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कविता

मैं जो होता जादूगर
फहीम अहमद


जंतर-मंतर पढ़ता हरदम
मै जो होता जादूगर।

फूँक मारता तो पापाजी
झट बन जाते बच्चे।
चुपके से जब पेड़ों पे चढ़
आम तोड़ते कच्चे।
तो पापा-सा बनकर उनको
डाँट पिलाता मै जी भर।

छड़ी घुमाता, अंधा कालू
पाता रोशन आँखें।
उसके मन में भी उग आतीं
उम्मीदों की पाँखें।
उसकी आँखों में बस जाता
रंग-बिरंगा जग सुंदर।

दीदी की सब रूठा रूठी
मै गायब कर देता।
भैया की तीखी बातों में
शरबत मै भर देता।
मम्मी का मिर्ची-सा गुस्सा
कर देता मै छू-मंतर।

 


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