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कविता

मैं गुस्सा हूँ
फहीम अहमद


जाओ जी, मै गुस्सा हूँ।

भैया कहते कान न खाओ
उधम मचाना ठीक नहीं।
मम्मी कहती बाहर खेलो
करो शरारत और कहीं।
मुझे भगाते सभी यहाँ से
मैं भी घर का हिस्सा हूँ।

यह मत खाओ, उसे मत छुओ
हरदम मुझ पर रोक लगे।
रूठूँ न तो और क्या करूँ
मेरा मन अब दूर भगे।
अपने ही घर में बेगाना
एक निराला किस्सा हूँ।

मुनिया रोती शोर मचाती
पाती शीशी ढूध भरी।
लेकिन जब मै करूँ शरारत
मुझको फौरन डाँट पड़ी।
मुनिया को ही प्यार करें सब
पर मैं भी तो उस-सा हूँ।

 


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