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आलोचना

रवींद्र कालिया और उनकी कहानी ‘काला रजिस्टर’
शंभुनाथ मिश्र


चौतरफा घेरेबंदी के बीच : आधुनिक हिंदी कहानी और रवींद्र कालिया

जिसे कथानक कहा जाता है वह दरअसल पाठक के दिमाग की उपज है। कहानीकार तो कहानी की रचना करता है , उसे संक्षिप्त और सरल करके कथा सूत्र निकालने का काम पाठक करता है। -

नामवर सिंह 1

कहानी समकालीन साहित्य की सर्वाधिक प्रयोगशील और विश्वसनीय विधा है। संभवतः साहित्य की सबसे प्राचीन व नैसर्गिक विधा भी। प्रत्येक युग की परिस्थितियों के अनुकूल कथा रूपों का निर्माण और बर्ताव होता रहा है। मनुष्य के भावों, विचारों और स्थापनाओं को प्रकट करने वाली प्रत्येक रचनात्मक विधा का अपना कथा मूल अवश्य होता है। कविता, नाटक, उपन्यास आदि विभिन्न विधाओं में भी कहीं न कहीं एक कहानी अंतर्भूत होती है, जिससे पाठक अपने लिए 'कथानक' गढ़ता है, जैसा कि नामवर सिंह अपनी ऊपर की स्थापना मे भी स्पष्ट करते हैं। समकालीन साहित्य जगत में कहानी सर्वाधिक बरती जाने वाली विधा है। कथा कहने की अन्य विधाओं के बजाय कहानी से पाठक और सर्जक दोनों की अधिक आत्मीयता है। आधुनिक कहानी ने पाठकों के मानस में अपनी इस विश्वसनीयता को और पुख्ता किया है।

समकालीन कहानी जगत में साठोत्तरी कहानी आंदोलन के प्रणेताओं में से एक के तौर पर चर्चित रवींद्र कालिया हिंदी कहानी जगत में एक गंभीर दखल रखते हैं। आधुनिक कहानीकारों की कोई भी सूची बिना इनके उल्लेख के मुकम्मल नहीं कही जाती। पचास से भी अधिक चर्चित और महत्वपूर्ण कहानियों के लेखक रवींद्र कालिया की कहानियों में कथानक, पात्र, परिस्थिति और शिल्प का ऐसा अनूठा 'मिक्सचर' मिला जिसने पाठकों को कथा भाषा के इस जादूगर का मुरीद बना दिया। रवींद्र कालिया का संस्मरण 'ग़ालिब छुटी शराब' हिंदी में अपने ढंग का अनूठा संस्मरणात्मक गद्य है। न केवल अपने संस्मरणात्मक गद्य बल्कि अपनी कहानियों-उपन्यासों में बरती गई भाषा के चलते रवींद्र कालिया लगातार बहसतलब बने रहते हैं। उनकी कुछेक कहानियों को छोड़ दीजिए तो ज्यादातर चुप्पी को खंडित करने वाली कहानियाँ हैं। अपने दौर की सीमाओं को तोड़ती हुई। मौन या सन्नाटे के शिल्प को नकारती हुई कहानियाँ। चुप्पी मारे बैठे रहने वाले पात्र या सन्नाटे को कथानक का केंद्र बनाने वाले नई कहानी के दौर के प्रयोगों से कालिया की कहानी कला प्रभाव ग्रहण नहीं करती। इनकी कहानियों का मूल चरित्र है एक स्थायी प्रतिरोध, जो बहुत छोटे स्तर पर ही सही या भले ही टुकड़ों में आए पर कहानियों की रीढ़ बना रहता है। बहुत बड़े लंबे-चौड़े विषय या महान कथानक की रवींद्र कालिया ने कभी जरूरत महसूस नहीं की। साठ के बाद पैदा हुए गहरे राजनीतिक-सामाजिक मोहभंग से निर्मित वैचारिकी से इनकी अधिकांश कहानियाँ प्रभावित हैं, लेकिन गहरे व्यंग्य बोध के साथ ही। निराशा या खीझ को कहीं भी इन्होंने अपना स्थायी भाव नहीं बनने दिया। इनकी कहानियों का स्वभाव भी इन्ही की तरह बेफिक्र और खिलंदड़ है। विजय मोहन सिंह ने इनकी कहानियों पर टिप्पणी करते हुए लिखा है कि "कालिया की शुरुआती कहानियाँ एक दिनचर्या की तरह हैं। कालिया में दिनचर्या को कहानी बनाने की अद्भुत क्षमता है।"2 जीवन की छोटी-छोटी घटनाओं को कहानी के जरिए दर्ज करना इस पीढ़ी के कहानीकारों की विशेषता भी थी। कहानी में इस तरह की प्रवृत्ति वस्तुतः नई कहानी के जरिए दाखिल हुए वैचारिकता के क्षरण 3 और राजनीति के निषेध 4 जैसी दृष्टियों का ही विकास था। इस पीढ़ी के कथाकारों ने कहानी के अब तक के स्थापित शिल्प को नकार दिया। इसलिए कहानी के आलोचकों ने इस पूरे दौर को फ्रांस के 'एंटी-स्टोरी' मूवमेंट की तर्ज पर 'अ-कहानी' आंदोलन कहना शुरू किया। वास्तव में अ-कहानी न तो कोई आंदोलन बन सका और न ही विचारों के स्तर पर लड़ा जाने वाला कोई रचनात्मक संघर्ष। इसका कोई बड़ा और साझा मंच भी तैयार नहीं हो पाया क्योंकि इस पीढ़ी के कहानीकारों का रचना शिल्प पर्याप्त विभिन्नता पूर्ण था। केवल कुछ कहानीकारों और उनकी कहानियों के जरिए इस दौर को अ-कहानी का दौर कह दिया गया जो वस्तुतः यूरोप के एंटी-स्टोरी मूवमेंट का ही हिंदी अनुवाद है। इसे वस्तुतः नई कहानी के विरोध में जन्मे एक और कहानी शिल्प के विकास के तौर पर लिया जाना चाहिए। नई कहानी के दौर में कथा शिल्प में आ चुके ठहराव को तोड़ने का काम अ-कहानी ने बखूबी किया। इस लिहाज से इसे मूलतः एक विशिष्ट कहानी रूप कहा जा सकता है। जैसा कि मधुरेश के हवाले से ऊपर भी कहा जा चुका है कि यह वस्तुतः हिंदी की साठोत्तरी कविता की तरह कहानी में वैचारिकता के क्षरण और राजनीति के निषेध दृष्टि का विकास था। रवींद्र कालिया और गंगा प्रसाद विमल इस आंदोलन के प्रमुख प्रवक्ताओं में से रहे हैं। मधुरेश का यह विश्लेषण तो ठीक है कि यह कथा रूप वस्तुतः नई कहानी की ही प्रवित्तियों का विकास था, लेकिन यहाँ वैचारिकता और राजनीति के लोप की प्रवृत्तियों के अतिरंजित रूप में आने की बात स्वयं में अतिरंजित है। वस्तुतः एलन राब्ब ग्रिए और नताली सारात के नेतृत्व में फ्रांस में उठे अ-कहानी आंदोलन के पीछे जिस तरह की सामाजिक राजनीतिक परिस्थितियाँ काम कर रही थी उसी तरह की निराशाजनक परिस्थितियों के गर्भ से हिंदी में भी अ-कहानी का जन्म हुआ। हिंदी कहानी के विकास का विश्लेषण करते हुए मधुरेश लिखते हैं " फ्रांस में अ-कहानी का आंदोलन एक ओर यदि कथा विधा के स्वीकृत और परंपरागत तत्वों के निषेध पर बल दे रहा था तो दूसरी ओर जीवन में किसी प्रकार के नैतिक और मूल्यपरक हस्तक्षेप का भी विरोध कर रहा था। निर्बाध प्रयोगशीलता ही उसके लिए सबसे बड़ा रचनात्मक मूल्य थी।" 5 हिंदी की अ-कहानी इन परिस्थितियों के बावजूद भी व्यापक स्तर पर अपनी स्वीकार्यता नहीं निर्मित कर पाई और किसी बड़े कहानी आंदोलन का रूप भी नहीं धारण कर पाई। इसलिए हिंदी की अकहानी के संदर्भ में निर्बाध प्रयोगशीलता पद का प्रयोग नहीं किया जा सकता। हिंदी अकहानी की अपनी रचनात्मक सीमाएँ हैं और उनमें निर्बाध प्रयोगशीलता संभव भी नहीं है, इसलिए यहाँ प्रयोग तो खूब हैं लेकिन नियंत्रित रचनात्मक ढाँचे में।

रवींद्र कालिया की प्रारंभिक कहानियों में आई प्रयोगशीलता को साफ तौर पर रेखांकित किया जा सकता है। मैं, सत्ताईस साल की उम्र तक, विकथा, अकहानी, क ख ग, कोज़ी कॉर्नर आदि कहानियों में अ-कहानी के हिस्से चिन्हित की गई प्रवृत्तियाँ केंद्र में हैं। वस्तुतः हिंदी में अ-कहानी के प्रारंभिक पैरोकार के तौर पर उभरे रवींद्र कालिया अपनी कहानियों के जरिए स्थापित कथा शिल्प को तोड़ने का काम करते हैं। जिस तरह नई कहानी आंदोलन जड़ वैचारिकता पर हमला करता है उसी रूप में अ-कहानी दौर की कहानियों ने कथा शिल्प पर प्रहार किया। कहानी के प्रखर आलोचक इंद्रनाथ मदान की टिप्पणी दृष्टव्य है - "मूल्यांकन की दृष्टि से कथा के रचना विधान का पृथकत्व स्पष्ट करने के लिए ही अ-कहानी का नामांकन किया गया हो - यह भी पूर्ण रूप से सत्य नहीं है। वस्तुतः, अ-कहानी कथा के स्वीकृत आधारों का निषेध तथा किसी तरह के मूल्य स्थापन का अस्वीकार है।" 6 साठ के बाद का समय बहुत सारे सामाजिक-राजनीतिक बदलाओं का भी समय है। विश्व समाज के साथ ही भारतीय समाज में भी परंपरागत जीवन मूल्यों के प्रति एक गहरे नकार का उदय हो रहा था। इस पीढ़ी के युवा में इन सारे मूल्यों-संरचनाओं के खिलाफ न केवल प्रतिकार का भाव था बल्कि एक गहरा असंतोष भी था। वस्तुतः मिश्रित अर्थव्यवस्था के ढाँचे में विकास के लिए संघर्ष कर रहे देश की नीतियाँ अपनी युवा शक्ति की कार्य क्षमता का सही उपयोग नहीं कर पा रही थी। ऐसे में बेरोजगारी,निराशा और गहरे असंतोष के साये में जी रहे क्षुब्ध युवा मन की आवाज को रवींद्र कालिया और उनके दौर के अन्य रचनाकार अपनी कलम के जरिए उभार रहे थे। जीवन में घर कर चुका यह गहरा असंतोष, प्रतिकार साहित्यिक संरचना में भी शिल्प और विचारों के प्रति एक जोरदार नकार में बदल चुका था।

रवींद्र कालिया की कहानियाँ वस्तुतः बहुपक्षीय यथार्थ खिलंदड़े और बेफिक्र अंदाज में व्यक्त करती हैं। गंभीर बातों को भी हल्के तरीके से कह कर निकल लेना इनकी कहानियों की विशेषता है। इस कहकर निकल लेने को किसी तरह का रचनात्मक पलायन नहीं कहना चाहिए बल्कि कटु जीवनानुभवों, निरंतर चलने वाले घात-प्रतिघात, चाटुकारिता, असुरक्षा बोध के बीच पके हुए कहानीकार के 'अपने सिर के बोझ को उतारने' की प्रक्रिया के तौर पर लिया जा सकता है। रवींद्र कालिया की लगभग प्रत्येक कहानी में एक स्थायी भाव है - 'जीवन संघर्ष'। इनकी कहानियों के नायक, नायिकाएँ, प्रतिनायक सभी एक झंझावाती जीवन संघर्ष से जूझ रहे हैं। लगातार और अहर्निश एक ही तरह की बोरडम वाली परिस्थितियों में पड़े रहने को अभिशप्त। लेकिन यह मजबूरी कभी इनकी कहानियों की कमजोरी नहीं बनने पाती। इनकी कहानियों में किसी बड़ी क्रांति की परिकल्पना नहीं है। रोजमर्रा के जीवन में दैनंदिन गतिविधियों से दो-चार होते हुए एक 'स्थायी विद्रोही' चेतना का बचे रहना इनकी कहानियों की विशेषता है। इसलिए इनके कथा नायकों में कहीं 'पराजय बोध' नहीं है। यही विशेषता इनकी कहानियों के नायक को नई कहानी के पराजित नायक से अलग करती है और एक नए कथा समय के 'सृजन का सहयात्री' बनने की सामर्थ्य भी प्रदान करती है। रवींद्र कालिया के जीवन में कभी स्थायित्व नहीं रहा। आजीविका की समस्या में देश के कई शहरों की खाक इन्होंने छानी है, जैसा कि इनके संस्मरण 'ग़ालिब छुटी शराब' को पढ़ते हुए पता चलता है। इनकी खानाबदोशी ने इनके जीवनानुभवों के भौगोलिक परिदृश्य का भी विस्तार किया है। देश के विभिन्न हिस्सों में संघर्ष के दौरान बटोरा गया असंतोष इनकी कहानियों में व्यवस्था विरोध और सर्वहारा के प्रति अंतरंगता के रूप में प्रकट होता है। महानगरीय जीवन में असुरक्षित आजीविका के बीच संघर्ष कर रहे लोगों के जीवन का गहरा असंतोष, तीव्र प्रतिक्रिया के रूप में प्रकट होता है। सभी परंपरागत संरचनाओं को वे मानवीय स्वतंत्रता का विरोधी मानते हैं। इसलिए प्रत्येक स्थापित संरचना के खिलाफ इनकी कहानियों के पात्र मुखर हैं। कैरियर और आजीविका में गहरी असुरक्षा का शिकार व्यक्ति निजी संबंधों में भी गहरी अविश्वसनीयता के बीच जीता है। सभी परंपरागत रिश्तों, माँ-पिता, पति-पत्नी, मित्र, प्रेमिका आदि में इनके पात्रों को किसी भी तरह के संतोष या सुरक्षा बोध का अनुभव नहीं होता। न चाहते हुए भी उसके मन के किसी कोने-अंतरे में एक अविश्वास दबा-छिपा रहता है, जो कई बार अपनी पूर्णता में फूट पड़ता है। त्रास, एक प्रामाणिक झूठ, डरी हुई औरत, नौ साल छोटी पत्नी जैसी कहानियाँ इन्हीं अविश्वसनीय होते जा रहे निजी संबंधों को लक्ष्य करके लिखी गई हैं। ये सभी कहानियाँ दांपत्य और प्रेम संबंधों के प्रभा मंडल को तोड़ने का काम करती हैं। उनके पीछे की वास्तविकता और उनके क्रूर यथार्थ की पहचान करती हैं।

एक कहानीकार के रूप में कालिया निरंतर आत्मसंघर्ष से गुजरते हुए दिखाई देते हैं। उनकी कहानियों का आदमी जितना बाहरी संघर्षों से जूझता है उतना ही भीतरी आत्मसंघर्ष से भी। यह वास्तव में कहानीकार के भीतर का आदमी है जो अपने समय की विद्रूपताओं-विसंगतियों के घटाघोप में निरंतर डूबता उतराता रहता है। अहर्निश आत्मसंघर्ष से गुजरते, दैनंदिन जीवन की अमानवीय स्थितियों के बीच फँसा बोरडम का शिकार व्यक्ति इनकी कहानियों का नायक होता है। ऐसा नायक जिसके विकास के सभी रास्ते बंद हो चुके हों। बावजूद इसके न तो कहीं पराजय का स्वीकरण है न ही कायरता पूर्ण चुप्पी। विजय मोहन सिंह लिखते हैं - "कालिया का पात्र हमेशा कुछ न कुछ बोलता रहता है। उसकी बोरियत उसकी मुखरता से ही व्यक्त होती है।" 7 मैं, कोज़ी कॉर्नर, गरीबी हटाओ, काला रजिस्टर, दफ्तर आदि कहानियाँ इसी तरह के जीवन बोध के जरिए रची गई है। अ-कहानी आंदोलन के पुरस्कर्ताओं में से एक होते हुए भी रवींद्र कालिया की लंबी कथा यात्रा किसी एक आंदोलन से बँध कर नहीं रहती बल्कि ऐसी तमाम सीमाओं का अतिक्रमण करती है। उनमें बंधनों के पार जाने की विलक्षण क्षमता है। उन पर मधुरेश की टिप्पणी महत्वपूर्ण है कि वस्तुतः - "रवींद्र कालिया जीवन की विसंगतियों और विद्रूपताओं के कहानीकार हैं और अर्थहीनता के बोध को अलग-अलग संदर्भों में संप्रेषित करते हैं। इन विसंगतियों को वे व्यंग्य के माध्यम से उद्घाटित करते हुए हर प्रकार की व्यवस्था और स्थापित मूल्यों के अस्वीकार की मुद्रा अपनाते हैं।" 8

जमाने से दो-दो हाथ : आलोचना के समक्ष कहानी

" हमसे सुंदर चित्रों की माँग की जाती है , किंतु उसके नमूने हमारी समाज व्यवस्था में कहाँ हैं ? आपके घिनौने वस्त्र , आपकी अपरिपक्व क्रांतियाँ , आपका मृत धर्म , आपकी निकृष्ट शक्ति , बिना सिंहासन के आपके बादशाह , ये सब क्या इतने काव्यात्मक हैं कि इनका चित्रण किया जाए ? हम अधिक से अधिक इनका मखौल उड़ा सकते हैं। "

- बाल्ज़ाक

विजय मोहन सिंह रवींद्र कालिया के समकालीन कहानीकार हैं साथ ही कटु आलोचक भी। अपनी किताब आज की कहानी के दो लेखों में उन्होंने रवींद्र कालिया की कहानियों की गहरी छानबीन की है साथ ही चीर-फाड़ भी। उनकी मान्यताओं से अगर कोई इत्तेफाक करे तो वह कालिया की कहानियों को औसत, सतही और बेस्वाद मान सकता है। लेकिन एक सजग पाठक के रूप में इन कहानियों से गुजरते हुए क्या हम इनके निष्कर्षों से सहमति दर्ज करा पाएँगे? संभवतः नहीं। विजय मोहन सिंह के निष्कर्षों की असंगति को समझने के लिए हमें इनकी प्रमुख स्थापनाओं को पहले देख लेना चाहिए। अपने लेख कि शुरुआत करते हुए वे लिखते है - "अधिकांश साठ के बाद के कहानीकारों की तरह कालिया के पास भी 'केवल एक' पात्र है,जिसकी दो विशेषताए हैं - लगातार सतही चीजों में उलझे रहना और लगातार बोर होना। कालिया इसी सतहीपन और बोरडम के कहानीकार हैं।" 9 कोई भी कहानीकार अपनी कहानी में वस्तुतः अपने समय को चित्रित करता है। समय के चित्रण कि प्रक्रिया में यथार्थ का अंकन करते हुए वह सदैव खुद को फ्रेम से बाहर रख कर नहीं चल सकता। अपने दौर के प्रतिनिधि पात्र का सृजन करते हुए उसके मन में कहीं न कहीं अपना खुद का या अपने ही बीच का कोई चरित्र उभर कर सामने आता है। इसलिए कई बार नायक के रूप में कहानीकार अपने अनुभव जगत के लोगों को बार-बार न चाहते हुए भी कहानी में शामिल पाता है। इसलिए अगर कोई यह कहते हुए आलोचना करे कि कहानीकार के अनेक पात्र एक जैसी हरकतें करते हैं, जैसे ज्यूक बॉक्स पर संगीत सुनना, प्रेमिका के साथ बैठे हुए बोर होना, सिगरेट पर सिगरेट सुलगाना, जोर जोर से बोलना या बड़बड़ाना आदि तो यह कैसे संरचनागत कमजोरी कही जा सकती है। वैसे भी कोई कहानीकार किसी एक विषय या एक ही पात्र को लिखकर एक बार में ही संतुष्ट नहीं हो जाता। कहानी दर कहानी उसके पात्र का चरित्र विकास पाता है या कथा विषय अपनी परिपक्वता को हासिल करता है। नामवर सिंह इस सिद्धांत को पुख्ता तरीके से रखते हैं - " एक वक्तव्य पर कहानी लिख चुकने के बाद ऐसा भी होता है कि लेखक कुछ दिनों पर फिर लौटता है और किसी नए कोण से उसे उठाता है और जब उससे भी तृप्ति नहीं होती तो पुनः उस पर लौट कर आता है। एक महत्वपूर्ण वक्तव्य लेखक के दिमाग पर आजीवन छाया रहता है और उस एक वस्तु को अधिक से अधिक अथवा सही सही व्यक्त करने के लिए अनेक कहानियाँ लिखता जाता है। चेखव ने इस तरह की अनेक कहानियाँ लिखी हैं। परंतु एक ही आधार पर प्रतिष्ठित होती हुई भी हर कहानी भिन्न है और हर रचना अपने आप में स्वतंत्र तथा पूर्ण है।" 10 इनकी दूसरी आपत्ति है कि कालिया अपनी कहानियों के जरिए तमाम गंभीर चीजों का मखौल उड़ाते हैं। इसलिए वे लिखते हैं कि - "कालिया के सतहीपन और मखौल की इन कहानियों को गंभीरता के लंबे-चौड़े विश्लेषण में लपेटना अपने आप में एक मखौल है।"11 इस विश्लेषण के प्रारंभ में बाल्ज़ाक का एक प्रसिद्ध उद्धरण दिया गया है जिसे उन्होंने कला और साहित्य रूपों से सदैव सुंदर और महान रचनाओं की ही माँग करने वाले आलोचकों के जवाब में कहा था। क्या आजादी के बाद की भारतीय सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों के संदर्भ में भी यह कथन उचित प्रतीत नहीं होता? जब हमारी सत्ता और समाज व्यवस्था इतनी असुंदर, असृजनधर्मी, असहिष्णु और अपरिपक्व है तो कला रूपों में पूर्णता, स्निग्धता और अद्वितीयता की कामना क्यों और कैसे की जा सकती है। कला और साहित्य तो एक तरह की अनुकृति होता है अपने समय और समाज का। इसलिए अगर रवींद्र कालिया की कहानियाँ अपने समय की विसंगतियों पर व्यंग्य करती हैं या अपने दौर की रूढ़ समाज व्यवस्था, राजनीति और पारिवारिक मूल्यों का मखौल उड़ाती हैं, तो इन्हें अगंभीर और सतही कैसे कहा जा सकता है।


भ्रष्ट तंत्र और अराजक समाज व्यवस्था के खिलाफ : काला रजिस्टर कहानी का पाठ विश्लेषण

रवींद्र कालिया की कहानियाँ अपने प्रस्तुतिकरण में एक गंभीर 'विट' की सामर्थ्य रखती हैं। छोटी-छोटी राजमर्रा की घटनाओं के जरिए, व्यंग्यात्मक लहजे में गहराई तक वार करती हैं। स्वीकृत धारणाओं और यथास्थितिवादी जीवन का मखौल उड़ाती इनकी कहानियों में 'काला रजिस्टर' महत्वपूर्ण और उल्लेखनीय है। यह कहानी साठ के दशक में लिखी गई पर्याप्त चर्चित और प्रशंसित कहानी है। रवींद्र कालिया पर आलोचकों द्वारा लगाए गए अनेक आरोपों का जवाब यह कहानी अकेले ही देने की सामर्थ्य रखती है। वस्तुतः यह कहानी कालिया की अन्य कहानियों की तरह ही शिल्प के स्तर पर प्रयोगधर्मी कहानी है। कहानी का परिवेश किसी अखबार या पत्रिका का दफ्तर है जहाँ निर्मम संपादकीय नियंत्रण के बीच काम करने को मजबूर स्टाफ निरंतर खट रहा है। बिना किसी विरोध के प्रत्येक सही गलत निर्णय पर मूक सहमति जताते हुए। वे बॉस की इच्छा पर हर गलती कबूल कर माफी माँग लेते हैं, अब "यह गलती चाहे उनकी हो या उनके बाप की।"12 इस आलोकतांत्रिक माहौल में काम के अलावा केवल चाटुकारिता करने की छूट है जिसमें कुछ लोग ही सिद्धहस्त हैं। वस्तुतः यह कहानी महानगरीय जीवन-व्यवस्था में रोजी-रोटी के लिए संघर्षरत, लोन की किस्तों के जाल में फँसे पढ़े-लिखे मध्यवर्गीय लोगों की कहानी है। ऐसी कहानी जिसका लोकेल एक बेडरूम के फ्लैट से शुरू होकर दफ्तर के बड़े हाल तक सिमट गया है। रवींद्र कालिया ने दफ्तर के जीवन पर कई कहानियाँ लिखी हैं। उन सभी कहानियों में काला रजिस्टर की प्रयोगधर्मिता और शिल्प के स्तर पर बरते गए नएपन को अलग से रेखांकित किया जा सकता है। इस कहानी में शीर्षक से लेकर पात्रों के नामकरण तक में गहरी प्रतीकात्मकता है। कहानी का शीर्षक 'काला रजिस्टर' वस्तुतः निर्मम बॉस के 'तुगलकी फरमानों' और 'अवांछित दखलंदाजी' का प्रतीक है तो पात्रों के नाम मोटा, भैंगा, मँझला, छोटा आदि शारीरिक स्थितियों के साथ ही मानसिक स्थितियों के भी प्रतीक। कहानी में छाया जी को छोडकर किसी पात्र का कोई अलग से नाम नहीं दिया गया है। सभी पात्र यहाँ तक की घटनाएँ भी प्रतीकात्मक ही हैं। इनके जरिए संकेत है उन विद्रूपतापूर्ण परिस्थितियों की ओर जिनसे महानरीय मध्यवर्गी व्यक्ति जूझ रहा है। वैसे पात्रों के नामकरण की इस पद्धति को केवल शैली का अनूठापन नहीं मानना चाहिए क्योंकि इसके अन्य गहरे निहितार्थ भी हैं। वास्तव में "पात्रों के नामकरण की दृष्टि से भी आधुनिक कहानी के प्रयोग विशेष आकर्षक और उद्देश्यपूर्ण हैं। प्रायः ही व्यक्तिवाचक नामों, संज्ञा के स्थान पर सर्वनामों के प्रयोग की प्रवृत्ति बढ़ी। कहानी के कथा वक्ता 'मैं', या 'हम' से लेकर 'तुम' तक को संबोधित और 'वह' तथा 'वे' की चर्चा आज कहानी में होती है। इस शैल्पिक प्रयोग ने कहानी को व्यक्ति विशेष तक सीमित न रखकर समाज का बनने की बोधप्रक्रिया में सहायता दी।"13 इसलिए इस दौर के कहानीकारों ने पात्रों के नाम व्यक्तिवाचक संज्ञा की जगह जातिवाचक (जैसे - लड़का, लड़की, स्त्री, पुरुष) या संख्यावाची रूप (अ, ब, स, क, ख, ग) या शारीरिक विशिष्टताओं के आधार पर रखे।

दैनिक या साप्ताहिक पत्र के कार्यालय में संपादक सर्वोच्च सत्ता होती है, जो अपनी सत्ता की हनक को लगातार बनाए रखना चाहता है। कहानी में संपादक का प्रतीक उसके 'केबिन' को बनाया गया है, जिसके दरवाजे के खुलने-बंद होने से कर्मचारियों की घिग्घी बँध जाती है या घंटी बजते ही साँसें अटक जाती हैं। कहानी का नायक है 'भैंगा' जिसने कई दफ्तरों में काम किया है, और संभवतः अपनी न 'डरने' वाली आदतों के कारण निकाला जाता रहा है। दफ्तर के कई मोटे, छोटे, मँझले 'उपों' के जैसा वह भी एक 'उप' है। यह रवींद्र कालिया की कहानियों में मौजूद 'विद्रोही चेतना' का प्रतिनिधि-पात्र है, जो दफ्तर के सड़े वातावरण का खुला मखौल उड़ाता है। 'काला रजिस्टर' या 'केबिन' से असहज महसूस करते हुए भी उनके प्रति इसके मन में गहरा प्रतिकार भी है। वस्तुतः भैंगा कोई एक पात्र नहीं बल्कि अपने समय की यथास्थिति विरोधी चेतना का 'टाइप' है। ऐसा 'टाइप' जिसका विकास होने की संभावनाएँ न के बराबर होते हुए भी कहानी की जकड़बंद सीमा में से निकलकर वह हमारे पाठक मन में विस्तार पाता है। यह वस्तुतः 'अ-नायक' होते हुए भी पाठक को नायक होने का बोध कराता है। कहानी के पात्र 'केबिन' की जासूसी निगाहों से इस कदर डरे हुए हैं कि दफ्तर में अन्य किसी भी मुद्दे पर बात नहीं करना चाहते। कथा नायक भैंगा इस परिवेश में खुद को घुटता हुआ महसूस करता है। भैंगे की यह घुटन वस्तुतः मध्यवर्गीय परिस्थितियों और मूल्यों के बीच जीने के लिए अभिशप्त व्यक्ति की घुटन है। यह घुटन कहानी के हर एक पात्र के अंदर है। दफ्तर का मोटा 'उप' किसी के भी सवाल का जवाब नहीं देता। "आम तौर पर मोटा दफ्तर में जवाब नहीं देता"14 जबकि उसकी बगल में बैठा दूसरा मोटा 'उप' अपनी घुटन और ऊब मिटाने के लिए "अक्सर पेशाब करने चला जाया करता था" 15 लेकिन जब से केबिन की निगाह में वह आया, तो एक परिपत्र जारी हो गया कि किसी भी कर्मचारी को अपनी कुर्सी छोड़ने से पहले कम से कम 'मँझले' कद के व्यक्ति से इजाजत लेना जरूरी है। इस लफड़ेबाजी से बचने के लिए अब दूसरा मोटा 'उप' अपनी हाजत मिटाने के लिए "जेब से किशमिश या ड्राअर से पान निकालकर खाने लगता है"16 भैंगा इन परिस्थितियों का अभ्यस्त नहीं है। उसे केबिन की निजी-स्पेस में इतनी दखलंदाजी बरदास्त नहीं होती। वैसे भी भैंगे ने कई दफ्तरों में काम किया था मगर सुबह-सुबह इतने उदास और डरे हुए चेहरे उसने कहीं नहीं देखे थे। उसे लगता कि हाल में किसी का शव रखा है और तमाम लोग मातमपुर्शी के लिए इकट्ठा हैं"17 भैंगा मोटे और अन्य सहकर्मियों से सवाल भी करता है कि "आखिर इस तरह 'उदास' और 'डल' रहकर जिंदगी कैसे गुजारी जा सकती है" 18 लेकिन हमेशा की तरह किसी की ओर से कोई जवाब नहीं आता। दरअसल दफ्तर में एक खास तरह की 'सेंसरशिप' लागू है। ऐसी कोई भी बात जो संपादकीय नीति से इत्तेफाक न रखती हो या संपादक को व्यक्तिगत तौर पर पसंद न आए, उसे दफ्तर का कोई भी कर्मचारी नहीं कर सकता। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए दफ्तर में कोई जगह नहीं थी। दफ्तर के कर्मचारियों के लिए तो काफी हद तक दफ्तर के बाहर भी। इसीलिए भैंगा 'केबिन' और 'काले-रजिस्टर' से बुरी तरह चिढ़ता था। वह 'काले-रजिस्टर' की आमद से बेचैन हो जाता है, कागज पर माँ, बहन की गालियाँ लिखने लगता है। मोटा 'काले रजिस्टर' के हाल में घुसते ही असहज हो जाता है और शीर्षक की भाषा में कहता है - "बेचैनी, उदासीनता, थकावट, सन्नाटा उर्फ काले रजिस्टर की आमद"19 'काला रजिस्टर' का निगरानी तंत्र बड़ा व्यापक है। अपने मातहत हर कर्मचारी की छोटी-छोटी गतिविधियों को भी काला रजिस्टर नोट करता है। दफ्तर में एक तरह का 'इंटेलिजेंस नेटवर्क' सक्रिय है जो केबिन तक सूचनाओं को पहुँचाता है और केबिन 'काले रजिस्टर' के जरिए स्पष्टीकरण माँगता रहता है। इस इंटेलिजेंस की बागडोर है कई सारी बुआओं, दफ्तरी चाटुकारों और 'छाया जी' जैसी 'केबिन-प्रेयसियों' के हाथ में। इसीलिए जब भैंगा मँझले से बिना पूछे केबिन में जाकर लौटता है और मँझले 'उप' से कुछ कहना चाहता है तो मँझला चिंतित हो जाता है, "तुम अंदर कैसे चले गए? जाओ,अब यहाँ मत रुको। छाया जी देख लेंगी और काला रजिस्टर इसे कोई नया षड्यंत्र समझेगा" केबिन द्वारा थोपे गए इस भयावह माहौल के खिलाफ भैंगे के मन में गहरी खीझ और क्रूर प्रतिक्रिया जन्म लेती है। वह काले रजिस्टर के नाम से चिढ़ने लगता है। एक दिन जब हाल में तीसरी बार काला रजिस्टर दाखिल होता है तो मँझला गहरी निराशा में डूबकर कहता है - "यह काला रजिस्टर आज काम नहीं करने देगा"20 तब भैंगे के अंदर का गुस्सा फूट पड़ता है। वह हताशा-निराशा के गर्त में नहीं डूबता बल्कि 'काले रजिस्टर' पर अपने गुस्से को उसे नष्ट करने की बात करके उतारता है, - "इसे ड्राअर में बंद कर दो, इसे खिड़की से नीचे फेक दो, इससे बलात्कार कर लो" 21 भैंगे का यह व्यवहार उसे समान परिस्थियों में कार्य कर रहे उसके साथियों के बीच विशिष्टता प्रदान करता है, साथ ही 'कथा-नायक' भी बनाता है। वस्तुतः भैंगे के अंदर स्थापित शक्ति-संरचनाओं के षड्यंत्रों को समझने की शक्ति है। वह रोजमर्रा के जीवन की विसंगतियों से जूझता जरूर है लेकिन उसकी 'स्वतंत्रचेता आत्मा' और 'क्रांतिधर्मी चेतना' का पूर्ण पतन नहीं हुआ है। भैंगे में स्थापित को नकारने की प्रवित्ति के अलावा 'अनैतिक' और 'अन्यायपूर्ण' के खिलाफ बोल पड़ने की जिजीविषा भी बची हुई है। रवींद्र कालिया की कहानियों के पात्र 'एंटी-स्टोरी' या 'अ-कहानी' के आलोचकों द्वारा चिन्हित तथाकथित खंडित नायक से अपने आप को इसी बिंदु पर अलग कर लेते हैं। इनके नायकों की स्वच्छंद प्रवृत्तियाँ वस्तुतः अराजकतावादी न होकर अराजक परिस्थितियों के प्रति विद्रोह हैं।

'काला रजिस्टर' कहानी के जरिए रवींद्र कालिया ने भारतीय समाज व्यवस्था के भ्रष्ट-तंत्र और इसके सहयोगी खूफिया नेटवर्क का खुलासा किया है। साठ के बाद की भ्रष्ट, अराजक और चेतना-विरोधी व्यवस्था का भंडाफोड़ करती इस कहानी का कथा समय विस्तृत है। इस कहानी में एक बड़ी कहानी की सभी संभावनाएँ मौजूद हैं। ऐसी कहानी जो अपने समय की सीमाओं के अंदर ही नहीं बल्कि भविष्य में भी ताक-झाँक करती है। क्या हमारी आज की समाज व्यवस्था निरंतर और भी अधिक भ्रष्ट, क्रूर तथा अराजक नहीं होती जा रही है? बेरोजगारी, हताशा, असहायता, अभिव्यक्ति पर अंकुश, असुरक्षाबोध के बीच जी रहे व्यक्ति के अंदर एक तीव्र प्रतिक्रियावाद जन्म ले रहा है जिसकी परिणति बहुत खतरनाक हो सकती है। 'काला रजिस्टर' कहानी में विद्रोही चेतना के प्रतिनिधि पात्र भैंगा के अलावा एक और पात्र है क्रांति। क्रांति एक प्रतीकात्मक चरित्र है उन तत्वों का जो व्यवस्था विद्रोह से अपनी पहचान बनाने के बाद निहित स्वार्थों के चलते सत्ता के पिछलग्गू बन जाते हैं या अपने हथियार डाल देते हैं। क्रांति कुछ दिनों तक केबिन के अवांछित हस्तक्षेप का विरोध करता है लेकिन जल्द ही काले रजिस्टर के जरिए उसकी गतिविधियों को सेन्सर कर दिया जाता है - "शुरू शुरू में क्रांति तैश में आकर गाली बका करता था मगर जल्दी ही वह विनम्र हो गया। इतना विनम्र हो गया कि एक दिन रद्दी की टोकरी से टकरा गया तो उसने रद्दी की टोकरी से मुआफी माँग ली।"22 दूसरे मोटे 'उप' से एक बार केबिन द्वारा स्पष्टीकरण माँगा गया कि आप "पत्र या संपादक की नीतियों का विरोध करने वाले लोगों से किस इरादे से पत्र-व्यवहार करते हैं।"23 जबकि दूसरे मोटे 'उप' को याद भी नहीं कि उसने ऐसा पत्र-व्यवहार कब और किससे किया। उसने तैश में आकर केबिन से ऐसे पत्रों की बाबत सबूत माँगा जिसका परिणाम बहुत भयंकर हुआ। तब से वह अपनी ही नहीं दूसरों की गलतियों के लिए भी माफी माँग लेता था। भ्रष्ट तंत्र के बीच फँसे व्यक्ति की स्थिति कुछ ऐसी ही होती है। प्रत्येक अलोकतांत्रिक व्यवस्था ऐसी ही चेतना शून्य जनता का निर्माण करना चाहती है।

रवींद्र कालिया की कहानी 'काला रजिस्टर' भारतीय समाज व्यवस्था की 'पावर-डिस्कोर्स एनालिसिस' करती है। भ्रष्ट तंत्र के मूल में स्थित सत्ता संबंधों के समीकरण और पूँजीवादी नेटवर्क के बौद्धिक-राजनीतिक गठजोड़ की परत दर परत इस कहानी के जरिए खुल जाती है। अपने साधारण पाठ में यह कहानी अपने निहितार्थों को नहीं खोलती बल्कि पाठ दर पाठ इसकी संरचना में पैवस्त सत्ता-संबंधों कि कलई खुलती जाती है। केबिन की अधिनायकवादी शक्तियों का कोई नैतिक अथवा बौद्धिक स्रोत नहीं है, बल्कि इसके नेपथ्य में कार्य कर रहा है पूँजी का विस्तृत वरदहस्त। संपादक बतौर एक बौद्धिक सत्ता अपने सहयोगियों के प्रति आलोकतांत्रिक नहीं हो सकता। इस कहानी में भी 'संपादक' या 'केबिन' की नीतियों की आड़ में वस्तुत 'केवल मुनाफे' का धंधा करने वाली पूँजी ही सक्रिय है। कर्मचारियों के बीच भय और असुरक्षा का माहौल पैदा कर न्यूनतम वेतन में मशीनी ढंग से अधिकतम काम लेने की मानसिकता इसके पीछे काम कर रही है। संपादक को मालिकों का आशीर्वाद प्राप्त है। रवींद्र कालिया की कहानी का यह 'लोकेल' भी प्रतीकात्मक है। 'दफ्तर' हमारे व्यवस्था-तंत्र का एक छोटा प्रतिरूप है। वस्तुतः हमारे समूचे व्यवस्था-तंत्र की 'हैरारिकी' और षड्यंत्रकारी गठजोड़ों को इस कहानी के जरिए उजागर किया गया है। भ्रष्ट व्यवस्था तंत्र की भाषा, उसके व्यवहार, शोषण के तरीके और खुफिया नेटवर्क के सूत्रों का बहुस्तरीय विश्लेषण किया गया है। 'काला रजिस्टर' कहानी की भाषा प्रतिक्रिया से उत्पन्न गहरी व्यंग्यात्मक भाषा है। भैंगा अपनी चुटीली खीझ भरी टिप्पणियों के जरिए कहानी के भयानक 'मोनोटोनस' सन्नाटे को तोड़ता है। कहानी में केबिन से संबंधित विभिन्न गतिविधियों के लिए एक व्यंग्यात्मक नाम स्वीकृत है। केबिन से कर्मचारियों की साप्ताहिक भेंट को दफ्तर के उप "पुण्य तिथि" के नाम से याद किया करते हैं। यह एक खुला रहस्य था, कि 'पुण्य तिथि' पर लोग घर से हनुमान चालीसा या गायत्री मंत्र पढकर आते थे। 24 केबिन से अंतरंगता रखने वाली महिलाओं को 'बुआजी' के नाम से पुकारा जाता है। रवींद्र कालिया की कहानियों की भाषा व्यंग्यात्मक, चुटीली और गहरे अर्थ संदर्भों से युक्त होती हैं इसलिए कई बार "काला रजिस्टर" की भाषा में 'गालियों' या 'अपशब्दों' के आने के बावजूद कहीं भी भाषा का अराजक होना नहीं दिखाई देता। भाषा में जो कुछ भी प्रयोग हैं, सभी मध्यवर्गीय बर्तावों के बीच से ही निकले हैं। 'काला रजिस्टर' कहानी अपने निहितार्थ तक जाने के लिए पाठक से दृष्टिकोण के बदलाव की माँग करती है। यथास्थितिवादी जीवन मूल्यों, भाषा के स्थापित ढाँचे और आचरण के निर्दिष्ट सींखचों से बाहर लाने की जद्दोजहद करती है। वस्तुतः यह आधुनिक कहानी के आवश्यक उद्देश्यों की समर्थक और पैरोकार भी है। जैसा कि राजेंद्र यादव ने भी लिखा कि आधुनिक कहानी में - "दृष्टिकोण के बदलाव ने कहानी को अनेक धरातलों पर बदलना प्रारंभ कर दिया। अब कहानी की भाषा उतनी इकहरी नहीं रह गई। उसमें ऐसे बिंब, प्रतीक और अर्थ उभरने लगे थे जो व्यक्ति की अपनी विश्वसनीय अनुभूतियों का चित्रण करते थे लेकिन साथ ही समाज की सचाइयों को भी पकड़ना चाहते थे।"25 रवींद्र कालिया की कहानियाँ समाज की इन्हीं क्रूर सचाइयों को मजबूती से पकड़ती हैं। किसी भी कहानी के निहितार्थ को समझने के लिए गहरी अन्वेषण-दृष्टि और आलोचना के समुचित-विवेक की आवश्यकता होती है। इन कहानियों के वास्तविक पाठ तक पहुँचने के लिए जिस तीक्ष्ण ऐतिहासिक-राजनीतिक दृष्टि की जरूरत है, उसका कालिया के अनेक आलोचकों में अभाव दिखाई देता है। नामवर सिंह के शब्दों में कहें तो "जब किसी कहानी का अर्थ या उद्देश्य पकड़ में नहीं आता है तो उसके प्रति अन्य प्रकार की प्रतिक्रियाएँ व्यक्त की जाती हैं। या तो कहानी की विषय सामग्री से संतोष किया जाता है या विषय सामग्री अपनी दिलचस्पी से बाहर हुई तो भाषा शैली की ही दाद देकर छुट्टी ली जाती है और जहाँ ये दोनों बातें न पसंद हों, तो न वो कहानी रह जाती है और न पठनीय ही"26 अपनी तमाम आलोचनाओं के बावजूद रवींद्र कालिया की कहानियाँ भ्रष्ट व्यवस्था-तंत्र और मध्यवर्गीय स्थापित मूल्यों के विरोध का नया आचारशास्त्र रचते हुए हिंदी कहानी में अपनी मुकम्मल जगह तय करती है।

 

संदर्भ

1. नामवर सिंह, कहानी नई कहानी, पृ.108

2. विजय मोहन सिंह, आज की कहानी, पृ.120

3. मधुरेश, हिंदी कहानी विकास, पृ.123

4. उपर्युक्त, पृ.123

5. मधुरेश, हिंदी कहानी का विकास, पृ.123

6. इंद्रनाथ मदान, हिंदी कहानी : पहचान और परख, पृ.93

7. विजय मोहन सिंह, आज की कहानी, पृ.118

8. मधुरेश, हिंदी कहानी का विकास, पृ.128

9. विजय मोहन सिंह, आज की कहानी, पृ.116-17

10. नामवर सिंह, कहानी नई कहानी, पृ.109

11. विजय मोहन सिंह, आज की कहानी, पृ.117

12. काला रजिस्टर, रवींद्र कालिया की कहानियाँ, पृ.220

13. पुष्पपाल सिंह, समकालीन कहानी : नया परिप्रेक्ष्य, पृ.367

14. काला रजिस्टर, रवींद्र कालिया की कहानियाँ, पृ.205

15. उपर्युक्त, पृ.205

16. उपर्युक्त, पृ.205

17. उपर्युक्त, पृ.205

18. उपर्युक्त,पृ.205

19. उपर्युक्त, पृ.210

20. उपर्युक्त, पृ.212

21. उपर्युक्त, पृ.215

22. उपर्युक्त, पृ.216

23. उपर्युक्त, पृ.210

24. उपर्युक्त, पृ.206

25. कहानी : स्वरूप और संवेदना, पृ.53

26. कहानी : नई कहानी, पृ.120


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