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कविता

पहाड़ पर बादल
मुकेश कुमार


1 .

कभी बाँध देते हैं
पहाड़ों के सिर पर सफेद साफा
कभी पड़े होते हैं तन पर
उनकी लज्जा को ढाँपते हुए

कभी ढँक देते हैं कंचनजंघा का मुखड़ा
बुरी नजर से बचाने के लिए
कभी बिखरे होते हैं
किसी शैतान बच्चे के द्वारा बिखेरे गए
कागज के टुकड़ों की तरह

फिर अचानक
सीढ़ियाँ लगाकर चढ़ने लगते हैं पहाड़
फुर्ती के साथ लगाने लगते हैं
आसमान में पोंछा
दाग-धब्बे धोते हुए

हमेशा कूदते-फाँदते रहते हैं
जंगल-पहाड़ और नदियाँ
कभी इधर तो कभी उधर
जल्दी में आते-जाते नजर आते हैं वे
मानो हर जगह हो उन्हें पहुँचना
नाते-रिश्तेदारी निभाने

पता नहीं किस बात पर नाराज हो जाते हैं वे
बरसने लगते हैं लरज-गरजकर
या क्या पता
उमड़ पड़ता हो कोई पुराना दर्द
और रोने लगते हों जार-जार

जाने कब एक ठंडे, कोमल स्पर्श के साथ
किस किस को पहुँचाने लगते हैं
उनकी डाक
उदासी से भर जाते हैं
परदेस में रह रहे
अकेले प्रेमियों के मन में,
और तन में भी

पहाड़ों पर बादलों को होते हैं बड़े काम
पहाड़ों पर तनिक भी आलसी नहीं होते मेघ


2 .

 

खड़े हो जाते हैं
सर पर कफन बाँधे
लड़ने को उद्धत
हवा से
हवा के खिलाफ

आसमान पर
चिपकाने लगते हैं
धूसर रंगों वाले कागज पर
काली इबारतों वाले पोस्टर

झटपट
चढ़ जाते हैं पहाड़ों पर
मानो संबोधित करना हो
किसी जुलूस को

जब-तब गरज-गरजकर
लगाने लगते हैं नारे
क्रोध में भागने लगते हैं
इधर उधर

द्रवित होकर बरस पड़ते हैं
यकायक
उदास होकर पड़े रहते हैं
चुपचाप

मगर चैन नहीं होता उनको
फिर से निकल पड़ते हैं
एक नए संग्राम की डुगडुगी पीटते हुए...


3 .

धूप के चितकबरे साए
चूमते हैं हरे-भरे शिखरों को
पहाड़ों पर होती है
बादलों की खेती
अचानक उठता है
घाटियों से धुआँ ही धुआँ
समेट लेता है समूचा परिदृश्य
अपने आगोश में
फेफड़ों में भर जाती है गंध
नासापुटों को भिगोते हुए
उजाले छिप जाते हैं
कहीं ऊपर, बहुत ऊपर
पेड़ों के पत्तों पर
नमी रह जाती है
तप्त चुंबनों की
प्रकृति का ये सहवास
देखते हैं हम मूक होकर
एक रिक्तता के साथ
परिपूर्ण होते हुए।


4 .

कितनी आकृतियाँ, कितने रूप बादलों के

शाम ढलते ही
सुलगाई हैं
लकड़ियाँ
किसी गृस्थिन ने
आँगन से उठने लगा है
बादलों का धुआँ...

आँगन की रस्सी पर
सूख रहे हैं
लकदक सफेद
लंकलाट के नए कपड़े की तरह बादल

डूब गए हैं ऊँचे-ऊँचे पहाड़
बादलों के सागर में
या कि
खो गए हैं वे
बादलों के शीतल-तप्त आलिंगन में

हाथों में वज्र लिए
सैनिकों की तरह
बिखर गए हैं
अलग-अलग टुकड़ियों में
पहाड़ों की रक्षा के लिए

कभी-कभी
इतने करीब आकर भी
भिगोते नहीं बादल
कुछ रीते-रीते से होते हैं वे
या किसी और को भिगोने के
लिए जा रहे होते हैं बादल
खेतों के ऊपर
बादलों का झुंड
मानो खेतों में मगन हो
किसानों की टोली
सर पे टोपी डाले
हाथों में कुदाल उठाए
बादलों को बोते
काटते बादलों की फसल

अचानक हो जाते हैं अदृश्य
फिर झाँकने लगते हैं
चुपके से
झीने से श्वेत पट के पीछे से
ऐसे ही लुका-छिपी
खेलते रहते हैं पहाड़
बादलों के पीछे छिप-छिपकर

 


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