में गांधी और, विशेष रूप से राष्ट्रवाद तथा नेशन-स्टेट के विचार के विरोध के मामले में, टैगोर के अपवादों को छोड़कर) प्रतिरोध के अभाव तक ही सीमित नहीं है, बल्कि हम अगर अपने पुनर्जागरणवादी रेह्टॉरिक पर, और सावरकर जैसे लोगों द्वारा सिद्धांतीकृत उस 'नस्लपरक राष्ट्रवाद' पर ध्यान दें जिसे आशीष नंदी ने 'आधुनिक योरोप की अवैध संतान' कहा है, तो हम पाएँगे कि हमारे बौद्धिकों ने उपर्युक्त छवि की गढ़न में, या कम से कम उसको उभारने वाली एक स्पष्ट पृष्ठभूमि देने में पर्याप्त योगदान किया था। (इस मसले पर मैंने किंचित विस्तार से अपने एक अन्य निबंध, 'अनुवाद से पहले', समास-5, में लिखा है।)

लेकिन यह परिघटना इतनी दीर्घकालिक, धीमी और उलझी हुई है कि उसको वरण या आरोपण में से किसी एक प्रक्रिया से जोड़कर देखना न तो संभव है और न ही शायद उचित भी। और न ही उसके लिए पूरी तरह से सिर्फ इन भारतीय बौद्धिकों को ही जिम्मेदार ठहराना उचित प्रतीत होता है। दरअसल वरण बनाम आरोपण की यह पदावली इस तथ्य के समक्ष अर्थहीन ठहरती है कि ब्रिटिश हुकूमत को उखाड़ फेंकने के लिए हमने जिस तरह का व्यापक और उत्कट जनप्रतिरोध बरता, स्वयं उस हुकूमत की मार्फत प्रक्षेपित सभ्यता और संस्कृति के मामले में हमने न सिर्फ वैसा कोई जनप्रतिरोध नहीं बरता बल्कि उलटे उस सभ्यता-संस्कृति, उसकी संस्थाओं और प्रतीकों को अपनाने में कुछ-कुछ वैसी ही व्यापकता और उत्कटता का परिचय दिया। इस विरोधाभासी परिघटना में, जाहिर है, इस सभ्यता-संस्कृति की शक्ति और आकर्षण के साथ-साथ उसके प्रति हमारी वेध्यता की, उसके प्रति अपने लोभ या सम्मोहन का संवरण न कर पाने की, हमारे प्रतिरोधक तंत्र के कमजोर या उदार या ग्रहणशील होने की, संभावनाओं के तत्त्व किसी न किसी अनुपात में शामिल हैं।

पर फिलहाल हमारा मुद्दा यह नहीं है। मुद्दा यह है कि, वरण या आरोपण, जिस किसी भी प्रक्रिया में आयी इस आधुनिकता के साथ हमारा संबंध किस तरह का बना। जाहिर है, परायी 'जलवायु' के अनुकूल निर्मित इस 'बने बनाए मकान' में एक सदी से ज्यादा का समय बिताने के दौरान हमने इसमें अपने अनुकूल भरपूर परिवर्तन किए हैं। जिस तरह इस आधुनिक निर्मिति के एक बहुत बड़े और महत्त्वपूर्ण हिस्से, संसदीय लोकतंत्र, के बारे में राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है कि हमने अंततः इसको ठोक-पीटकर कुछ इस तरह अपने अनुरूप ढाल लिया है कि हम इसे खास 'भारतीय लोकतंत्र' की तरह पहचान सकते हैं, उसी तरह शायद इसकी दूसरी संस्थाओं, प्रशासन, न्यायप्रणाली, अर्थव्यवस्था, शिक्षा, चिकित्सा, कृषि आदि के बारे में भी कहा जा सकता होगा। इसी तरह, इस अनुकूलन की प्रक्रिया में हमने स्वयं अपने पारंपरिक स्वत्व को भी भरपूर तजा या बदला है। लेकिन इन परिवर्तनों और अनुकूलनों के संदर्भ में दो चीजें बहुत महत्त्वपूर्ण प्रतीत होती हैं। पहली : ये परिवर्तन और अनुकूलन ज्यादातर हमारी तात्कालिक जरूरतों से ही उत्प्रेरित रहे हैं; अपनी परंपरा के किन्हीं तत्त्वों के साथ आधुनिकता का सामंजस्य स्थापित करने या उसके किन्हीं सर्वथा असमंजनीय तत्त्वों को प्रतिरोध देने से नहीं। और दूसरी : जिस आधुनिकता के आकर्षण में हमने अपने पारंपरिक स्वत्व को लगभग पूरी तरह तज दिया स्वयं उस आधुनिकता के मूलभूत तत्त्व इस आत्मवंचना के अनुपात में हमारी संवेदना का अंग नहीं बन सके। हमारी वास्तविक अवस्थिति दरअसल इसी दोहरे अलगाव से चिह्नित है, जिसमें हम एक ओर अपनी परंपरा से उन्मूलित हैं और दूसरी ओर आधुनिकता से अ-समंजस।

लेकिन हमारी इस अवस्थिति की असल विडंबना - उसका विरोधाभास और अंतर्विरोध - हमारे अलगाव के उपर्युक्त दोहरेपन में उतनी नहीं है जितनी वह इन दोनों ही अलगावों के कुछ इस कदर प्रारूपिक ढंग से भ्रामक होने में है कि अपने प्रगटन में ये अलगाव अपनी वास्तविकता से लगभग विपरीत दिखाई देते हैं; अलगाव की बजाय वे हमारे उत्कट लगाव के अभिप्रायों में खुद को व्यक्त करते हैं। मसलन, मानवीय और मानवेतर जगत के प्रति उत्तरोत्तर बढ़ता गया हमारा स्वार्थ-प्रेरित अलगाव, भ्रष्टाचार, बलात्कार, लूट और हिंसा की प्रवृत्तियाँ, वस्तुतः, लगभग नास्तिकता के स्तर की हमारी आध्यात्मिक रिक्ति को दर्शाती हैं। ये प्रवृत्तियाँ दर्शाती हैं कि हमारे निर्णयों या कर्मों को मर्यादित करने वाली ईश्वर की सर्वव्यापी निगाह या अंतर्यामी स्थिति में हमारा भरोसा नहीं रह गया है। लेकिन हमारी धार्मिकता-आध्यात्मिकता का प्रगट रूप अपनी आवेगमय, उग्र और आक्रामक प्रदर्शनधर्मिता से न सिर्फ इस रिक्ति को झुठलाने की कोशिश करता है बल्कि हमें अभूतपूर्व, और कुछ मामलों में तो उग्रतम धार्मिक संप्रदायों के मुकाबले में भी कहीं ज्यादा, धार्मिक संप्रदाय के रूप में प्रस्तुत करता है। धार्मिक उत्सवों और झाँकियों का कुरुचिपूर्ण तमाशा और पागल कर देने वाला शोर, नित नए उदित होते धर्मगुरु (जिनमें से कुछ के अकल्पनीय दुराचरण के भंडाफोड़ के बावजूद इनमें हमारी आस्था नीरंध्र बनी रहती है), मशरूम की तरह हर कहीं (जिसमें सरकारी और सार्वजनिक क्षेत्र के परिसर शामिल हैं) उग आते मंदिर और पांडाल, तथा इस धार्मिकता को उत्तरोत्तर प्राप्त होता नगर, बाजार, मीडिया और मध्यवर्ग का तथा हिंदू राष्ट्रवाद की संगठित और हिंसक राजनीति का संरक्षण और संवर्धन इसी के उदाहरण हैं। हमारी धार्मिकता कहीं अधिक तर्कपरक, संगठनधर्मी, संस्थानोन्मुख और एकोन्मुख होती गई है। लेकिन इससे कहीं अधिक वह पाखंडपूर्ण होती गई है। जब हमारा भू-माफिया, खनिज-माफिया और स्वयं सरकारें जमीनों और खनिजों को हड़पतीं, उनका दुर्विनियोजन करती हैं तथा आदिवासियों को उनके परंपरागत परिवेश से बेदखल करती हैं तब धर्म या ईश्वर का भय उनके इन कर्मों के आड़े नहीं आता, लेकिन यही लोग निर्माणों की शुरुआत करते हुए भूमि-पूजन, वास्तु-विचार, वास्तु-पूजन और दीप-प्रज्ज्वलन आदि करना कभी नहीं भूलते। पारंपरिक आयुर्विज्ञान और उसके दर्शन की गहरी विस्मृति या उसमें अंदरूनी अविश्वास की नींव पर खड़े, और मनुष्य के जैविक अस्तित्व तथा स्वास्थ्य को पण्यवस्तु-बाजार की वस्तु की तरह बरतते, आधुनिक आयुर्विज्ञान के बड़े-बड़े स्थापत्यों के परिसर में छोटे-मोटे देवालय अनिवार्यतः मौजूद होते हैं। इस लोक के हमारे कुकर्मों पर पर्दा डालती यह तथाकथित धर्मचर्या दरअसल हमारे आर्थिक, सामाजिक निवेशों की ही तरह एक किस्म के आध्यात्मिक निवेश की भी भूमिका निभाती है : कौन जाने ईश्वर सचमुच कहीं हो, तब यह जमा पूँजी शायद परलोक के हिसाब-किताब के दौरान हमारे कुकर्मों की क्षतिपूर्ति कर सके!

ऐसा ही एक विराट पाखंड लोकतंत्र के साथ हमारे रिश्ते के संदर्भ में प्रगट होता है। सामान्यतः हम और हमारे बारे में अन्य लोग यह दावा करते हैं कि हम 'लोकतंत्र' नामक एक सर्वथा विजातीय पद्धति को पचा लेने वाली दुनिया की अनूठी सभ्यता हैं। लेकिन क्या हम सचमुच इसे पचा सके हैं एक शासन-पद्धति या राजनैतिक व्यवस्था होने से पहले लोकतंत्र मनुष्य के आचरण को एक विशिष्ट किस्म की लय-गति में निबद्ध करते छंद की भूमिका निभाता है। दूसरे शब्दों में, एक लोकतांत्रिक समाज ही एक सच्चे लोकतांत्रिक राज्य की बुनियाद होता है। इस दृष्टि से देखें तो लोकतंत्र आज भी हमारा सामाजिक संस्कार नहीं बन सका। वह हमारे स्वाभाविक आचरण का, अन्य के साथ, बल्कि स्वयं अपने साथ, संबंध बनाने का ढंग नहीं बन सका। यहाँ तक कि हमारे राजनैतिक दलों और स्वयं लोकतांत्रिक संस्थाओं की अंदरूनी डायनॉमिक्स में उसका घोर अभाव है। हमारे वंशपरक, जातीय, सांप्रदायिक, लैंगिक, वर्गीय, भाषिक और क्षेत्रीय अहं में व्यक्त होता एक किस्म का सूक्ष्म फासीवाद और नस्लवाद अभी भी हमारे इन संबंधों का, अक्सर आक्रामक ढंग से, निर्धारण करता है, जो हमारे विमर्श तक में संक्रमित है जिसकी संरचना में अन्य के मत के लिए अवकाश या उसकी पूर्वापेक्षा के तत्त्व बमुश्किल ही दिखाई देते हैं। वह निश्चयात्मक और निर्णयात्मक है; आत्मसंशय और अनिश्चय से रहित और अंतर्विरोधों तथा विरोधाभासों की भीति से ग्रस्त, उनके प्रति भीरु। लेकिन लोकतंत्र का हमारा प्रगट राजनैतिक ढाँचा और हर आम चुनाव के साथ लोकतांत्रिक प्रक्रिया में हमारी भागीदारी का उत्तरोत्तर बढ़ता हुआ प्रतिशत आधारभूत और सूक्ष्म लोकतंत्र के उपर्युक्त अभाव को ढकता हुआ हमें दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक राष्ट्र के रूप में पेश करता है!

न ही हमें आधुनिकता की सबसे बड़ी देन वह आत्मनिर्भर, आत्मनियंता व्यक्ति ही कहीं दिखाई देता है जिसने ईश्वर की मध्यस्थता से साफ इनकार करते हुए, शुद्ध अपने विवेक के बूते पर अपनी नियति के फैसले करने का दुस्साहस किया था। हमारा स्वत्व अभी भी वस्तुतः, निर्मल वर्मा के शब्दों में, एक 'कंपोजिट सेल्फ' है; कुल, कुटुंब, जाति, संप्रदाय आदि की सामुदायिकता में स्पंदित होता एक संश्लिष्ट स्वत्व। लेकिन पारंपरिक सामुदायिकता से भिन्न इस पहचान का विद्रूप इस बात में है कि यह संश्लिष्ट स्वत्व खुद को 'व्यक्ति' के छद्मवेश में प्रस्तुत करता है। हमारी व्यक्तिमता हमारे बहिरंग में, हमारे प्रगटन में, हमारी प्रस्तुति, हमारे संज्ञापन में व्यक्त होती है, और अक्सर बहुत आक्रामक ढंग से व्यक्त होती है, लेकिन हमारे स्वत्व के अंतरंग में उसकी उपस्थिति उतनी ही शिथिल, उतनी ही कुण्ठित है। या फिर वह हमारी स्वार्थपरकता में व्यक्त होती है। इसीलिए अपनी नियति के बारे में फैसले लेने वाला चाहे स्वयं यह तथाकथित 'व्यक्ति' ही क्यों न हो, उसके ये फैसले प्रायः उसके अंतरंग में पैठी इसी सामुदायिकता या स्वार्थपरकता से नियंत्रित होते हैं, उसके निहत्थे विवेक से नहीं। और अगर कभी सचमुच कोई 'व्यक्ति' इस सामुदायिकता के सुरक्षा-कवच को तोड़कर बाहर आ जाता है, तो वह अक्सर हमारी हिंसा का शिकार होता है।

'व्यक्ति' से भी पहले, दरअसल मनुष्य या मानव तत्त्व के प्रति हमारा दृष्टिकोण आधुनिक प्रतीत नहीं होता। हम मनुष्य को उसके तथाकथित सद्गुणों और दुर्गुणों के आधार पर नायक या प्रतिनायक के रूप में परखने, सराहने और तिरस्कृत करने के कुछ इस तरह अभ्यस्त हैं कि इस चौखटे से बाहर सहज और वास्तविक मनुष्य का, विरोधाभासों और अंतर्विरोधों से युक्त अंतःकरण हमारी सहिष्णुता और सहानुभूति का, बल्कि हमारे संज्ञान तक का विषय नहीं बन पाता। ये नायकत्व के प्रति हमारे अतिरंजित पूजा-भाव और संरक्षणवादी रवैये के, उसको नीरंध्र मानने के, ही दृष्टांत हैं कि जब कभी हमारे नायकों (वे चाहे मिथकीय हों या ऐतिहासिक हों या एकदम समकालीन हों) के बारे में ऐसे किन्हीं मानवीय विरोधाभासों, अंतर्विरोधों या कमजोरियों को सामने लाने की कोशिश की जाती है, तो हम उनके बचाव में आक्रामक रूप से असहिष्णु हो उठते हैं। ऐसी ही असहिष्णुणता और आक्रामकता का परिचय हम स्वयं अपने द्वारा गढ़े गए नायकों के खिलाफ भी उस वक्त देते हैं जब उनके नायकत्व की दिव्यता-मंडित धीरोदात्त छवि को तोड़कर उनका कमजोर मनुष्य बाहर आ जाता है। बहुत संभव है कि अन्य में प्रक्षिप्त ये नीरंध्र और दिव्य नायकत्व स्वयं हमारी आत्मछवि के प्रतिक्षेप हों : हमारी अपनी नैसर्गिक मनुष्यता को, उसके अंतर्विरोधों आदि को, समझने, सहने की हमारी अनिच्छा और अक्षमता के परिणाम। विडंबना, एक बार पुनः, यह है कि हमारा यह आचरण एक ऐसी संस्कृतिक विरासत के बरक्स है जिसमें ऐसे अनंत मानवीय और अतिमानवीय मिथकीय चरित्र मौजूद और समादृत हैं जो इस तरह के अंतर्विरोधों-विरोधाभासों के पुंज हैं। अंतर्विरोधों-विरोधाभासों का संज्ञान लेने, उनको समझने, सहने, और उनके परिणामों की जिम्मेदारी लेने के लिए जो असाधारण धैर्य और विवेक अनिवार्य है वह शायद उस व्यक्ति-चेतना के लिए ही संभव है जिसका, जैसा कि हमने पूर्व में संकेत किया है, हममें गंभीर अभाव है। हमारा यह अधीर आचरण, एक विचित्र किस्म की कर्म-शिथिल आस्था से परिचालित प्रतीत होता है, उस विवेक या तर्क-बुद्धि से नहीं जो आधुनिकता का तो एक प्रमुख लक्षण है ही, पर जो हमारी परंपरा की भी एक अंतर्धारा रही है।

एक और चीज है जो हमारी आधुनिकता को शायद सबसे ज्यादा चिह्नित करती है, जो संभवतः आधुनिकता के भारतीय संस्करण की ही एक सबसे बड़ी विशेषता है : राजनीति। राजनीति का, जीवन-दृष्टियों के वैविध्य को विस्थापित कर एकमात्र जीवन-दृष्टि, और विविध जीवन-दृष्टियों को वैधीकृत करने वाली संप्रभु जीवन-दृष्टि बन जाना। राजनीति का, यथार्थ को - मानवीय, गैरमानवीय, अतिमानवीय कैसे भी यथार्थ को - देखने, ग्रहण करने, समझने, विश्लेषित करने की लगभग एक मात्र विधि बन जाना। जीवन के केंद्र में राज्य की, और उसी तर्क से राजनीति की, प्राण-प्रतिष्ठा दरअसल उस अटल और नित नवीकृत होते रहे राष्टवाद का सबसे महत्त्वपूर्ण प्रभाव है जो विशेष रूप से हमारे यहाँ उस समरूप राष्ट्र-राज्य की सबसे निष्ठावान संतान साबित हुई जिसकी स्थापना के समानांतर हमारी आधुनिकता विकसित हुई थी।


आधुनिकता के साथ इस रिश्ते के संदर्भ में जब हम अपने उपन्यास की विफलता की वजहों पर विचार करते हैं, तो समस्या यह नहीं प्रतीत होती कि हमने अपने देसी या स्वजातीय यथार्थ को एक विजातीय विधा में निबद्ध करने की कोशिश करते हुए उस विधा की उपयुक्तता पर शंका प्रगट नहीं की याकि उसको अपने इस यथार्थ से अनुकूलित नहीं किया, जैसा कि निर्मल वर्मा की उपर्युक्त शिकायत से ध्वनित होता लगता है। समस्या स्वजातीय यथार्थ और विजातीय विधा के बीच की असंगति की नहीं बल्कि वह, मुख्तसर तौर पर, एक ओर एक विजातीय जीवन-विधि के साथ हमारे असंगत संबंध की, और दूसरी ओर उपन्यास की विजातीय विधा के स्तर पर इस असंगति के प्रतिक्षेप या संक्रमण की प्रतीत होती है। शायद विजातीयता दोनों ही स्तरों पर है और दोनों ही स्तरों पर वह अशुद्ध विजातीयता है। यह नहीं कि हमने उपन्यास की विधा का अपने यथार्थ के साथ अनुकूलन नहीं किया, बल्कि यह कि यह विधा स्वयं ही आधुनिकता के साथ हमारे उक्त असंगत रिश्ते के समानांतर उस असंगति से अनुकूलित होकर हम तक पहुँची है।

इस परिघटना को स्पष्ट करने के लिए हमें दरअसल अभिव्यक्ति के अपने उस अभिनव माध्यम, यानी गद्य, और उस अभिनव भाषा-रूप, यानी खड़ी बोली के निरुक्त पर ध्यान देना जरूरी होगा जिनमें हमारा उपन्यास संभव हुआ। हम ध्यान दें कि ये दोनों ही चीजें, यानी हिंदी गद्य और खड़ी बोली, जिनके साथ, बल्कि जिनमें, हमारे 'आधुनिक हिंदी साहित्य' की शुरुआत हुई, हमें पहले से मिली हुई नहीं थीं, बल्कि ये खुद भी उसी आधुनिकता की संतानें हैं जिसका हमने स्वयंवर किया था। बेशक, ये हिंदी साहित्य के इतिहास की महान घटनाएँ थीं, क्योंकि इनके परिणामस्वरूप हमारे साहित्य को कहानी, उपन्यास, निबंध और आलोचना जैसी नई विधाएँ प्राप्त हुईं, और स्वयं हिंदी कविता में आधुनिक संवेदना तथा गद्य की लय का मार्ग प्रशस्त हुआ। लेकिन इस वरदान की विडंबना वरदान होने के क्षण में ही इसके अभिशाप होने में है। क्योंकि यह गद्य भी दोहरे अलगाव के शिकार हमारे साभ्यतिक-सांस्कृतिक आधुनिकीकरण की प्रक्रिया का ही एक अंग था। इस गद्य में न सिर्फ हिंदी की पूर्वज भाषा संस्कृत के गद्य की कोई हजार वर्ष लंबी परंपरा की कोई स्मृति नहीं थी, बल्कि इसका विकास भी तथाकथित भारतीय पुनर्जागरण के उसी दौर में पश्चिमी सभ्यता के मानकों के आधार पर गढ़ी गई भारत की उसी नकारात्मक स्याह छवि को प्रतिरोध-की-प्रक्रिया-में-आभ्यंतरीकृत-करने के विडंबनापूर्ण तर्कों से हुआ था। भारत के आधुनिकीकरण की परियोजना के निष्पादन में जो भूमिका हमारे ज्ञानोदित बौद्धिकों ने निभाई थी, लगभग वही भूमिका तत्कालीन लेखकों द्वारा हिंदी साहित्य के उस आधुनिकीकरण के निष्पादन में निभाई गई थी जिसका प्रमुख अधिकरण यह गद्य था। बहुत थोड़े से अपवादों को छोड़ दें, तो हमारा अब तक का गद्य हमारी जातीय स्मृति या परंपरा की विस्मृति से उत्तरोत्तर कुछ इस कदर चिह्नित होता चला गया है कि यह विस्मृति उसकी पहचान का एक महत्त्वपूर्ण लक्षण बन चुकी है। इसकी आधुनिकता के मूलाधार, कम से कम अपनी महत्त्वाकांक्षा में, ईश्वर बनाम मनुष्य के कॅण्ट्रास्ट पर खड़ी पश्चिमी आधुनिकता से बहुत भिन्न नहीं हैं। उसमें इसकी कोई स्मृति प्रतीत नहीं होती कि भारत की बहुदेववादी परंपरा में इस तरह के कॅण्ट्रास्ट की कोई तात्त्विक हैसियत नहीं है; उसे ज्यादा से ज्यादा एक एक लीला के रूप में ही गुंजाइश मिलती रही है। (अपने पूर्वोद्धरित निबंध में मैंने इस मसले पर भी अपेक्षाकृत विस्तार से लिखा है।)

लेकिन जब हम परंपरा की विस्मृति की कीमत चुकाते इस गद्य की आधुनिकता पर गौर करते हैं, तो दृश्य हमारी साभ्यतिक-सांस्कृतिक आधुनिकता से भिन्न प्रतीत नहीं होता। यहाँ भी विडंबना वही है कि आधुनिकता के साथ इस प्रदीर्घ अंतक्रिया के बावजूद वह आधुनिक संवेदना इस गद्य का संस्कार नहीं बन सकी। यहाँ भी वह ज्यादातर इस गद्य के बहिरंग को अलंकृत-शोभित करने वाला अंगराग ही है। आधुनिकता के मूल्यों के साथ उसका संबंध आधुनिक संस्थाओं के साथ भारतीय समाज के वैसे ही असंगत संबंध से भिन्न नहीं है। इस गद्य की विषयिता (सब्जैक्टिविटी) स्वयं को जिस सहजता के साथ सामुदायिक चेतना या सामुदायिक अहं की पदावली में अभिव्यक्त कर पाती है वैसी सहजता वैयक्तिक चेतना या वैयक्तिक अहं की पदावली में व्यक्त उसकी आत्माभिव्यक्ति में नहीं है। इस गद्य की वाक्य-रचना में 'मैं' अक्सर बोलने से बचता है, और 'उस' के बारे में बोलने से बचता है; इसकी बजाय वहाँ अक्सर 'हम' होते हैं जो 'उन' के बारे में बात करते हुए ज्यादा सहज अनुभव करते हैं। यह अकारण नहीं कि इस गद्य में व्यक्ति के अंडरग्राउण्ड अँधेरे को अभिगम्य बनाती, उसको निरावरण आत्मसाक्षात्कार और सार्वजनिक पापस्वीकार का अवकाश उपलब्ध कराती डायरी, व्यक्तिव्यंजक निबंध, जीवनी, आत्मकथा और पत्र जैसी विधाओं का लेखन अव्वल तो बहुत कम है और जो है उसमें वैसी आत्मपरकता या निजता का अभाव है जो पश्चिम में इन विधाओं की वास्तविक पहचान और समृद्धि की वजहें रही हैं। दूसरी ओर - और यह उसका एक और विरोधाभास है - उसमें वस्तुनिष्ठता की, वस्तुजगत को उसकी विविधता और व्यापकता में, सूक्ष्मता और जटिलता में, उसके क्षैतिज और अनुलंब आयामों में ग्रहण करने की, वस्तु के मर्म में पैठने की, वह सामर्थ्य या अभिरुचि भी नहीं है जो दार्शनिक, भौतिकवैज्ञानिक और मानविकीय लेखन के लिए अनिवार्य है। हमारे गद्य में इस तरह के लेखन का गंभीर अभाव ही नहीं है, बल्कि उसमें दूसरी पश्चिमी भाषाओं के ऐसे लेखन का, उसके मुहावरे और पदावली का अनुवाद बहुत असहज रूप में उभरता है। यह गद्य अपनी प्रकृति में वाचिक (ओरल) अधिक है; अपने लिखित रूप में भी (यहाँ तक कि आलोचना या साहित्यचिंतन के क्षणों में भी) वह वाचिक का लिप्यंतरण प्रतीत होता है। वह बौद्धिक सूक्ष्मता, जटिलता, विविक्ति, विश्लेषण और तर्कणा से नहीं, बल्कि अनुरोधपरक वाक्चातुर्य से या, अपने सबसे बेहतर क्षणों में, काव्यात्मकता से अपनी शक्ति हासिल करता है। और जिस राजनीति को हमने आधुनिकता के भारतीय संस्करण की सबसे बड़ी विशेषता कहा है, क्या वह राजनीति भी इस गद्य का मूलभूत संस्कार, उसका जैनेटिक लक्षण, नहीं है

हिंदी की यह गद्य-कथा हमारे उपन्यास की दशा को समझने के लिए इसलिए अनिवार्य है, क्योंकि उपन्यास इस कथा का सबसे महत्त्वपूर्ण, संभवतः सबसे लोकप्रिय, चरित्र है। यह उपन्यास की विधा ही है जिसमें गद्य के गुण-धर्म अपना अधिकतम विस्तार पाते हैं। वाणी का कर्म (एक्ट ऑफ स्पीच) इस विधा में इस कदर परिग्रही, इस कदर समावेशी होता है कि वह जीवनी, आत्मकथा, डायरी और पत्र जैसी आख्यानपरक विधाओं को ही नहीं बल्कि निबंध और गद्य की अन्य विमर्शात्मक विधाओं तक को अपने विस्तार में समेट ले सकता है। इसलिए एक स्तर पर यह मानना निश्चय ही संगत है कि हमारे उपन्यास की समस्या की जड़ें दरअसल आधुनिक संवेदना के साथ असंगत हमारे गद्य और खड़ी बोली में ही कहीं मौजूद हैं। इस नुक्ते पर हमारी शिकायत कुछ और व्यापक होकर इस रूप में उभरती है कि हमने महज उपन्यास की विधा पर ही नहीं बल्कि दरअसल अपने गद्य और खड़ी बोली के उत्स पर ही मूलगामी ढंग से विचार नहीं किया - उतना भी नहीं जितना, अँग्रेजी में ही सही, राष्ट्रवाद और सेक्युलरिज्म, संसदीय लोकतंत्र, नौकरशाही, न्यायपालिका, शिक्षा और चिकित्सा आदि की आधुनिक संस्थाओं के बारे में किया गया है। स्वयं इन विमर्शों में भी आधुनिक हिंदी साहित्य का दृष्टांतपरक उपयोग करते हुए इसको 'साहित्य' की तरह, भाषा की कला की तरह, पढ़ने की बजाय, सूचनाओं के संचय की तरह बरता जाता रहा है। यह अविचार, एक बार फिर, इन अभिव्यक्ति - और भाषा - रूपों (गद्य और खड़ी बोली) की (आत्म-)विमर्शात्मक सामर्थ्य की कमी, और इनके बारे में हमारी उदासीनता को, इनको गैरमहत्त्वपूर्ण मानने की हमारी प्रवृत्ति को, ही दर्शाता है।

लेकिन उपनिवेशवाद और आधुनिकता के प्रभाव के तर्क से ही सही, अगर इन अभिव्यक्ति - और भाषा - रूपों के आविष्कार और विकास में हमारे उन्हीं विवेकवान, प्रतिभाशाली लेखकों का ही सबसे प्रमुख योगदान है, जिनमें से कुछ ने उपन्यास की विधा का भी स्वेच्छापूर्वक वरण किया, तो क्या हम इस समूची परिघटना की जिम्मेदारी महज उपनिवेशवाद या आधुनिकता के आरोपण पर डालते हुए इन लेखकों के संस्कार और विवेक की भूमिका को, इनके सामर्थ्य की सीमा को, अलक्षित नहीं कर रहे होंगे आखिर क्या वजह है कि यही 'दूषित' गद्य जब हमारी आधुनिक कविता की - निराला, अज्ञेय, मुक्तिबोध, विजयदेव नारायण साही, रघुवीर सहाय आदि तमाम महत्त्वपूर्ण कवियों की कविता की - लय का स्पर्श करता है, तो एक नए सृजनात्मक उन्मेष का कारण बनता है एक ऐसी सृजनात्मकता जिसके पर्यावरण में हमें पहली बार अपनी एक अनूठी संवेदनात्मक अवस्थिति का बोध होता है। स्पष्ट है कि हम गद्य को उसकी अपनी शर्तों पर साध पाने में विफल रहे हैं, जो दरअसल, जैसा कि हमने ऊपर संकेत किया, आधुनिकता को न साध पाने का या उसके साथ हमारे विडंबनात्मक, असमंजस, विरोधाभासी, अंतर्विरोधी, पाखंडपूर्ण रिश्ते का ही एक प्रभाव है। लेकिन यहाँ जो चीज ध्यान देने की और चौंकाने वाली है, वह यह है कि यहाँ यह रिश्ता उन लेखकों के संदर्भ में उभरता है जिनसे न सिर्फ इससे ऊपर उठने की बल्कि इसकी सम्यक आलोचना विकसित करने की उम्मीद की जानी चाहिए थी।


क्या आधुनिकता या गद्य या अंततः उपन्यास की हमारी अधूरी और असंगत साधना के मूल में हमारे सौंदर्यबोध की, हमारे लेखकीय संस्कार में पैठी सौंदर्य-संबंधी किसी विशिष्ट धारणा की भूमिका हो सकती है दर्शन और काव्यशास्त्र के मर्मज्ञ मुकुंद लाठ इस अटकल की ओर हमारा ध्यान आकर्षित करते हैं। उनके समक्ष प्रश्न यद्यपि उपन्यास का नहीं बल्कि आत्मकथा का है (''भारत में आत्मकथा क्यों नहीं लिखी गई'), लेकिन उनका जवाब उपन्यास (या, उन्हीं के शब्दों में 'परकथा') पर भी उतना ही लागू होता है। वे कहते हैं कि इस प्रश्न का ''उत्तर हमारे यहाँ की आत्मा की अवधारणाओं में नहीं, कथा की धारणा और परंपरा में ढूँढ़ना चाहिए'' जिसमें ''अलंकारशास्त्र के विधि-विधान, बंधन, मर्यादाओं की शृंखला'' की महत्त्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। उपन्यास (और सिर्फ 'यथार्थवादी' उपन्यास ही नहीं उपन्यास-मात्र) लोक या सामान्य मानव जीवन की 'लोकधर्मी' या 'वास्तविक' अनुकृति में चरितार्थ होता है। यह अनुकृति न सिर्फ किसी औचित्य-विचार से मर्यादित नहीं होती, वह न सिर्फ इस जीवन में निहित विधि-विधानों, बंधनों, मर्यादाओं या आदर्शों से बँधी नहीं होती बल्कि भावना और कर्म दोनों ही स्तरों पर इन मर्यादाओं आदि के उल्लंघन, और इस उल्लंघन के नतीजे में होने वाले संघर्षों और त्रासदियों में रूपायित होती है। इस 'लोकधर्मी' अनुकृति के बरक्स लोक की वह 'नाट्यधर्मी' अनुकृति है जिसका प्रतिपादन कथा-विषयक अलंकारशास्त्र की हमारी परंपरा के मूल ग्रंथ नाट्यशास्त्र में किया गया है और जो मुकुंद लाठ के अनुसार हमारी कथा का संस्कार बना हुआ है। 'नाट्यधर्मी' अनुकृति रसनिष्पत्ति और धर्मशिक्षा के दोहरे उद्देश्यों तथा इन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए निर्धारित औचित्य की मर्यादाओं से बँधी हुई है। रसनिष्पत्ति के संदर्भ में एक मर्यादा तो इसी रूप में उभरती है कि चूँकि रसों की संख्या सीमित है और प्रत्येक रस के मूल में एक स्थायी भाव तथा कुछ निश्चित संचारी भाव होते हैं, अतः इस अनुकृति में मनुष्य का व्यापक भावलोक कुछ निश्चित भावों में ही सिमटकर रह जाता है। दूसरी मर्यादा, औचित्य के रूप में, उस भाव-संयोजन में उभरती है जिसके अंतर्गत प्रत्येक स्थायी भाव के साथ कुछ निश्चित संचारी भाव ही संगत हो सकते हैं, उनसे इतर संचारियों के आने से ''रसाभास का भयंकर दोष'' पैदा हो सकता है। सामंजस्य के इस विधान के चलते नाट्यधर्मी अनुकृति में भावों के उन अ-मंजस, अप्रत्याशित, परस्पर-विरोधी संयोजनों के लिए कोई गुंजाइश नहीं रह जाती जो वास्तविक भावव्यापार के महत्त्वपूर्ण अंग होते हैं।

दूसरा औचित्य-बंधन आचार-व्यवहार या धर्म का है, जो 'और भी वास्तव-विद्वेषी है'। मुकुंद लाठ के ही शब्दों में, ''करनी, कथनी, मनुष्य से मनुष्य का पारस्परिक संबंध, यहाँ तक कि कौन क्या सोचता है इन सबका एक आदर्श था, जो धर्मशास्त्रों से, मर्यादा-ग्रन्थों से लिया गया था। नाटक या कथा के पात्रों का इन आदर्शों की परिधि में ही विचरण कराया जाता था। इन आदर्शों का जाल जीवन की हर छोटी से छोटी बात को भी अपनी बाँहों में घेरे हुए था। पिता का पुत्र से, पति का पत्नी से, माँ का बेटे से, बड़े का छोटे से, नीच का ऊँच से संबंध कैसा हो, इसकी मर्यादा थी; कौन क्या करे, कैसे करे, क्या सोचे, कैसे सोचे, क्या कहे, कैसे कहे, इसकी मर्यादा थी।'' ''चरित्र चाहे काल्पनिक हो या वास्तव, चरित लिखने का आदर्श यही था।'' ''नाटककार या कथाकार मर्यादा तोड़े तो रसभंग करने का दोषी हो जाता था।'' ''कहना नहीं होगा कि कथा लिखने में नाट्यधर्मों का ऐसा दोहरा औचित्य-प्रधान आदर्श कथा को यथार्थ से दूर ले जाता है।'' मुकुंद लाठ का मानना है कि इन 'लक्ष्मण रेखाओं' के ''व्यूहवत वलय ने एक ऐसी परिधि बना दी जिनके अंदर रहना कथा लिखते समय हमारा स्वभाव सा बन गया।''

यह अटकल किंचित दूरारूढ़ प्रतीत हो सकती है कि नाट्यधर्मी अनुकृति की यह परंपरा हमारे आधुनिक उपन्यासकार का संस्कार और स्वभाव बन गई हो, लेकिन हमारी औपन्यासिक कल्पना में इस परंपरा के उक्त विधि-निषेधों की प्रच्छन्न और संभवतः आधुनिकीकृत मौजूदगी से शायद ही इनकार किया जा सके।

इसी क्रम में एक अटकल और। मुकुंद लाठ अपने इसी निबंध में कथा के संदर्भ में भावना और कर्म की भूमिकाओं की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए कहते हैं कि ''हालाँकि कथा के लिए भावना और कर्म दोनों का गुंथन आवश्यक होता है पर सच पूछा जाए तो भावना से कर्म का पलड़ा भारी पड़ता है। केवल भावना की अभिव्यक्ति के लिए हम संगीत का, या कविता का, या नृत्य का, सहारा ले सकते हैं, जरूरी नहीं कि कोई कहानी ही हो। पर कर्म के, चरित के बिना कथा नहीं बन सकती। और कर्म से अभिप्राय यहाँ मानव-परिस्थितियों में किए गए कर्म से है जिसमें आत्म और पर के संबंध का बड़ा स्थान रहता है; विशेषकर आत्म के अन्य आत्मों के साथ संबंधों का। इन्हीं के माध्यम से इन्हीं की अभिव्यक्ति से भावना प्रस्फुटित की जाती है। भावना कर्म का अंग बनकर आती है।'' इस विवेक के परिप्रेक्ष्य में अगर हम एक बार फिर इस तथ्य पर ध्यान दें कि आधुनिक समय में हमारी सृजनात्मकता का जैसा उत्कर्ष कविता में संभव हुआ, या जारी रहा, वैसा उपन्यास में संभव नहीं हो सका, तो क्या इसकी वजह के तौर पर यह अटकल भी लगाई जा सकती है कि भावना के जगत के मुकाबले कर्म (एक्शन) के जगत में हमारी गति, स्वभावतः ही, प्रायः शिथिल रही है क्या यह कर्म-शिथिलता ही महाभारत के रचयिता को अपने ग्रंथ के बीचोंबीच कर्म की महिमा के एक समूचे दर्शन के प्रतिपादन के लिए प्रेरित नहीं करती - वह महाभारत जिसमें कर्म अपनी पराकाष्ठा पर है, और जो, जैसा कि श्री लाठ ने संकेत किया है, हमारी नाट्यधर्मी परंपरा का एक महान अपवाद है; जिसमें धर्म बारबार दाँव पर लगता है और मर्यादाओं की तोड़फोड़, भावों के अंतर्विरोधी और विरोधाभासी संयोजन हिंसा की पराकाष्ठा पर घटित होते हैं। और क्या यह विडंबना भी हमारे इसी कर्म-शिथिल स्वभाव या संस्कार का ही एक प्रभाव नहीं है कि, एक बार फिर मुकुंद लाठ के ही शब्दों में, ''महाभारत के आख्यानों को लेकर जो नाटक, चंपू, चरित, महाकाव्य कथाएँ लिखी गईं, सबने महाभारत को भारतकथा की जगह भरतकथा बना दिया : नितांत नाट्यधर्मी।''

इसी क्रम में, अंत में, एक अटकल और, जो शायद औचित्य और मर्यादा के उपर्युक्त तर्क के विपरीत जाती लगे। इस निबंध में हम लगातार योरोप के उपन्यास के परिप्रेक्ष्य में बात करते रहे हैं। लेकिन अगर हम कुछ दूसरी गैरयोरोपीय सभ्यताओं, जिनकी स्थिति भी पश्चिम के संदर्भ में कमोबेश हमारे देश जैसी ही रही है, के उपन्यासों को योरोपीय उपन्यास के बरक्स रखकर देखें, तो स्थिति काफी भिन्न दिखाई देगी। बल्कि यहाँ के लेखकों ने औपन्यासिक कल्पना को एक ऐसा वैकल्पिक विस्तार दिया है, जो शायद योरोपीय कल्पना के लिए मुमकिन ही न होता। ये उपन्यास दोहरी भूमिका निभाते हैं : वे एक ओर उपन्यास को उस संश्लिष्ट वास्तविकता के प्रति समावेशी बनाते हैं जिसे हम रूसी, लातीन अमेरिकी या एशियाई वास्तविकता कह सकते हैं, जो योरोप के आक्रांतकारी प्रभाव के बावजूद अब भी एक अनूठी वास्तविकता है, और, दूसरी ओर, ऐसा करते हुए वे स्वयं उपन्यास का उतना ही अनूठा संस्करण भी पेश करते हैं। इन गैरयोरोपीय उपन्यासों में सबसे पहला तो रूसी उपन्यास ही है जिसके बारे में आर्नोल्ड ट्वायनबी का हवाला देते हुए रमेश चंद्र शाह ने लिखा है कि ''उन्नीसवीं सदी के प्रारंभ में जब योरोपीय संस्कृति का जबर्दस्त दबाव रूसी चेतना पर पड़ा, तो उस 'कल्चरल शॉक' को पचाने और उससे उबरने के सिलसिले में ही रूसी चेतना ने वह नायाब रास्ता खोज निकाला जिसका नाम रूसी उपन्यास है और जो स्वयं इस विधा के आविष्कार की पहल करने वाले देश इंग्लैण्ड के उपन्यासकारों को इतना नया और विस्फोटक लगा कि उन्हें विक्टोरियन उपन्यास की लीक को त्यागकर सर्वथा नए प्रयोग करने की प्रेरणा उससे मिली। ट्वायनबी का कहना है कि उपन्यास-रूपी यह 'सेफ्टी वॉल्व' रूसी चेतना के लिए उसकी आत्मरक्षा और आत्मविकास दोनों दृष्टियों से बड़ा उपकारक सिद्ध हुआ। तभी तो, फिर पलटकर रूसी चेतना की मौलिक प्रतिक्रियास्वरूप यह आविष्कार योरोपीय उपन्यास को भी फला।''

स्पष्ट ही, योरोपीय उपनिवेशीकरण के संदर्भ में ऐसी किसी भूमिका की बात हम भारतीय उपन्यास के संदर्भ में नहीं कर सकते। उल्टे, जैसा कि हम पहले भी संकेत कर चुके हैं, शायद यही कहा जाएगा कि योरोपीय उपन्यास के ढाँचे के माध्यम से हमारी वास्तविकता का उपनिवेशीकरण, या वह 'कल्चरल शॉक' ही जारी रहा है। बहरहाल। ऐसे ही गैरयोरोपीय उपन्यासों के अन्य उदाहरणों के तौर पर हम कोलंबियाई उपन्यासकार गैब्रियल गार्सिया मार्क़्वेज, तुर्क उपन्यासकार ओरहान पामुक और जापानी लेखक हारुकी मुराकामी की कृतियाँ देख सकते हैं। योरोपीय 'कल्चरल शॉक' को कोलंबिया और तुर्की ने भी झेला है - एक ने हमारी ही तरह योरोपीय (स्पहानी) उपनिवेशीकरण के रूप में (जिसकी इंतिहा यह है कि मार्क़्वेज को अपना उपन्यास अपनी भाषा में नहीं बल्कि स्पहानी भाषा में लिखना पड़ता है), तो दूसरे ने योरोप के सांस्कृतिक संपर्क के नतीजे में उसके आधुनिक मूल्यों के स्वतः वरण के रूप में। और जहाँ तक जापान का सवाल है, वह यद्यपि उपनिवेशीकृत नहीं हुआ (उल्टे स्वयं एक औपनिवेशिक शक्ति के रूप में उभरा) लेकिन वह पश्चिमी सभ्यता में एशिया के किसी भी अन्य देश के मुकाबले सबसे ज्यादा रचा-बसा, और दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान आधुनिक प्रौद्योगिकी के अभिशाप का सबसे बड़ा शिकार होने के बावजूद इस प्रौद्योगिकी का दुनिया का एक महान उत्पादक और उपभोक्ता है तथा भौतिक समृद्धि और उसके उपभोग में अमेरिका और योरोप से बढ़-चढ़कर आगे है। कमोबेश भिन्न होते हुए भी ये परिस्थितियाँ अपनी जटिलता और योरोप के साथ अपने उलझे हुए रिश्ते में भारत के साथ साझा करती हैं। महत्त्वपूर्ण बात यह है कि इन परिस्थितियों से ताल्लुक रखने वाले उपर्युक्त तीनों ही लेखकों के उपन्यास इस बात का अद्भुत उदाहरण हैं कि किस तरह इस जटिलता और उलझाव के प्रति एक संश्लिष्ट प्रतिश्रुति अनूठी कला को जन्म दे सकती है। यह प्रतिश्रुति इस अर्थ में संश्लिष्ट है कि ये लेखक एक ओर अपने समय के संदर्भ में, अपनी सांस्कृतिक-साभ्यतिक परिस्थिति के संदर्भ में, उपन्यास नामक विधा की अनिवार्यता से प्रतिश्रुत हैं, तो दूसरी ओर वे इन्हीं संदर्भों में इस विधा की विजातीयता और औपनिवेशिकता के तथ्य के प्रति, तथा अपनी विशिष्ट मानवीय स्थिति के साथ उसकी असमंजनीयता के तथ्य के प्रति, भी प्रतिश्रुत हैं। इसलिए ये लेखक जब अपना उपन्यास लिखते हैं, तो उसको जितना स्वीकार करते हैं, उतना ही उसको प्रश्नांकित भी करते हैं; जितना उसको 'लिखते' हैं, उतना ही, उसकी योरोपीय रक्तशुद्धता के अर्थ में, उसको मिटाते भी हैं - उसमें इन संस्कृतियों के विजातीय तत्त्वों का समावेश करते हुए : क्लासिक के साथ लोकप्रिय का, यथार्थ के साथ अयथार्थ, जादू, रहस्य, फंतासी और पहेली का, जागृति के साथ स्वप्न का, तर्क के साथ तर्कातीत का, मानवीय स्वरों के साथ अ-मानवीय स्वरों का, त्रास के साथ विनोद का, आक्रांतकारी भौतिकता, सेक्स और हिंसा के साथ उतनी ही गहरी आधिभौतिकता और दार्शनिकता आदि का सन्निधान और अंतर्गुंफन करते हुए। और इसी क्रम में हम भारतीय मूल के लेखक सलमान रश्दी के उपन्यासों को भी शामिल कर सकते हैं।

लेकिन इन वैकल्पिक उपन्यासों का जिक्र हमने एक विशेष अटकल के नाते किया है। अगर फिलहाल मुराकामी के उदाहरण को छोड़ दिया जाए, तो इन वैकल्पिक उपन्यासों के संदर्भ में यह तथ्य बहुत महत्त्वपूर्ण प्रतीत होता है कि योरापीय उपन्यास से अपनी अनूठी भिन्नता के बावजूद ये उपन्यास जिन संस्कृतियों से ताल्लुक रखते हैं वे योरोपीय संस्कृति के साथ धर्म के मामले में एक विशेष और गहरे अर्थ में साझा करती हैं; इस अर्थ में कि भले ही वे ईसाई या यहूदी या इस्लामी संस्कृतियाँ हैं, और भले ही वे आपस में कितने ही विरोध और संघर्ष के रिश्ते में हैं, लेकिन उन तीनों का गोत्र एक ही है : वे तीनों सामी संस्कृतियाँ हैं; एकेश्वरवादी, और उस एक ईश्वर को सृष्टि का केंद्रवर्ती तथा नियंता मानने वालीं। उस धर्म के संदर्भ में, जोकि सेक्युलर आधुनिकता का और उसी के तर्क से अंततः उपन्यास का भी सबसे बड़ा प्रतिपक्ष रहा है, उसका यह सामी स्वरूप, उसमें निहित 'सेक्रेड' और 'प्रोफेन' के बीच का दोटूक विभाजन, बहुत मानी रखता है। यह धर्म का सामी स्वरूप ही है जिसके संदर्भ में सिर्फ रश्दी का सैटेनिक वर्सेस नहीं बल्कि, एक अर्थ में, उपन्यासमात्र ही धर्मद्रोह (ब्लसफेमी) ठहरता है। उपन्यास अपने संभवन, अपनी ऊर्जा के लिए, एक काउंटरप्वाइंट के रूप में, मानों इस सामीत्व की अनिवार्य पूर्वापेक्षा करता है।

अटकल यह है कि क्या भारतीय धर्म और संस्कृति की पेगन अंतश्चेतना हमारे यहाँ उपन्यास को इस अनिवार्य काउंटरप्वाइंट से वंचित करती है कि क्या हमारे संस्कार में पहले से ही मूलबद्ध मनुष्य और ईश्वर, इहलौकिक और पारलौकिक, भौतिक और आध्यात्मिक आदि के बीच विषमता या स्पष्ट विभाजन का अभाव, और उनकी परस्पर व्याप्ति के संबंध से निर्मित गोधूली हमें मनुष्य-भाव पर अतिरिक्त बलाघात देने वाली किसी नई कल्पसृष्टि के लिए उत्प्रेरित ही नहीं करते, याकि ऐसी किसी कल्पसृष्टि की परिरेखाओं को घुँधला देते हैं

जो भी हो, लेकिन इस बात से शायद ही इनकार किया जा सके कि यह गोधूली ही हमारा यथार्थ है। कि विशुद्ध मनुष्य-भाव पर अतिरिक्त बलाघात दरअसल इस गोधूली को नष्ट करने या उसको मर्यादित करने की कोशिश है; उसकी नाट्यधर्मी अनुकृति की कोशिश। भारतीय उपन्यास की संभावना शायद इस गोधूली की लोकधर्मी अनुकृति में है। लेकिन इसी के साथ-साथ हमारे उपन्यास का उन दोहरे तथा परस्पर उद्बोधक, परस्पर प्रबोधक स्तरों पर आलोचनात्मक होना भी अनिवार्य प्रतीत होता है, जिनमें एक ओर आधुनिकता और हमारी अपनी परंपराओं के साथ के हमारे रिश्ते की विडंबनाओं को, उनकी समूची कारुणिकता और विद्रूप में चरितार्थ किया जाए, और दूसरी ओर, उसी के साथ-साथ, क्योंकि उपन्यास का हमारा वरण भी आधुनिकता के साथ हमारे इसी रिश्ते का एक पक्ष है, अतः औपन्यासिक आख्यान के ढाँचे के स्तर पर भी यह रिश्ता चरितार्थ हो; कुछ इस तरह कि यह आख्यान, एक साथ, उपन्यास के पश्चिम के इतिहास और हमारी देशज आख्यान-परंपराओं से प्रतिश्रुत होने की प्रक्रिया में विकसित हो - इस समक्रमिक प्रतिश्रुति की विडंबनाओं के साथ। एक ऐसा आत्मविमर्शात्मक उपन्यास जिसमें स्वयं आख्यान भी उपन्यास के मुख्य पात्रों की अंतर्दशाओं को प्रतिबिंबित करता हुआ, एक अर्थ में, इन पात्रों में शामिल हो। तभी शायद हमारे आख्यान और उसके आख्यात के बीच एक सहज, जीवंत और विश्वसनीय संबंध बन सकेगा।


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हिंदी समय में मदन सोनी की रचनाएँ