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कविता

यात्रा
मुकेश कुमार


सूखे पत्तों पर लेटा
मैं तैर रहा था आसमान में

विचरने लगा
स्वप्नों की कंदराओं में
चुटकी भर मिट्टी उठाकर
उछाली मैंने शून्य में
लिपट गई हवा मुझसे
अपनी पूरी उदासी के साथ

आगे बढ़ा तो
एक रुकी हुई नदी ने
रोक लिया मेरा रास्ता
भीगा-भीगा सा मैं
निकल आया
उसमें डूबकर

उदासी में डूबा
ठहरा हुआ मैं
चल पड़ा समुद्र की ओर
बीता हुआ जीवन जीने के लिए।

 


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